Breaking News

क्या बाबा रामदेव का जलवा फीका पड़ने लगा है? वरिष्ट पत्रकार अजय बोकिल

Posted on: 19 May 2018 06:13 by krishna chandrawat
क्या बाबा रामदेव का जलवा फीका पड़ने लगा है? वरिष्ट पत्रकार अजय बोकिल

यूं तो यह कारोबारी जगत से जुड़ी खबर है, लेकिन इसमें कई संकेत और सवाल छिपे हैं। मसलन क्या योग गुरू बाबा रामदेव के कारोबारी सपनो को मोदी सरकार की नोटबंदी और जीएसटी ने ब्रेक लगा दिया है? क्या भक्तों का बाबा के उत्पादों से मोहभंग होने लगा है ? बाबा की पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड कंपनी के टर्नअोवर के ताजा आंकड़े और कंपनी के एमडी तथा बाबा के सखा आचार्य बालकृष्ण का बयान तो यही इशारा करता है। पिछले साल तक पतंजलि की व्यावसायिक उड़ान सातवें आसमान पर थी। वर्ष 2017 में कंपनी का टर्नअोवर इसके पूर्व के साल के मुकाबले बढ़कर दो गुना यानी 10 हजार 561 करोड़ रू. हो गया था। इसके बाद लगने लगा था कि एफएमसीजी, पर्सनल केयर और आयुर्वेदिक दवाइयों के क्षेत्र में कंपनी एक साल में देश की नंबर वन हो जाएगी। बाबा का भी दावा था कि 2018 तक कंपनी का टर्नअोवर 20 हजार करोड़ को पार कर जाएगा। लेकिन कंपनी के परफार्मेंस के ताजा आंकड़े निराशाजनक इस मायने में हैं कि टर्नअोवर का आंकड़ा लगभग स्थिर है। कंपनी के एमडी और (योग) आचार्य बालकृष्ण का कहना है कि ऐसा नोटबंदी और जीएसटी के (दुष्) प्रभाव के कारण हुआ। इसके अलावा बीते साल कंपनी ने इंफ्रास्ट्रक्चर व सप्लाई लेन विकसित करने पर ज्यादा जोर दिया। इस कारण से भी कारोबार स्थिर रहा। उम्मीद है कि अगले साल यह तेजी से बढ़ेगा।बता दें कि पंतजलि आयुर्वेद ने भाजपा सरकारों की मदद से अपना धंधा बीते सालों में खूब बढ़ाया है। इसमें स्वदेशी का दावा और योग गुरू बाबा रामदेव की मार्केटिंग का जबर्दस्त योगदान है। बाबा ने साबित कर दिया कि आध्या त्मिक श्रद्धा को भी कारोबारी आस्था में सफलता से कैसे बदला जा सकता है। कई लोगों का मानना है ‍कि पंतजलि के उत्पाद लाभकारी होते हैं। खासकर ‘बाबा वाक्य प्रमाणम्’ में भरोसा रखने वाले पंतजलि के उत्पाद अडिग निष्ठा से खरीद रहे थे। बावजूद इसके कि कंपनी के आंवला जूस की घटिया होने के कारण सेना ने खरीदी बंद कर दी और नेपाल सरकार ने कंपनी की 6 दवाइयों को घटिया मानकर उसे नोटिस थमा दिया। इन सबके बावजूद कंपनी का कारोबार बढ़ता रहा। परिणामस्वरूप बाबा ने भी शारीरिक योग से ज्यादा वाणिज्यिक योग पर ज्यादा ध्यान केन्द्रित करना शुरू कर दिया था। वे बहुराष्ट्रीय कंपनियों को स्वदेशी के हथियार से तगड़ी टक्कर देने का प्रतीक बन गए थे। बाबा की तूफानी तरक्की से इस क्षेत्र की प्रति‍द्वं‍द्वी कंपनियां खौफ खाने लगी थी। यह खौफ उत्पादों की गुणवत्ता के कारण कम बाबा को मिलने वाले राजनीतिक-धार्मिक संरक्षण के कारण ज्यादा था।इस राजनीतिक कृपा को हासिल करने के लिए बाबा ने क्या नहीं किया। एक जमाने में वो देश में मोदी लहर के हरकारे बनकर उभरे थे। उन्हें काले धन के खिलाफ लड़ने वाला जेहादी माना गया। वो सरकार के हर कदम में साथ थे। देश में दो साल पहले जब नोटबंदी का अहम फैसला लिया गया तो बाबा उसका समर्थन करने में अव्वल थे। उन्होने नोटबंदी के तमाम विरोधियों को ‘स्वदेशी’ सलाह दी थी ‍कि हमे नोटबंदी की नुक्ताचीनी नहीं करनी चाहिए। यह अलग बात है कि कुछ महिनों बाद ही बाबा के सुर बदल गए। उन्होने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया कि नोटबंदी के कारण 3 से 5 लाख करोड़ का घोटाला देश के सामने आएगा। उन्होने बैंक वालों को देश का सबसे बेईमान भी बताया। जब जीएसटी आया तो बाबा की सरकार से नाराजी और बढ़ी। उनका आरोप था ‍कि आयुर्वेदिक दवाइयों पर आयद जीएसटी बहुत ज्यदाा है। बाबा इसमें ज्यादा छूट चाहते थे। यही नहीं, गाय के घी पर ज्यादा जीएसटी की आलोचना करते हुए बाबा ने यहां तक कहा कि यही हाल रहा तो देश में बूचड़खाने और बढ़ेंगे।लेकिन आज आचार्यजी नोटबंदी को कंपनी के कमजोर प्रदर्शन के लिए जिम्मेदार मान रहे हैं। जीएसटी का दर्द भी कंपनी को महसूस होने लगा है। लेकिन इससे तो दूसरी कंपनियां भी प्रभावित हुई है। इससे भी ज्यादा तकलीफ इस बात की है कि प्रतिद्वंद्वी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कारोबार घटने की जगह बढ़ गया है। शायद इसलिए भी ‍कि लोग अब फिर गुणवत्ता को तवज्जो देने लगे हैं। मार्केट विश्लेषकों का मानना है कि शहरी उपभोक्ता वापस बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादों की अोर लौटने लगा है और इसका एकमात्र कारण गुणवत्ता और प्रामाणिकता है। एक तर्क यह भी है कि बाजार का विस्तार कर लेना आसान है, लेकिन उसे सही तरीके से मेंटेन करना आसान नहीं है। इसका अर्थ यह है कि किसी एक व्यक्ति की ब्रांड वेल्यू के दम पर उत्पादों की बिक्री एक सीमा तक ही बढ़ाई जा सकती है। इसके बाद तो प्राॅडक्ट को अपनी गुणवत्ता से ही टिकना होता है। सरकारी टेका और हथेली आपको प्राथमिकता दिलवा सकती है, लेकिन उसे प्रामाणिक नहीं बना सकती। बेशक बाबा ने अपने ढंग से और अपने प्रभाव से पतं‍जलि के प्राॅडक्ट्स खरीदने के लिए लोगों को प्रेरित किया। बाबा के व्यक्तिगत आभा मंडल का अन्य प्रतिद्वंद्वी कंपनियों के पास कोई तोड़ नहीं था। अपने माल को वैसा आध्यासत्मिक रंग देने का भी उनके पास कोई तरीका नहीं था, जिसके ‘नशे’ में इस देश की बड़ी आबादी अभी भी झूम रही है। यूं ये बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी देश को लूट रही हैं, लेकिन फिर भी उन पर नियम-कानून का दबाव है। बाबा की कंपनी ऐसे ‘दबावों’ और जवाबदेही से काफी हद तक मुक्त है। इसके बाद भी अगर पंतजलि की ग्रोथ थम गई है तो जरूर कुछ कारण है। क्या लोग सचाई को समझने लगे हैं या बाबा का जलवा फीका पड़ने लगा है?

Latest News

Copyrights © Ghamasan.com