मुझे नहीं पता था कि मैं लोगों को कॉमेडी के ज़रिए हंसा भी सकता हूं: रोहित शेट्टी

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50वें भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव (IFFI) का समापन सत्र काफ़ी शानदार रहा. इस सत्र में ब्लॉकबस्टर डायरेक्टर रोहित शेट्टी ने हिस्सा लिया, जिसे वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार और फ़िल्म समीक्षक मयंक शेखर ने मॉडरेट किया.

रोहित ने कहा, “मैं पहले यहां आ चुका हूं. मेरे लिए यह दूसरा मौका है. इससे पहले मुझे इस राज्य की तरफ़ से सम्मानित किया गया था. मैं अपनी 12 फ़िल्मों‌ की शूटिंग यहां पर कर चुका हूं. मेरी पहली गोलमाल की शूटिंग भी यहीं पर हुई थी. यहां के लोगों का रवैया काफ़ी सकारात्मक है, यहां की जगहें भी काफ़ी ख़ूबसूरत हैं.”

गोलमाल फ़िल्मों की शुरुआत कैसे और कब हुई?

“मैं अजय देवगन के साथ एक थ्रिलर फ़िल्म बना रहा था और उस वक्त नीरज वोरा मेरे पास आये. उन्होंने कहा कि उनके पास एक नाटक की कथा है. क्या मैं उसे सुनकर उस पर फ़िल्म बनाना चाहूंगा? मैं अजय के पास गया और मैंने उनसे कहा कि अब मैं यह थ्रिलर फ़िल्म नहीं बनाना चाहता हूं और उस नाटक को फ़िल्म में तब्दील करना चाहता हूं. ऐसे में अजय ने मुझसे कहा कि मैं एक एक्शन डायरेक्टर हूं और वो एक एक्शन हीरो हैं, तो फिर मैं कॉमेडी फ़िल्म क्यों बनाना चाहता हूं? मगर फिर वो मान गये. उस वक्त मेरे लिए मेरे अस्तित्व का सवाल था. मेरी पहली फ़िल्म ज़मीन ने अच्छा कारोबार नहीं किया था.”

ऐसे कौन से निर्देशक हैं जिनकी फ़िल्में देखकर आप बड़े हुए हो?

“मनमोहन‌ देसाई और विजय आनंद. मैंने हमेशा से ही लार्जर दैन लाइफ़ सिनेमा ही देखा है. मैं उस तरह के सिनेमा पर यकीन रखता हूं, मैं फ़िल्मों से जुड़ी अर्थव्यवस्था पर यकीन करता हूं. टिकटों के दाम ज़्यादा हैं. ऐसे में दर्शकों को उनके द्वारा चुकाए गये मेहनत के पैसे के बदले में उन सभीका मनोरंजन करना चाहता हूं. वैसे मैं सभी तरह की फ़िल्में देखना पसंद करता हूं.”

आप अपने पिता (एक्शन मास्टर शेट्टी) के साथ सेट पर जाया करते थे. आपने इंडस्ट्री से जुड़ने का फ़ैसला कब लिया?

“मैं अपने पिता के साथ बहुत सारे सेट्स पर जाया करता था. शालीमार की शूटिंग पर जाना मेरा पहला आउटडोर एक्सपीरियंस था. मैं हमेशा सोचा करता था कि मैं भी यही सब किया करूंगा… मैं भी अपने पिता की तरह एक एक्शन डायरेक्टर बनूंगा. मैंने 16 साल की उम्र में काम करने की शुरुआत कर दी थी. स्कूल की पढ़ाई ख़त्म करने के बाद मैं कभी भी कॉलेज नहीं गया. मैंने अजय देवगन की हर फ़िल्म में बतौर असिस्टेंट काम किया था. मैं वीरू देवगनजी का भी असिस्टेंट रहा था.”

आप आज की पीढ़ी से क्या कुछ कहना चाहेंगे?

आपको हमेशा एक छात्र की तरह से सीखते रहना चाहिए. आपको हमेशा से अपने आसपास के लोगों को बारीक़ी से अध्ययन करना चाहिए‌ क्योंकि हर किसी में कुछ न कुछ ख़ास ज़रूर होता है. अगर कोई भी शख़्स किसी भी मुकाम पर पहुंचा है,‌ तो इसका साफ़ मतलब है कि वह इसके योग्य है. वीरूजी से लेकर अमितजी से लेकर अजयजी तक… सभी की काम के प्रति ईमानदारी क़ाबिल-ए-तारीफ़ है. मुझे लगता है कि आपको अपने काम के लिए 100 रुपये दिये जा रहे हैं, तो आपको बदले में 1000 रुपये का काम करके दिखाना चाहिए. हर दिन आपको भगवान का शुक्रिया अदा करना चाहिए और ज़िंदगी में किसी भी चीज़ को हल्के में नहीं लेना चाहिए.

आपने अपने पिता को बहुत ही कम उम्र में खो दिया था. वो वक्त आपके लिए कितना मुश्क़िल था?

“यह मेरे लिए यह कतई आसान तो नहीं था. लेकिन जब आप कामयाब शख़्स बन जाते हो, तो यह कहानी में तब्दील हो जाती है. मेरी मां के पास स्कूल की फ़ीस भरने के पैसे नहीं थे. लेकिन मेरा दृष्टिकोण हमेशा से सकारात्मक रहा और मैंने कभी किसी को दोष‌ नहीं दिया. मुझे लगता है कि किसी को दोष देने का कोई मतलब नहीं होता है. ज़िंदगी में आगे बढ़ जाने में ही फ़ायदा है.”

जब आपकी पहली फ़िल्म ने कोई कमाल नहीं दिखया, उस वक्त आपकी मनस्थिति क्या थी?*

“जब कोई फ़िल्म नहीं चलती है, तो आपको बहुत बुरा लगता है. अब जब लोग कहते हैं कि ज़मीन एक अच्छी फ़िल्म थी, तो‌ मैं उनसे कहता हूं- अरे, तब तुम कहां थे!”

क्या आपको कभी इस बात का एहसास था कि आप कॉमेडी फ़िल्में बनाने में निपुण हैं? इस सवाल पर रोहित ने कहा, “मुझे नहीं पता था कि मैं कॉमेडी फ़िल्में बनाने में सक्षम हूं.”

सिंघम बनाने का ख़्याल कैसे आया?”

मैं कॉमेडी फ़िल्में बना रहा था और वे फ़िल्में चल भी रहीं थीं. फिर मुझे लगा कि कहीं मैंने आसान रास्ता तो नहीं अपना लिया है? ऐसे में अजय से इस बारे में बात की. अजय ने मुझे कहा कि अगर कभी मेरे पास एक्शन फ़िल्म कि स्क्रिप्ट हो, तो‌ मैं उसे लेकर उनके पास आऊं. कुछ इस तरह से सिंघम के निर्माण की शुरुआत हुई.”

रोहित ने अपनी टीम के बारे में भी बात की. उन्होंने कहा, “मेरी किसी भी फ़िल्म की शूटिंग के दौरान मेरी सबसे छोटी टीम 250 लोगों की होती है.

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