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कब तक जबरन भाषण सुनाएंगे नेता? ‘प्रैक्टिकल फंडा’ वरिष्ठ पत्रकार राजेश राठौर की कलम से

Posted on: 21 Jun 2018 10:45 by Surbhi Bhawsar
कब तक जबरन भाषण सुनाएंगे नेता? ‘प्रैक्टिकल फंडा’ वरिष्ठ पत्रकार राजेश राठौर की कलम से

बचपन का वो दृश्य मुझे याद है जब इंदौर के राजवाड़ा पर अटल बिहारी वाजपेयी की सभा थी और उसके लिए दो घंटे पहले मजमा लगना शुरू हो गया था। उस जमाने में ना तो नेता भीड़ जुटाने के लिए अखबारों में विज्ञापन देते थे और ना ही कोई फोन या SMS करते थे। बस्तियों से भीड़ लाने के लिए RTO जबरिया बसे भी जब्त नहीं करते थे।

राजीव गाँधी जब इंदौर आए थे तब का भी दृश्य आंखो से ओझल अभी तक नहीं हो पाया है। जब वह शाम को इंदौर पहुंचे तो उन्हें महू पहुंचने में सुबह हो गई थी। रास्ते भर एक भी नेता ने हार-फूल पहले से जनता को नहीं बांटे थे कि जब राजीव गांधी आए तो उनका स्वागत कर देना। याद है मुझे अच्छी तरह से कि लोग अपनी जेब से पैसा खर्च करके हार-फूल लाए थे. उसके बाद धीरे-धीरे नेताओं की छवि में गिरावट आती गई।

आईटी और MBA की पढ़ाई के युग में युवा नेताओं से नफरत करने लगे है। दस साल में तो जुलुस रैली और सभाओं में जिस तरीकें से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भीड़ जुटाने का सरकारी तरीका अपनाया है, वो अपने आप में बेशर्मी का रिकॉर्ड है। सारे अफसरों को बस्तियों से योजनाओं का लाभ दिलाने के नाम पर सभाओं में लाया जाता है। उनको लाने ले जाने के लिए ना केवल बसों का इंतजाम करते है बल्कि खाने के पैकेट भी देते है।

राजनीतिक लोकतंत्र की हत्या और किस तरह से होगी ये अंदाजा लगाना तो मुश्किल है, लेकिन सांसद, विधायक, मंत्री, पार्षद और पार्टी नेताओं पर भरोसा न करते हुए अफसरों के जरिए भीड़ जुटाई जाती है। अफसर इसी कारण सरकार में राजनीतिक हिस्सा बन गए। अब देखिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 23 जून को इंदौर सफाई का पुरूस्कार देने आ रहे है।

बारीश का समय है इसलिए पहले ये तय हुआ था कि कार्यक्रम किसी बंद हॉल में कर लिया जाए, लेकिन विधानसभा चुनाव का समय नजदीक है इसलिए मोदी की यात्रा का राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की गई। इस कारण नेहरु स्टेडियम में करोड़ो रूपये खर्च करके शेड बनाया गया। भीड़ जुटाने से लेकर कार्यकम की व्यवस्थाओं पर लगभग 15 करोड़ खर्च होंगे। यदि यही कार्यकम बंद हाल में होता तो 2 करोड़ में सब काम निपट जाता।

जो राजनेता जनता को भाषण देकर सही रस्ते पर चलने का पाखंड भरा भाषण देते है, वही नेता जनता के टैक्स का पैसा इस तरह से बर्बाद कर रहे है। नगर निगम में तनख्वाह बांटने के भले ही लाले पड़ रहे हो या मध्यप्रदेश सरकार पर पौने दो लाख करोड़ का कर्जा हो गया हो, इससे नरेंद्र मोदी और शिवराज सिंह चौहान को क्या लेना देना?

नरेंद्र मोदी सरकार तो लोकसभा चुनाव से हाईटैक है। बंद हॉल में भी कार्यकम करके टीवी चैनल के जरिए भी ये कार्यकम लाइव दिखाया जा सकता था। प्रैक्टिकल फंडा ये है कि नरेंद्र मोदी को सुनने के लिए यदि बसे लगाना पड़ रही हो, 40 हजार खाने के पैकेट बनवाना पड़ रहे हो तो फिर इसका क्या मतलब है? क्या सभाओं के लिए जबरिया भीड़ जुटाने की होड़ लगातार चलती रहेगी।

जिस नरेंद्र मोदी का एक पैर हमेशा विदेश में रहता हो, वो मोदी विदेशों में जाकर नहीं देखते कि वहां की राजनीतिक पार्टियां जबरिया भीड़ जुटाने जैसा कोई काम नहीं करती। खैर मालवी कहावत बिकुल सही है कि “खाने के दांत और दिखाने के दांत अलग-अलग होते है”। ये फंडा आपको कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरुर दीजिए। मेरा Email id- [email protected] और मोबाइल नंबर 9425055566 पर संदेश भेज सकते है।

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