मध्यकाल में अटल अखाड़ा के पास थे तीन लाख से अधिक सन्यासी योद्धा

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दस नामों की इस मीमांसा के साथ दशनामी संप्रदाय का नामकरण किया गया। अखाड़े में रहने वाले साधुओं से अपेक्षा की जाती थी कि वे निर्धारित अनुशासन का पालन करें। इस संप्रदाय के प्रसिद्ध अखाड़ों के नाम इस प्रकार हैं पंचायती अखाड़ा, महानिर्वाणी, निरंजनी पंचायती अखाड़ा, अटल अखाड़ा, भैरव अखाड़ा (इसे जूना अखाड़ा के नाम से भी जानते हैं) आनंद अखाड़ा, अग्नि अखाड़ा और अमान अखाड़ा पंचायती महानिर्वाणी और पंचायती निरंजनी का मुख्य स्थान प्रयाग है।

दोनों के उपास्य देव अलग हैं। महानिर्वाणी के साधु कपिलदेव की उपासना करते हैं, तो निरंजनी साधु स्वामी कार्तिकेय के उपासक हैं। अटल अखाड़ा गणेश, जूना अखाड़ा भैरव, आनंद अखाड़ा दत्तात्रेय और अग्नि अखाड़ा अग्निदेव के उपासक होते थे। इन अखाड़ों में अटल अखाड़ा सबसे बड़ा था। कहते हैं मध्यकाल में इसके पास तीन लाख योद्धा संन्यासी थे। इन्हें ‘मूर्ति’ कहा जाता था अपने निश्चित उद्देश्यों के अलावा ये लोग राजाओं और बादशाहों के लिए भी लड़ा करते थे। अखाड़ा जोधपुर के आसपास रहा करता था। अब तो अखाड़ा छिन्न-भिन्न सा हो गया है। ‘निर्वाणी’ और ‘निरंजन’ अखाड़ा ही इन दिनों सबसे प्रसिद्ध है।

अखाड़ों की आर्थिक स्थित बहुत अच्छी है। हालांकि अब उस संपत्ति का किन्हीं अच्छे उद्देश्यों के लिए ज्यादा उपयोग नहीं होता। लेकिन अखाड़ों के जीवंत और सक्रिय दिनों का विवरण जानकर कोई भी अनुभव कर सकता है कि संन्यासियों में राष्ट्र और धर्म के मंगल की कितनी शक्ति छिपी हुई है। उसके उचित उपयोग और दिशा मिलने भर की देर है।

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