क्या विधायक होना गुनाह है या बाप होना कमजोरी?

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sakshi mishra

इंदौर । राजेश राठौर

संविधान में मीडिया को चार आधार स्तंभों में से एक का दर्जा दिया गया है, लेकिन ना तो यह अपनी जिम्मेदारी समझता है और ना ही गंभीरता। आखिर कब तक हम टीआरपी के टुच्चे खेल के लिए बकवास खबरें दिखाते रहेंगे। इस भेड़ चाल में ताजा मामला बरेली के विधायक राजेश मिश्रा की बेटी साक्षी मिश्रा का है। जिसका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ और सारे चैनल और अखबार उसी के पीछे पड़ गए। साक्षी के पक्ष को ऐसे बताया जा रहा है जैसे उसके पिता कोई आदतन अपराधी हो।

क्यों हमें हर बार रोता हुआ शख्स सही लगने लगता है? क्यों हमारा मीडिया दोनों पक्षों को जाने बिना फैसला सुना देता है? साक्षी मिश्रा का वीडियो आने के बाद सभी चैनल और अखबारों ने विधायक को दबंग और अपराधी दिखाने की कोशिश की है। आखिर क्या गलती हुई है विधायक से? कोई और पिता भी होता तो बेटी से यही कहता कि तुम घर आ जाओ। क्या गारंटी है इस बात की कि साक्षी और उसका दलित पति सही कह रहे हैं?

देश के एक नामी टीवी चैनल ने साक्षी उसके पति अजितेश और ससुर को बिठाकर ऐसा रोना-धोना मचाया की विधायक पूरी तरह मुलजिम लगने लगे। जब लाइव शो में विधायक की बात बेटी से करवाई तो उन्होंने यही कहा, कि मैं इस लफड़े में अब और नहीं पड़ना चाहता हूं ।बस यही चाहता हूं कि तुम जहां भी रहो खुश रहो। हमारा नादान और नासमझ मीडिया अब लड़के के पीछे पड़ गया है। यह साबित करने में लगा है कि उसकी कहीं और पहले ही सगाई हो चुकी थी। सवाल यह कि आखिर इस खबर को इतना क्यों दिखाया जा रहा है? क्या ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी की बेटी ने मर्जी से शादी कर ली हो? क्या ऐसा भी पहली बार हुआ है एक पिता ने घर से गई हुई बेटी को घर बुलाने के लिए सख्ती से डांटा फटकारा नहीं हो? क्या ऐसा पहली बार हुआ है कि सोशल मीडिया पर किसी ने अपना रोना धोना रोया हो और बाद में वह फर्जी साबित ना हुआ हो?

सच -झूठ और सही-गलत अपनी जगह है। लेकिन क्या हमारा मीडिया यह तय नहीं कर सकता कि कौन सी खबर कितनी देर तक दिखाई जानी चाहिए। टीआरपी के चक्कर में बकवास ही परोसते जा रहे हैं। ताजा उदाहरण क्रिकेट विश्व कप से भी लिया जा सकता है। छोटी से छोटी खबर को भी ऐसा बना कर बताया जा रहा है जैसे आसमान टूट पड़ा हो। क्रिकेट की खबरों से ज्यादा खिलाड़ियों के झगड़े की खबरें बताई जा रही है। हार और जीत को ऐसे बताया जा रहा है जैसे पहले हुआ ही ना हो। सवाल यह है कि भेड़ चाल में महिला फुटबॉल विश्वकप पर किसी की नजर नहीं गई। कब टूर्नामेंट शुरू हुआ और कब फाइनल खत्म हो गया कोई जानता भी नहीं है। अगर हमारा मीडिया इतना ही सजग और समझदार था तो फुटबॉल विश्व कप की खबरें क्यों नहीं दिखाई।

आखिर में यही साबित होता है टीआरपी के लिए मीडिया कुछ भी और कितनी भी देर दिखा सकता है। उसे ना तो सच झूठ से मतलब है और ना ही सही गलत से। सब जानते हैं कि सोशल मीडिया पर वही डाला जाता है जो असरदार हो। ना तो वहां का रोना असली है और ना हंसी। इसी के आधार पर चैनल वालों ने कैसे तय कर दिया कि यूपी के विधायक बेटी के साथ अन्याय कर रहे हैं। हो सकता है उनकी बात सही हो, की बेटी उस लड़के के बहकावे में आकर गई हो और परिवार को नीचा दिखा रही हो।

खबरें तो यहां तक भी है कि वह अपने घर से पैसे और गहने ले गई है। इसकी पड़ताल किसी चैनल ने करना ठीक नहीं समझा। लड़की ने कह दिया कि मैं पैसे नहीं लाई हूं तो मान लिया। विधायक को कोसने वाले लोग अपने आप को विधायक की जगह रखकर देखें और खुद से पूछें कि अगर उनकी बेटी या कोई रिश्तेदार इस तरह भाग गया होता तो वह किस तरह का बर्ताव करते। जब हम खुद किसी बात को स्वीकार नहीं कर सकते तो। फिर किसी और से उम्मीद क्यों कि वह इस मामले में नरमी से पेश आएगा। विधायक ने सिर्फ वही किया है जो एक विक्रम अंत और मजबूर बाप अपनी बेटी के लिए करता। इस आग में मिर्ची डालने का काम लड़की के रोने और चैनल वालों ने किया है।

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