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मैं बड़ी कश्मकश में होता हूँ…

Posted on: 29 Jan 2019 18:36 by mangleshwar singh
मैं बड़ी कश्मकश में होता हूँ…

राहुल इलाहाबादी का लेख

जब देखता हूँ उन लड़कियों को जिन्होंने अपने २५ वे २६ वे बसंत में ही एक शानदार एकेडमिक करियर खड़ा कर लिया है। सफल है, बेहतर है, स्वच्छंद है, प्रयोगवादी है और सबसे जरूरी कि अपनी एक अलग सोच, अपनी एक अलग पहचान रखती हैं। जिंदगी जिया कैसे जाता है बेहतर समझती हैं। दुनियाँ समाज से अपने हक़ के लिये लड़ के निकलती है और खुद का अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व चुना है, बुना है।

लेकिन फिर उन्ही लड़कियों को किसी नाकाबिल या उनके लिये कमज़र्फ दिल वाले लड़के के लिए भागते देखता हूँ, रोते देखता हूँ। अपनी सारी उपलब्धियों को उस लड़के के कदमों में रख खुद को चाहने, प्यार करने की मन्नते माँगते देखता हूँ। उसके ठुकरा देने पर जिंदगी खत्म करने या ज़िन्दगी खत्म होने की बातेें करते देखता हूँ। अपना स्वाभिमान दांव पर लगाते देखता हूँ तो सचमुच बहुत कुछ बदलता देख के भी कुछ नही बदल सकता की हताशा ओढ़ लेता हूँ।

दूसरी ओर देखता हूँ उन लड़कियों को जिन्होंने अपने संघर्ष,अपने सपनों और कुछ कर गुजरने की ज़िद के चलते अपनी उम्र की परवाह नही की, शादी विवाह के सामाजिक बंधनो की चिंता नहीं की। समाज द्वारा थोपी गई उस शादी ब्याह की ‘सही उम्र’ को वह अपनी लड़ाई में कब पार कर गई उन्हें खुद भी नहीं पता चला। तब हमारा यही समाज उन्हें खराब लड़की के तमगे से नवाज़ देता है। तमाम तरह के झूठ फरेब सुने सुनाये जातें हैं। उनके चरित्र के कसीदे सरेआम सुने सुनाये और सुलझाये जातें है, ड्राइंग रूम में बैठ कर अपनी लड़कियों को उस तरह न बनने की सलाहें पिलाई जाती है।

ऐसी लड़कियाँ लड़कियों की जात की अस्पर्श लड़की बना दी जाती है और भुला दिए जाते हैं उसके सारे संघर्ष, उसके सारे तमगे, उसकी सारी संवेदनाये, उसकी अभावों के इतर लड़ने और आगे बढ़ने की ललक को। क्योंकि अपने हक की बात करने वाली, आंखों में आंखें डालकर बात करने वाली, बालों को खोलकर चलने वाली, जीन्स पहनने वाली, छोटे बाल रखने वाली, जोर जोर से हँसने वाली, लड़को के साथ घूमने वाली, पुरुषों के दम्भ को तोड़ने वाली लड़कियाँ कहाँ पसंद है समाज को।

~ माँ की बातों से उपजा ज्ञान

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