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बागों में बहार है

Posted on: 02 Feb 2019 09:31 by Ravindra Singh Rana
बागों में बहार है

अमित मंडलोई

उजड़े बाग में अचानक बहार आ गई है। दरवाजा खोलकर देखा तो पाया कि घर के आसपास फिर घोषणाओं की बरसात हो रही है। उम्मीदों के बीज बोए जा रहे हैं। फिर कोई हवाओं में तैरता हुआ निकला है, हर घर के बाहर रूक कर हाल पूछ रहा है, झोली में से निकालकर उसे कुछ बांट रहा है। एक महान् दृश्य उपस्थित है। कोई आंखें फूला रहा है कोई मेज थपथपा रहा है।

अच्छा, आप मध्यमवर्गीय हैं, आपको अपनी देखभाल खुद करने को कहा गया था। पेट्रोल-डीजल के दाम ने कमर तोड़ दी है। बच्चों की फीस भनना मुहाल हो रहा है। टैक्स की मार से पीठ छिल गई है। न न वह गलत हो गया। जो हुआ सो हुआ, इन्हें कृपाकर भूल जाइये। आप ये रियायत लीजिए ना, इससे अगला-पिछला सब ठीक हो जाएगा। थोड़ा सा और लीजिए, गरिष्ठ नहीं सुपाच्य ही है। कब्ज नहीं होगा। भारीपन भी नहीं लगेगा। हल्के हो जाएंगे। आपका थोड़ा बोझ हमें दे दीजिए। अरे, हम हैं ही किसलिए। वह तो बीच में थोड़ा हो गया। आप तो जानते ही हैं ना सब हो जाता है। लेकिन अब सब ठीक कर देंगे। पूरा प्लान लेकर आए हैं। सब तकलीफें खत्म कर देंगे, बस अब और नहीं।

आप किसान हैं। आप का दर्द तो समझ ही सकते हैं। हम भी सब किसान ही हैं। दादा-परदादा सब किसान ही थे। हमसे अच्छे से आपकी परेशानी कौन समझ सकता है। क्या कह रहे हैं आत्महत्या, अरे उन्हें जाने दीजिए। वह बुजदिलों का काम है। आप तो हिम्मत वाले हैं। बीज के दाम, खाद की परेशानी, पानी का संकट, बाजार की दुविधा, वह सब तो प्रोपोगेंडा है, इन सब झंझटों में क्यों उलझते हैं। हम आपको पेंशन देेंगे और कोई बिचौलिया नहीं रहेगा। सीधे पैसा आपके खाते में आएगा। तय तारीख को आपका खाता टन से बजेगा और आप खन से अपनी जरूरत पूरी कर लीजिएगा। नीतियों का क्या है, वे तो बनती-बिगड़ती रहेंगी, आप तो बस सारी चिंता हमें दे दीजिए। छह हजार से क्या होगा, इतना तो लीजिए हुजूर बाकी और भी साल आने को हैं।

मजदूर भाईसाहब, कहां थे आप। आप ही को इतनी देर से ढूंढ रहे हैं। एक तो घर भी आपने बस्ती के बाहर बना रखा है। गंदी भी बहुत है यह स्वच्छता अभियान चल रहा है, उसका कुछ लाभ उठाइये। क्या कहते हैं कोई नियम नहीं है, बहुत शोषण हो रहा है। पूरा मेहनताना नहीं मिल रहा है। सुविधाएं नहीं हैं। मुझे समझ नहीं आ रहा है आप कब की बात कर रहे हैं। अब तो सब उज्ज्वल और धवल है। आप जरा फिक्र मत कीजिए। क्या कह रहे हैं, तीन हजार से क्या होगा। अरे, ये सोचें कि हम लोग इतना तो कर रहे हैं, पहले किसने ये हरियाली सीधे आपके खाते में पहुंचाने की कोशिश की थी।

आम व्यापारी, उद्योगपति आप सब कहां थे भाई इतने दिन से। क्या कहा, कतार में थे कि कब डबल ए पर बरस रही कृपा के कुछ छींटे आप तक पहुंचे। देखिए, ये बहुत गलत बात है। ऐसा नहीं कहते, आप तो हमारे अपने हैं। उन्हें भूल जाइये, वे बड़े लोग हैं, उनका तो कुछ भी चलता रहता है। आप तो अपनी बताइये, कष्टों में कोई कमी तो नहीं है ना। उन्हें भूल जाइये। सारा दु:ख-दर्द दूर कर देंगे। गब्बर सिंह, ब्याज सिंह, अफसर सिंह के सारे पेचीदा टैक्स को धड़े लगा रहे हैं, और सिर्फ आपके लिए। फिर मत कहना कि कुछ किया नहीं। सब आपके लिए ही तो कर रहे हैं। ये छूट, ये रियायतें, ये मेहरबानियों की बरसातें अंतत: आपके ही तो काम आना है। सारी नदियां बहकर सागर में जाती है, ऐसे ही पूरे देश का पैसा बहकर आपके ही तो खाते में आना है।

कोई बच गया है क्या, महिलाएं, बच्चे, सैनिक, खिलाड़ी, दिव्यांग, शहरी, ग्रामीण, कलाकार, काश्तकार, शहीद, अमीर-गरीब। किसी भी वर्ग, अवर्ग का जो भी कहीं हो, सुन रहा हो, देख रहा हो, अच्छे से समझ ले। ये सारी बहार सिर्फ और सिर्फ आपके लिए है। पेड़ों पर लगे फल, डालियों से झूलते फूल, महकते बगीचे और लबरेज गोदाम इन पर सिर्फ और सिर्फ आपका हक है। आओ और इन सारी सुविधाओं का जश्न मनाओ। नाचो-गाओ और तसल्ली रखो कि ये चुनाव घोषणा पत्र या सभाओं के जुमले नहीं हैं, ये बजट है, जिसे वित्त विधेयक की हैसियत हासिल है। क्या फर्क पड़ता है जो प्रावधान चार महीने के थे। चार के 12 और उसके 60 करते हमें अच्छे से आते हैं। आप भी सीख जाइये।

अगर कोई सवाल है कि ये राहतें अगर थीं कहीं तो फिर डिब्बे में बंद कर क्यों रखी गईं थीं। तो जवाब दीजिएगा कि ताजे फलों को खाने का मोह छोडक़र ही आप खास मौके पर अचार, मुरब्बे, जैम, जेली और स्क्वैश का मजा ले सकते हैं। देर क्यों कर रहे हैं, लीजिए। बस शर्त एक ही है, बागों की बहार हमसे न छिनना।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। फेसबुक वॉल से साभार।

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