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रिश्ते के खातिर सामूहिक भोजन, ‘प्रैक्टिकल फंडा’ वरिष्ठ पत्रकार राजेश राठौर की कलम से

Posted on: 22 Jun 2018 12:30 by Surbhi Bhawsar
रिश्ते के खातिर सामूहिक भोजन, ‘प्रैक्टिकल फंडा’ वरिष्ठ पत्रकार राजेश राठौर की कलम से

दो-तीन दशक से हिंदुस्तान में संयुक्त परिवार टूटने की परंपरा बन गई। इसके टूटने से सगे भाई-बहन और अब माता-पिता के दर्शन भी यदा-कदा होने लगे। जिन परिवारों में संस्कार बचे थे या यूं कहे कि जिन्हें रिश्ते टूटने का तनाव था वो कुछ दूसरे तरीके अपनाने लगे। उदाहरण के तौर पर भाइयों ने मिलकर या पिता पुत्र ने मिलकर ये तय किया कि हम दुकान या एक ही ऑफिस होने पर दोपहर का भोजन साथ में कर लिया करेंगे।

इस परंपरा ने तेजी से पैर पसारना शुरू किया और आज कई दुकान और ऑफिस पर आप जाएंगे तो आप देखेंगे कि भाई या पिता-पुत्र साथ में खाना खा रहे है। घर अलग-अलग होने पर भी दुकान पर साथ में भोजन करने से सुकून जो मिलता है वो निजी तनाव को भी ख़त्म कर देता है। इसलिए ऐसी परंपरा उन सब परिवारों के लिए जरुरी है, जो संयुक्त ना होकर टुकडो में बंट गए है।

घर में कभी महिलाओं और कभी बच्चो के कारण रोज बर्तन बजने के कारण भाइयों या पिता-पुत्र को अलग होना पड़ता है। दूध किसके बच्चे ने कम-ज्यादा पी लिया इसको लेकर होने वाली कहा-सुनी भारत-पाकिस्तान के बंटवारा होने की तरह पूरी नहीं होती। ऐसे में अच्छा भला खुशहाली का बगीचे जैसा परिवार उजड़ जाता है।

मजबूरी में अलग हुए कुछ परिवारों की मिसाले ऐसी भी है जो रोज नहीं तो कम से कम हर रविवार को या महीने में एक बार सब इकट्ठे जरुर होते है। परिवार की पुरानी पीढ़ी से लेकर नई पीढ़ी तक अचार से लेकर विचार तक सब बांट लेते है। कुछ परिवारों ने अब आधुनिकता का लबादा ओढ़ कर परिवार के whatsapp ग्रुप बनाना शुरू कर दिए। भले की आधुनिक हो लेकिन ये प्रैक्टिकल फंडा तो है कि जो परिवार के सदस्य साथ में रहते हुए एक-दूसरे को खाने दौड़ते थे वो परिवार अब whatsapp पर तो संयुक्त है।

पहली और तीसरी पीढ़ी के बीच विचार की खाई इतनी बड़ी है कि पेचवर्क करने के बाद भी डामर जल्दी से उखड जाता है। कुछ परिवारों की मिसाले दी जा सकती है, इंदौर के राजमोहल्ले में रहने वाले भैया स्टोर का परिवार संयुक्त परिवार की मिसाल था।  तीसरी-चौथी पीढ़ी ने कबाड़ा किया, देखते-देखते एक से चार घर हो गए। कोई बात नहीं पहली पीढ़ी के बुजुर्गो ने तय किया कि दूसरी-तीसरी पीढ़ी कुछ भी करे, हम सब भाई तो रोज सुबह का खाना किसी एक घर पर ही करेंगे। संस्कृति विहीन और परिवार तोड़ो अभियान के चलते अब यही उम्मीद की जाना चाहिर कि जैसे भी हो परिवार का मिलना-जुलना लगातार बना रहना चाहिए, ताकि आंखो की शर्म और रिश्तो की अहमियत बनी रहे। आपको ये फंडा कैसा लगा प्रतिक्रया दीजिए। मेरा Email id- [email protected] और मोबाइल नंबर 9425055566 पर संदेश भेज सकते है।

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