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कांग्रेस का दांव उलटा पड़ा तो बचाखुचा आदिवासी आधार भी हाथ से न निकल जाए, सतीश जोशी की कलम से….

Posted on: 25 Jun 2018 11:59 by krishnpal rathore
कांग्रेस का दांव उलटा पड़ा तो बचाखुचा आदिवासी आधार भी हाथ से न निकल जाए, सतीश जोशी की कलम से….

विधानसभा चुनाव 2018 के लिए आदिवासी क्षेत्रों में राजनीतिक शतरंज पर खेल शुरू हो गया है। प्यादे आगे बढ़ाकर बाजी कैसे जीती जाए इसके दांव-पेंच शुरू हो गए हैं।  आदिवासी अंचल में  भारतीय जनता पार्टी के पिछले चुनाव के दबदबे को कम करने और अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए कांग्रेस पार्टी पर्दे के पीछे जो खेल कर रही है, इससे उसको कितना लाभ मिलेगा  यह अभी कहना मुश्किल है मगर दांव उलटा पड़ गया तो अपने ही जमाए खेल में हाथ जलाकर कांग्रेस कहीं नुकसान न उठा ले। आदिवासी एकता और नारे के बीच आदिवासी युवाओं ने आदिवासी जन परिषद के नाम से एक संगठन खड़ा किया है  और वो आगामी चुनाव में अपने राजनीतिक लक्ष्य के लिए संगठन स्तर पर काम कर रही है। बताते हैं कि इसके पीछे कांग्रेसी सूरमाओं का हाथ है।  मध्यप्रदेश की कुल जनसंख्या की लगभग 20 प्रतिशत भाग आदिवासी है। लगभग 47 आदिवासी समूह हैं। सामाजिक और मानव विविधताओं की वजह से यह समूह कभी दबाव बनाने वाला नहीं बन पाया।  लेकिन जिस तरह यह संगठित हो रहा है, उससे मालवा-निमाड़ में नए समीकरण करवट ले सकते हैं। अब तक आदिवासी नेताओं में जमुना देवी, शिवभानुसिंह सोलंकी, उर्मिलासिंह,  दिलीपसिंह भूरिया, कांतिलाल भूरिया, फग्गनसिंह कुलस्ते, कुंवर विजय शाह, अंतरसिंह आर्य, ओमप्रकाश धुर्वे, रंजना बघेल, निर्मला भूरिया जैसे नेताओं ने आदिवासी राजनीति को धार दी है।

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भाजपा के वर्चस्व को समाप्त करने के लिए जैसा कि राजनीतिक गलियारों में चर्चा है ये नया युवा संगठन कांग्रेस का खड़ा किया हुआ है। पिछले दस वर्षों से परंपरागत रूप से आदिवासी समुदाय जो कि आजादी के बाद से ही कांग्रेस के साथ खड़ा था उसे भाजपा अपने पक्ष में करने में कामियाब रही थी। यही कारण है कि 47 आरक्षित विधानसभा सीटों में से 32 पर भाजपा और 15 सीटों पर कांग्रेस का कब्जा है। इसके अलावा प्रदेश में तीस विधानसभा सीटें ऐसी हैं जिसमें आदिवासी वोट बैंक सीटों को प्रभावित करता है। लोकसभा की दृष्टि से 39 में से 6 आरक्षित सीटें हैं जिसमें से पांच पर भाजपा और एक पर कांग्रेस काबिज है। इन सीटों के अलावा चार लोकसभा सीटें ऐसी हैं जिन पर आदिवासी वोट फेरबदल करने की ताकत रखता है।

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आदिवासियों का यह युवा संगठन आदिवासी जन परिषद कहने को तो कांग्रेस और भाजपा दोनों के खिलाफ है पर पर्दे के पीछे इसने कांग्रेस से हाथ मिला रखा है। कांग्रेस यह समझती है कि आदिवासी जन परिषद भाजपा के वोट काटेगा और दांव उसके हाथ लग जाएगा। इस दृृष्टि से अभी जो सूचनाएं हैं  उस आधार पर आदिवासी जन परिषद आदिवासी प्रभाव क्षेत्र की सभी 47 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े कर रही है। उसकी नजरें 2019 की लोकसभा चुनाव पर भी है। वह यदि सफलता हासिल करता है तो लोकसभा की सभी आरक्षित छह सीटों पर अपने  उम्मीदवार खड़े करेगी। कांग्रेस का यह दांव उलटा इसलिए पड़ सकता है कि  भाजपा का वोट बैंक जो आदिवासी क्षेत्रों में है वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  के वनवासी कार्यक्रमों के कारण खड़ा हुआ है।

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यह चुनावी मेंढकों  की तरह  मौसमी टर्र-टर्र नहीं है। यह जमीनी स्तर पर खड़े किए गए सेवा प्रकल्पों के जरिये भाजपा के लिए मजबूत आधार बनाता है। इसलिए कांग्रेस यदि ये सोच रही है कि वो आदिवासी जन परिषद को खड़ा कर भाजपा के वोटबैंक पर सेंध लगाएगी यह उसके लिए सिर्फ दिन में देखा सपना है। आदिवासी जन परिषद जो आधार खड़ा कर रही है वो कांग्रेस के कमजोर संगठन और सत्ता हाथ से चले जाने के कारण खड़ा हुआ है। इसलिए वह जो कुछ विधानसभा और लोकसभा चुनाव में जीतेगी वो कांग्रेस की झोली से ही छीनेगी।  हो सकता है कि पिछले चुनाव में कांग्रेस को जो सफलता मिली है वो कहीं उससे भी हाथ न धो ले।

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