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पुराना भूलने से कैसे काम चलेगा ? कमलेश पारे की कलम से….

Posted on: 19 Jun 2018 11:28 by krishnpal rathore
पुराना भूलने से कैसे काम चलेगा ? कमलेश पारे की कलम से….

सभ्य समाज के सदस्य होने के नाते,सबसे पहले तो इस बात पर सहमत हुआ जाए कि जो भी अपने से असहमत हैं,वे आवश्यक रूप से अपने विरोधी या शत्रु नहीं हैं.किसी कुंठा में निकले उनके कुछ कड़वे शब्दों पर उन्हें शत्रु मानकर या पूर्वाग्रही कहकर,शायद हम ‘सच’को अपमानित करते हैं या न्याय तो नहीं ही करते.ईश्वर के विराट में अरबों-खरबों लोग हैं,सबको अपने प्रसाद या कृपा के रूप में ईश्वर ने मनुष्यों का नेतृत्व या व्यवस्था में निर्णय के स्थान पर बैठने का जिम्मा नहीं सौंपा है.अतः जिन भी मनुष्यों को ये अवसर मिले हैं,वे इस बात को महसूस करें व दूसरे के सच को एक बार देख या दिखवा तो लें.शायद उन्हें अपने आपको सुधारने का ही विचार आ जाए.यह मैं इसलिए कह रहा हूँ कि अभी कल-परसों पंद्रह जून को ही मुख्यमंत्रीजी ने ‘स्कूल चलें हम अभियान 2018 ‘की शुरुवात करते हुए कहा है कि शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाना व समाज को शिक्षा से जोड़कर उसके साथ जिम्मेदारियों को साझा करना उनकी सरकार की प्राथमिकता होगी.शिक्षा को बोझिल न बनाने की बात सहित उन्होंने अपने संग्रह की कुछ किताबें भी विद्यालयों को देने जैसी कई अच्छी बातें की व कहीं.Image result for मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान स्कूल चले हम

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माना कि थका देने वाली चौबीस घंटे की राजनीति में व्यस्त मुख्यमंत्रीजी को शायद याद न हो,पर अफसर कैसे भूल गए कि हमारे ही मध्य प्रदेश में शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए वर्ष 2011 को ‘शिक्षा के गुणवत्ता वर्ष’के रूप में मनाया गया था.मुख्यमंत्रीजी को भले ही न बताएं,अफसर सिर्फ अपने आप को जवाब दे दें कि क्या वे योजनाएं अभी भी चल रही हैं ? क्या उनमें शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने और बेहतर जनभागीदारी सुनिश्चित करने का भाव नहीं था ?क्या मध्यप्रदेश शासन के उच्च शिक्षा विभाग का नियंत्रण पाकिस्तान से होता है,जो उसकी योजनाओं को अपने ही राज्य के स्कूली शिक्षा विभाग ने नहीं देखा. शिक्षा में गुणवत्ता लाने या उसका श्रेष्ठ प्रबंधन करने के लिए मध्य प्रदेश शासन ने ही एक बहुत सुन्दर पुस्तक छापकर सबको भेजी थी..उसमें तो यह सब सात साल पहले लिखकर इसे मध्य प्रदेश राज्य के संकल्प की संज्ञा दी गई थी.वह योजना ठन्डे बस्ते में क्यों चली गई ? इसी योजना पर मुख्यमंत्रीजी से बात क्यों नहीं की गई ?इस सबके बावजूद,वह प्रतिष्ठा योजना आज भी मध्यप्रदेश सरकार की वेबसाइट पर शान से लिखी है.मुख्यमंत्रीजी,आपने अपने संग्रह से कुछ पुस्तकें बच्चों के लिए देकर एक मिसाल क़ायम की है.लेकिन,एक वयोवृद्ध सेवानिवृत्त प्राचार्य का कहना था कि उन्हें आज भी इस बात का दुःख है कि वे अपनी पदस्थी के दौरान विद्यालयों में रखी कुछ अप्राप्य,अमूल्य व अद्भुत पुस्तकें घर क्यों नहीं ला पाए,क्योंकि वे उन स्कूलों में आजकल पड़ी सड़ रही हैं.किसी ने उनको हाथ भी नहीं लगाया,क्योंकि अफसरों ने शिक्षकों को लगभग ‘हांकने’की मुद्रा में रखा है.इसलिए चाहे स्कूल हो या कॉलेज,अकादमिक माहौल सब जगह एक सा है.अपने ही प्रदेश में स्कूलों में सत्तावन प्रतिशत शिक्षक अप्रशिक्षित हैं.जो प्रशिक्षित हैं वे प्रशिक्षण के दौरान मिली आधी से ज्यादा चीजें भूल गए हैं.शिक्षक तैयार करने वाले सभी संस्थान बीमार हैं.स्कूलों की खेल-भूमि पर अतिक्रमण हो गए हैं.इस दर्द को बिलकुल भी छोटा न समझें.Image result for स्कूल चले हम

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पंद्रह जून को ही सरकार ने 39 नए कालेज खोलने का निर्णय भी लिया है.अपने प्रदेश के महाविद्यालयों में पढ़ाने वाले प्राध्यापकों (हाँ,अब महाविद्यालयों में पढ़ाने वाले सब,शासन के हाल ही निकले एक आदेश से प्राध्यापक हो गए हैं)के 6000 पद पहले से खाली हैं.लोकसेवा आयोग ने 3400 पदों के लिए विज्ञापन निकाले हैं.लेकिन,तीन-चार साल से इस प्रक्रिया में भी रोज रोज नयी-नयी विघ्न-बाधाएं आ रही हैं.अतिथि शिक्षक आते-आते सितम्बर अक्टूबर आ जाएंगे तो फिर पढ़ाई कब होगी ?इसी समस्या के समाधान के रूप में एम्बेसेडर प्रोफ़ेसर योजना व प्रतिभा बैंक योजना बनी थीं.शब्दों,जुमलों,दावों और वादों की झाड़ियों में खड़े,उम्मीदों के इस जंगल में हम सब क्यों गुमें ? अपनी ही पुरानी और अच्छी योजनाओं को खोलकर क्यों नहीं देख लेते.अपने ही प्रदेश में बड़ी शान से शुरू हुई इन ‘एम्बेसेडर-प्रोफ़ेसर योजना’और ‘प्रतिभा बैंक योजना’को अभी के जिम्मेदार अफसर देख तो लें.वे क्यों ठन्डे बस्ते में पड़ी हैं,ये तो बाद में देख लिया जाएगा,पर उन पर ध्यान देने से आज तो मुख्यमंत्री की बात रह जायेगी.बात मानिये,इन्हीं मुख्यमंत्रीजी के नेतृत्व वाली सरकार की वे योजनाएं हैं,जो स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के साथ सामाजिक सहयोग या भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए काफी हैं.इनसे स्कूल हों या कॉलेज सबका काम हो जाएगा.
सेवानिवृत्त शिक्षाविद डॉ.कपूरमल जैन कहते हैं कि इन योजनाओं के लागू होने वाले वर्षों में ही छोटे शहरों और कस्बों के शिक्षा परिसरों में ‘ऐकडेमिक परफॉरमेंस इंडीकेटर्स’में उत्साह जनक परिणाम आये थे.इस प्रगति के दस्तावेजी प्रमाण भी हैं.इन्हीं के कारण एक ही प्रभारी प्राचार्य के रहते बिना एक भी प्रोफ़ेसर के कस्बाई महाविद्यालयों के रिजल्ट सुधरे थे.Image result for स्कूल चले हम

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खैर,अब प्याज के छिलके निकालने के बजाय सोचें कि राजनैतिक नेतृत्व की प्राथमिकताएं बहुत सारी हैं,ऊपर से दूसरे तनाव और व्यस्तताएं अलग हैं.अकादमिक नेतृत्व अपनी ओर से संवैधानिक नेतृत्व को याद तो दिलाये कि हमारी ही अच्छी योजनाएं यदि लागू हो जाएं, तो अपने सब सपने पूरे हो सकते हैं.

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