गीताश्री बोलीें, समाज का खुलापन तो साहित्य में आएगा ही उससे डरना क्यों

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Geeta Shree

अखिल भारतीय महिला लेखिका समागम इंदौर इसमें तीसरे सत्र में बोलते हुए प्रसिद्ध लेखिका गीताश्री ने कहा कि साहित्य गंभीर कर्म है और बलात्कार जैसे शब्द हमें अखबारों के लिए रखना चाहिए। जो भी साहित्यकार है वह गंभीर लेखन करता है। यहां किसी ने बलात्कार की पैरों का री नहीं की है खुलेपन से हम आपका मनोरंजन नहीं करना चाहते हमें लेखक और उसकी मंशा को समझना होगा वे लेखन के माध्यम से अपने घावों को व्यक्त करती हैं और समाज में जो कुछ हो रहा है। उससे बहुत कम साहित्य में आ पा रहा है मेरी कहानी एक ऐसे समाज का सच है जो मेरा आंखों देखा है। एक 60 साल की महिला को भी इसलिए पीटा जाता है कि वह अपने पति को सेक्स के लिए उपलब्ध नहीं है जब एक बेटी अपनी मां को सेक्स वली एक्सप्लॉयड होते हुए देखती है तो उसकी क्या प्रतिक्रिया होगी हमारा समाज पाखंड में जी रहा है महिला लेखिका कई बार इस भय से भी खुला नहीं लिखती कि उनके घरवाले ही उसे एडिट कर देंगे।

Geeta Shree

मैं साहित्य में जिम्मेदारी की बात मानती हूं रीति काल के साहित्य में क्या परिपक्वता थी। उसमें पुरुषों को आनंद आता है लेकिन महिलाओं को आनंद नहीं शर्म आती है। कार्तिकेय का जन्म तो पूरी तरह से अश्लीलता के साथ हुआ है। यह खुलापन है रचनाकार और युग तय करेगा कि खुलापन कितना उचित है।

Geeta Shree

फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे जैसी किताबें हिंदी में नहीं लिखी जा सकती इसमें महिला गुलाम की गुलामी का पूरा चित्र है कि उसे पुरुष को खुश करने के लिए कैसे प्रस्तुत करना है। वह एक सेक्स मजदूर की तरह कार्य करती है पुरुष का अंतिम उपनिवेश स्त्री रही है।

Geeta Shree

विकास हुआ है तभी तो हम बैठकर ये बात कर रहे हैं क्या विकास सो हमें मुक्ति मिली है कोख से मुक्ति मिली है क्या इस विकास ने स्त्री होने से आजादी दी है इस विकास में तो आपको स्त्री ही बनाए रखा है।

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