1952 से अबतक ऐसा रहा लोकसभा चुनाव | History of Loksabha Election

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चुनाव आयोग ने ​लोकसभा चुनाव का बिगुल बजा दिया है। चुनाव आयोग ने 10 मार्च को दिल्ली के विज्ञान भवन में प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर तारीखों का ऐलान कर दिया था। तारीखों के ऐलान के साथ ही पूरे देश में आचार संहिता लागू हो गई है। चुनाव आयोग इस दौरान विधानसभा चुनाव की तारीखों का भी ऐलान किया था।

आज हम आपको बताते है कि देश में कब-कब लोकसभा चुनाव हुए है ओरे पहला लोकसभा चुनाव कब हुआ था. स्वतंत्र भारत में पहली बार 1952 में लोकसभा का गठन हुआ

पहला लोकसभा (1952)

देश में पहली बार 1952 में लोकसभा का गठन हुआ था। पहले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी 364 सीटों के साथ सत्ता में आई थी। इसके बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू देश के पहले निर्वाचित प्रधानमंत्री बने। उनकी पार्टी ने मतदान के 75.99 प्रतिशत वोट प्राप्त कर विरोधियों को स्पष्ट रूप से हरा दिया। 17 अप्रैल, 1952 को गठित हुई लोकसभा ने 4 अप्रैल, 1957 तक का अपना कार्यकाल पूरा किया।

पहला लोकसभा चुनाव 489 निर्वाचन क्षेत्रों में निर्वाचित हुआ था, जिसमें 26 राज्यों का प्रतिनिधित्व किया गया। जी.वी. मावलंकर पहली लोकसभा के अध्यक्ष बने थे।

दूसरी लोकसभा (1957)

1957 में हुए दूसरे लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस अपना परचम लहराने में कामयाब हुई। कांग्रेस ने 490 सीटों में से 371 सीटें जीती. जीत के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू सत्ता में वापस लौटे। 11 मई, 1957 को एम. अनंथसायनम आयंगर को सर्वसम्मति से नई लोकसभा अध्यक्ष चुना गया। इन चुनावों की ख़ास बात ये रही कि इसमें कोई महिला उम्मीदवार नहीं थी। दूसरी लोकसभा ने 31 मार्च 1962 तक का अपना कार्यकाल पूरा किया।

तीसरी लोकसभा (1962)

तीसरी लोकसभा अप्रैल 1962 में बनाई गई थी। उस समय पाकिस्तान के साथ हमारे संबंध खराब बने हुए थे। 1962 में भारत-चीन के युद्ध में चीनी सेना भारतीय सेना से श्रेष्ठ साबित हुई. इसकी आलोचना होने के बाद नेहरू ने तत्कालीन रक्षामंत्री कृष्ण मेनन को हटा दिया और उन्हें अमेरिका की सैन्य सहायता लेने के लिए बाध्य होना पड़ा। 27 मई 1964 को नेहरु का निधन हो गया था. नेहरूजी की मौत के बाद 2 सप्ताह के लिए वयोवृद्ध कांग्रेसी नेता गुलजारीलाल नंदा ने उनकी जगह ली। कांग्रेस द्वारा लालबहादुर शास्त्री को नया नेता चुने जाने तक उन्होंने कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में काम किया।

प्रधानमंत्री पद के लिए शास्त्रीजी एक संभावित विकल्प नहीं थे जिन्होंने शायद अप्रत्याशित रूप से 1965 में पाकिस्तान पर जीत दिलाने में देश का नेतृत्व किया। शास्त्री और पाकिस्तान के राष्ट्रपति मोहम्मद अय्यूब खान ने पूर्व सोवियत संघ के ताशकंद में 10 जनवरी 1966 को एक शांति संधि पर हस्ताक्षर किए। शास्त्री के देहांत के बाद नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने से पहले एक बार फिर नंदा को एक महीने से कम समय के लिए कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाया गया। 24 जनवरी 1966 को इंदिरा गाँधी प्रधानमन्त्री बनीं।

चौथी लोकसभा (1967)

अप्रैल 1967 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 283 सीटों पर जीत प्राप्त करने में सफल हुई। इस चुनाव में कांग्रेस को बड़ा झटका सहना पड़ा, क्योंकि बिहार, केरल, उड़ीसा, मद्रास, पंजाब और पश्चिम बंगाल में गैर-कांग्रेसी सरकारें स्थापित हुईं। इस दौरान मोरारजी देसाई को भारत का उपप्रधानमंत्री और भारत का वित्तमंत्री नियुक्त किया।

पांचवीं लोकसभा (1971)

1971 के के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी ने कांग्रेस को भारी बहुमत से जीत दिलाई। ‘गरीबी हटाओ’ के चुनावी नारे के साथ प्रचार करते हुए वे 352 सीटों के साथ संसद में वापस आईं।  1971 में इंदिरा गांधी ने भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान साहसिक निर्णय लिया जिसके परिणामस्वरूप बांग्लादेश मुक्त हो गया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 12 जून 1975 को चुनावी भ्रष्टाचार के आधार पर उनके 1971 के चुनाव को अवैध ठहरा दिया। इस्तीफे के बजाय, इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा की और पूरे विपक्ष को जेलमें डाल दिया। 1977 में हुए चुनाव में जन मोर्चा नाम के पार्टियों के गठबंधन से उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

छठवीं लोकसभा (1977)

1977 के लोकसभा चुनाव में मुख्य मुद्दा कांग्रेस सरकार द्वारा आपातकाल की घोषणा मुख्य मुद्दा बना था। चुनाव की घोषणा के बाद इंदिरा गांधी ने सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा कर दिया। इस चुनाव में स्वतंत्र भारत में पहली बार कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। जनता पार्टी के नेता मोरारजी देसाई ने 298 सीटें जीतीं और 24 मार्च को पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने।

सातवीं लोकसभा (1980)

1979 में जनता पार्टी विभाजित हो गई अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने पार्टी छोड़ दी और बीजेएस ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। देसाई ने संसद में विश्‍वास मत खोने के बाद इस्तीफ़ा दे दिया। जून 1979 में चरण सिंह ने प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। इस दौरान कांग्रेस ने समर्थन का वादा किया लेकिन बाद में पीछे हट गई। जनवरी 1980 में चुनाव की घोषणा हुई। कांग्रेस ने लोकसभा में 351 सीटें जीतीं और जनता पार्टी या बचे हुए गठबंधन को 32 सीटें मिलीं।

आठवीं लोकसभा (1984)

31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई। इसके बाद राजीव गांधी ने अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। फिर इसी साल 1984 में चुनाव की घोषणा हुई और कांग्रेस ने भारी बहुमत से जीत हासिल की। कांग्रेस ने 409 लोकसभा सीटें और तेलुगुदेशम पार्टी 30 सीटों के साथ संसद में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई। यह भारतीय संसद के इतिहास के उन दुर्लभ रिकॉर्डों में से एक है, जिसमें कोई क्षेत्रीय पार्टी मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी।

नौवीं लोकसभा (1989)

1989 में हुए नौवीं लोकसभा का चुनाव राजिव गांधी के नेतृत्व में लड़ा गया था। यह चुनाव राजनितिक इतिहास में कई मायनों में ऐतिहासिक रहा। उस समय जाति और धर्म के आधार पर वोट मांगना केंद्रबिंदु बन गया था। 525 लोकसभा सीटों के लिए 22 नवंबर और 26 नवंबर 1989 को 2 चरणों में यह चुनाव आयोजित हुए। राष्ट्रीय मोर्चे के सबसे बड़े घटक जनता दल ने 143 सीटें जीतीं और वाममोर्चे और भारतीय जनता पार्टी के बाहरी समर्थन से सरकार बनाई।

विश्‍वनाथ प्रताप सिंह भारत के 10वें प्रधानमंत्री बने। उन्होंने 2 दिसंबर, 1989 से 10 नवंबर, 1990 तक कार्यभार संभाला। दरअसल, लालकृष्ण आडवाणी द्वारा राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मुद्दे पर रथयात्रा शुरू करने और मुख्यमंत्री लालू यादव द्वारा बिहार में आडवाणी को गिरफ्तार किए जाने के बाद भाजपा ने वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया। इस दौरान विश्वास मत हारने के बाद वीपी सिंह ने इस्तीफा दे दिया।

इसके बाद चंद्रशेखर 64 सांसदों के साथ जनता दल से अलग हो गए और उन्होंने समाजवादी जनता पार्टी बनाई। उन्हें बाहर से कांग्रेस का समर्थन मिला और वह भारत के 11वें प्रधानमंत्री बने। हालांकि उनकी ये सरकार भी ज्यादा दिन चल पाई। कांग्रेस ने उनपर आरोप लगाया कि सरकार राजीव गांधी की जासूसी करा रही है, जिसके बाद 6 मार्च, 1991 को उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया।

दसवीं लोकसभा (1991)

चुनाव मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने और राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के चलते 10वें लोकसभा चुनाव को मंडल-मंदिर चुनाव भी कहा जाता है। इस चुनाव में कांग्रेस 232 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी थी, वही भाजपा ने 120 सीटों पर जीत दर्ज की थी। मतदान के पहले दौर के एक दिन बाद तमिलनाडु में चुनाव प्रचार के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या कर दी गई थी।

ग्यारहवीं लोकसभा (1996)

11वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव परिणामों से एक बार फिर त्रिशंकु संसद बनी और 2 वर्ष तक राजनीतिक अस्थिरता रही। इस दौरान 3 प्रधानमंत्री बने. भाजपा को 161 सीटें और कांग्रेस को 140 सीटें मिलीं। अटल बिहारी वाजपेयी ने 16 मई को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और 13 दिनों के बाद इस्तीफ़ा दे दिया। जनता दल के नेता देवेगौड़ा ने एक जून को संयुक्त मोर्चा गठबंधन से सरकार बनाई, जो 18 महीने चली। इसके बाद देवेगौड़ा के विदेश मंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने अप्रैल 1997 में प्रधानमंत्री के रूप में पदभार संभाला।

बारहवी लोकसभा

11वीं लोकसभा का कार्यकाल बहुत छोटा रहा। मई 1996 में हुए आम चुनावों से 18 महीने बाद ही 28 नवंबर 1997 को सरकार गिर गई। इसके बाद चुनाव आयोग ने 4 दिसंबर 1997 को चुनाव की घोषणा की और 10 मार्च 1998 को बारहवी लोकसभा का गठन हुआ और अटल बिहारी वाजपेयी ने 19 मार्च को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। हालांकि इस लोकसभा का कार्यकाल केवल 413 दिन चला। 17 अप्रैल को एक वोट से वाजपेयी सरकार गिर गई।

तेरहवीं लोकसभा (1999)

17 अप्रैल 1999 को अटल बिहारी वाजपेयी सरकार लोकसभा में विशवास मत साबित नहीं कर पाई और जयललिता के नेतृत्व वाली अन्नाद्रमुक के पीछे हटने के एक वोट से सरकार गिर गई थी। मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस- क्षेत्रीय और वामपंथी समूहों के साथ मिलकर बहुमत वाली सरकार बनाने के लिए पर्याप्त समर्थन नहीं पा सकी। इसके बाद 26 अप्रैल को तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन ने लोकसभा भंग कर दी।

लोकसभा चुनाव के लिए चुनाव आयोग ने 4 मई की तारीख घोषित कर दी। 1999 के यह चुनाव 40 महीने में तीसरी बार हो रहे थे क्योंकि पिछले चुनाव 1996 और 1998 में आयोजित हुए थे। चुनावी धोखाधड़ी और हिंसा को रोकने के लिए देश के 31 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में यह चुनाव 5 हफ्ते तक चला था।6 अक्टूबर को आए परिणाम में राजग को 298 सीटें मिलीं तथा कांग्रेस और उसके सहयोगियों को 136 सीटों पर विजय प्राप्त हुई थी। 13 अक्टूबर को अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।

चौदहवीं लोकसभा (2004)

चौदहवीं लोकसभा के चुनाव 4 चरणों में 20 अप्रैल से 10 मई 2004 के बीच के बीच हुए। इस चुनाव में वाजपेयी सरकार सत्ता विरोध लहर को नहीं हरा पाई और सोनिया गांधी के मार्गदर्शन में कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने 543 सीटों में से 335 सीटें जीती थी। चुनाव के बाद हुए इस गठबंधन को संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) कहा गया।

ख़ास बात तो ये है कि जीत के बाद सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने से इनकार कर दिया था। उन्होंने पूर्व वित्तमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को यह दायित्व उठाने के लिए कहा था। गौरतलब है कि मनमोहन सिंह नरसिंहराव की सरकार में 1990 के दशक की शुरुआत में अपनी सेवाएं दे चुके थे।

पंद्रहवीं लोकसभा (2009)

मई 2009 में हुए15वीं लोकसभा में यूपीए ने जनादेश हासिल किया। इस दौरान मनमोहन सिंह को एक बार फिर देश का नेतृत्व करने का अवसर मिला।

सोलहवीं लोकसभा (2014)

2014 लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई। भाजपा ने इस दौरान 282 सीटें जीतीं थी। 26 मई को नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।

 

 

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