Breaking News

लौह पुरुष का मौन पुरुष बन जाना | Iron Man becoming a silent man

Posted on: 30 Mar 2019 17:41 by Surbhi Bhawsar
लौह पुरुष का मौन पुरुष बन जाना | Iron Man becoming a silent man

क्या बीते लोकसभा चुनाव के बाद ही लालकृष्ण आडवाणी को यह अहसास हो चला था कि मौजूदा पार्टी नेतृत्व यानी नरेंद्र मोदी और अमित शाह उन्हें सक्रिय राजनीति से दूर करके ही मानेंगे। ऐसा इसलिए लगने लगा कि वे सोलहवीं लोकसभा में सबसे ज्यादा आने वाले सांसदों में शुमार होने के बाद भी सबसे कम बोलने वाले सांसद रहे। लोकसभा सचिवालय का रिकॉर्ड बताता है कि इस बार आडवाणी महज 365 शब्द ही बोले। ऐसा नहीं है कि वे नहीं बोल सकते। बोलने का मौका एक तो पार्टी ने ही नहीं दिया। लोकसभा तो क्या पार्टी मंचों और अन्य चुनावों-उपचुनावों से भी उन्हें दूर रखा गया।

must read: कन्हैया की अंगुली और गिरिराज का प्रलाप | Kanhaiya’s finger and delirium of Giriraj

वहीं धीरे-धीरे उन्हें भी अहसास हो ही चला था कि वे उपेक्षा के शिकार हैं। अपनी बुजुर्गियत के चलते वे पार्टी नेतृत्व के खिलाफ कुछ बोलने से रहे, क्योंकि इससे उनकी ही गरिमा प्रभावित होती। वैसे लोगों को याद है कि उनके भाषणों से ही भाजपा दो सीटों से बढ़कर सत्ता के दरवाजे तक पहुंची है। संसद में भी यूपीए-दो के जमाने में पंद्रहवीं लोकसबा में उन्होंने 42 बार बहस और सदन की कार्यवाहियों में भागीदारी की थी और 35,926 शब्द बोले थे। यानी सोलहवीं लोकसभा की तुलना में लगभग सौ गुना। इसमें भी करीब पांच हजार शब्दों का तो एक ही भाषण 8 अगस्त 2012 को दिया था। तब लोकसभा में असम में बढ़ती गैरकानूनी घुसपैठ और जातीय हिंसा का मसला जोर-शोर से उठा था।

must read: मनमोहन भी नहीं मोह सके मतदाताओं का मन | Manmohan not even tempted voters

Latest News

Copyrights © Ghamasan.com