InternationalWomensDay: झीनी सी चुनरिया

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डॉ.क्षमा सिसोदिया
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शब्द भी मौन की सत्यता को गढ़ते हैं। मानव हृदय की गुफा में एक अद्वितीय प्रेम निवास करता है और उसे समझने के लिए विचारों को मौन होना ही पड़ेगा। आज के कोलाहलपूर्ण वातावरण में वह सुनाई ही नहीं पड़ता है।”इस अद्वितीय अनुभूति से साक्षात्कार होना ही तो प्रेम है।”

जब मन अत्यधिक विचलित हो दुखों का झरना वेग से बहाने लगता है तो उस समय मौन की उपस्थिति ही अनिवार्य बन जाता है, वहीं चिकित्सक बन सकता है। हम प्राय: अपना जीवन कंकड़-पत्थर बटोरने में व्यर्थ गंवा देते हैं। सत्यता, संपत्ति, सरकार और बहुत कुछ पाकर भी अंतत:शून्य ही हाथ लगता है तो हम क्यों आज से जगते हुए जीवन का निर्वाह करें। हमारा दुनिया में रहता है, लेकिन स्वयं के अंदर छिपी विराटता में नहीं।

आज इस झंझावात से निकलने की महती आवश्यकता है।
स्वयं को पहले जाने, फिर दुनिया को। आज इंसान खुद को खोकर दुनिया को ढूंढने में लगा हुआ है जबकि जरूरत खुद को तलाशने और तराशने की अधिक है। व्यर्थ की दौड़ में शामिल होकर वह भूल गया है,कि आखिर वह है कौन …?

जिसने जीवन का सही से मूल्य समझ लिया,उसकी कामनाएं भी शांत हो गई।

“जीवन मात्र चलते रहने का नाम नहीं है,बल्कि जीवन में रहते हुए कुछ अच्छा कर गुजरने का नाम है।”
“शोर के शब्द अनेकानेक,मगर मौन तो खुद में समाया है,
जिसने इस मंत्र को समझा,जाना उसी ने जीवन को पाया है।”

तो आइए आज से जाग्रत अवस्था में जीवनयापन करने का संकल्प लें।

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