इंदौरवासियों का प्यार जीवनभर नहीं भूल सकूंगा -सतीश मित्तल

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satish mittal

कहते हैं इंदौर परभोगी है…यहां जो भी बाहर से आया और उसने बिजनेस किया…वह सफल हुआ। कुछ इसी तरह की कहानी इंदौर रोलिंग मिल एसोसिएशन के अध्यक्ष सतीश मित्तल की भी है। घमासान डॉटकॉम से उन्होंने अपने जीवन की कहानी साझा की। मित्तल बताते हैं कि उन 1990 के दशक में पंजाब आंतकवाद से जूझ रहा था। तभी पिताजी के कहने से मैंने पंजाब छोड़ा और देशभर में एक डेढ़ साल तक घूमता रहा और उसके बाद भोपाल में अपना ठिकाना बनाया। यहां किराए की दुकान और मकान लिया। भोपाल में किसी ने बताया कि इंदौर बढिय़ा रहेगा तो भोपाल छोडक़र इंदौर आ गया। इंदौरवासियों का इतना सहयोग और प्यार मिला कि मैं जीवनभर भूल नहीं सकूंगा। प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत के मुख्य अंश…

सवाल : आप पंजाब के रहने वाले हैं, आपने बिजनेस के लिए इंदौर को चुना, इसके पीछे क्या राज है?
जवाब : मैं पंजाब के खन्ना का रहने वाला हूं। उन दिनों पंजाब आतंकवाद की आग में झुलस रहा था। उन दिनों पंजाब में हर दिन आतंकवादी घटनाएं हो रही थीं। तभी पिताजी ने हम चार भाइयों को बोला कि आप चारों पंजाब से कहीं और जाकर बस जाएं। पिताजी की आज्ञा लेकर मैंने म.प्र. का रुख किया। हाथ में कुछ नहीं था। पंजाब में जितनी प्रॉपर्टी थी, वह बेच दी। चूंकि वहां आतंकवाद के चलते प्रॉपर्टी भी औने-पौने दाम पर ही बिकी। कुल मिलाकर पूंजी के नाम पर हमारे पास कुछ भी नहीं रहा। पंजाब से सबसे पहले भोपाल आया। यहां कुछ महीने रुका, इसी बीच बिजनेस के लिए किसी ने बताया कि इंदौर ही बेस्ट रहेगा। फिर मैं 1991 में इंदौर आ गया। इंदौरवासियों ने मुझे इतना प्यार दिया, सहयोग किया कि मैं उनका जीवनभर कर्जदार रहूंगा। इंदौरवासियों को घमासान डॉटकॉम के माध्यम से बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं।

सवाल : इंदौर में आपके करियर की शुरुआत कब हुई?
जवाब : 1984 में पंजाब में बिजनेस करता था। वहा आंतकवाद बढऩे से पंजाब से 1991 में म.प्र. आ गया। यहां आकर पहले दवाई का काम किया, इसमें सफलता नहीं मिली। इसके बाद लोहामंडी में बाबाजी स्टील के नाम से लोहे का कारोबार शुरू किया। इसमें कुछ सफलता मिली तो 1996-97 में इंदौर में मंडी गोविंदगढ़ स्टील प्रालि के नाम से यहां रोलिंग मिल की स्थापना की।

सवाल : बिजनेस में आपको काफी संघर्ष भी करना पड़ा होगा?
जवाब : दरअसल जब मैं इंदौर आया था, तब मेरे पास कुछ भी नहीं था। एक समय तो ऐसा भी आया जब दो जून की रोटी भी नसीब नहीं होती थी। इन दिनों मैंने पुड़ी भी बेची। इसके बाद मैंने पंजाब से ही पलंग की पत्तियां और शटर की पत्तियां मंगवाई, चूंकि ये पत्तियां जब भी इंदौर में नहीं बनती थी, इसलिए पंजाब से उधारी में मंगवाई और इंदौर में बेची। इस काम में एक ट्रक के पीछे करीब दो हजार रुपए में बच जाते थे। इसके बाद धीरे-धीरे यही काम बढ़ता गया और कुछ साल तक यह सिलसिला चलता रहा। फिर मैंने पलंग और शटर में लगने वाली पत्तियों का मैन्युफेक्चरिंग इंदौर में ही शुरू किया। इसके लिए सांवेर रोड औद्योगिक क्षेत्र में रोलिंग मिल डाली और आज हम पूरे मध्यप्रदेश में माल सप्लाय कर रहे हैं।

सवाल : आपकी शिक्षा कहां से हुई?
जवाब : मैंने मुजफ्फर नगर से एमकॉम किया। यूनिवर्सिटी में मेरी दूसरी पोजिशन रही।

सवाल : बिजनेस में आपके साथ और कौन मदद करता है?
जवाब : बिजनेस में मेरे साथ मेरा लडक़ा सजल मित्तल भी मेरे साथ ही रोलिंग मिल का काम देखता है।

सवाल : आप और किन-किन संस्थाओं से जुड़े हैं?
जवाब : एसोसिएशन ऑफ इंडस्ट्रीज म.प्र. (एआईएमपी) का कार्यकारिणी सदस्य हूं। इंदौर रोलिंग मिल एसोसिएशन का पिछले दस साल से अध्यक्ष हूं। इसके अलावा अग्रवाल समाज की संस्थाओं से जुड़ा हूं।

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