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इक सौंधी-सी डायरी

Posted on: 29 Jan 2019 18:25 by mangleshwar singh
इक सौंधी-सी डायरी

निर्मला भुराड़िया

मैं दिल्ली की डॉ. प्रतिमा शारदा की एक आत्मकथात्मक किताब पढ़ रही हूं-वृत्तांत-ए मेमॉयर। शायद इसे आत्मकथा के बजाए पारिवारिक यादगार चित्रों से सुसज्जित डायरी कहा जाए तो उपयुक्त होगा। आजादी के पूर्व पैदा हुईं डॉ. प्रतिमा इंदौर के मंत्री परिवार की पुत्री हैं। भूमिका में वे कहती हैं कि उन्हें लगता था व्यक्तिगत घटनाएं लिखना आत्मप्रचार के सिवा कुछ नहीं है।

मगर बाद में उन्होंने खुद ही अपने इस पूर्वाग्रह को खारिज करते हुए सोचा कि पिछले सत्तर-पचहत्तर सालों में समाज और उसका रोजमर्रा का जीवन काफी बदला है अत: क्यों न वे अपने बीते समय का एक हिस्सा अपने परिवार, मित्रों और पोते-पोतियों संग बांटें। ताकि वे जब चाहें अपनी जड़ों को भी देखें। और सच में किताब हमें एक भूले-बिसरे युग में ले जाती है, जिसकी की कई बातें नई पीढ़ी को मजेदार लग सकती हैं।

मसलन प्रतिमाजी बताती हैं कि कैसे बारिश के दिनों में बच्चे नंगे पांव स्कूल जाना पसंद करते थे ताकि उनके जूते खराब ना हों! उनके पोते ने पूछा उस समय क्या डिस्ट्रेक्शंस थे, जिससे पढ़ाई में बाधा पड़ती हो, तो उनका तुरंत जवाब था कोई नहीं। मकान की गैलरी में खड़े होकर, सामने के मंदिर में आने-जाने वाले लोगों को देखना ‘नन्ही” प्रतिमा का प्रिय शगल था। मौसमी सब्जियां, दूध, घी ही रोजमर्रा का खानपान था।

जब दूध आता, उस समय प्रतिमा स्कूल में होतीं और एक ग्लास में गरम दूध रूमाल से ढंककर उनके स्कूल पहुंचा दिया जाता। वे कक्षा के बाहर खड़े होकर उसे गटागट पी लेतीं। डॉ. प्रतिमा कहती हैं वे धीरे खाती थीं, एक घंटे में एक रोटी की तर्ज पर। मगर उनके वात्सल्यमय पिता चाहते थे बेटी को गर्म खाना मिले। उस जमाने में हीटर-टोस्टर नहीं होते थे अत: वे अंगारों के एक छोटे-से झुंड पर सब्जियों की कटोरी रख देते थे।

वर्ल्ड बैंक की प्रतिष्ठित सेवा से रिटायर प्रतिमाजी के मेमॉयर्स में और भी बहुत कुछ है, मगर यहां स्थान छोटा है। इतना जरूर कहा जा सकता है कि आज के युग में जब लोगों को महिमामंडन करने या उन्हें गिराने के लिए आत्मकथा लिखी जा रही हैं और बायोपिक बन रही हैं ऐसे में यह भोला स्मृतिचित्र मन को रिझा देता है। हममें से कई लोग इससे प्रेरणा ले सकते हैं ताकि हमारी नई पीढ़ी एक मजेदार और अकृत्रिम तरीके से अपनी जड़ों को जान सके।

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