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सच, क्या लिखेंगे

Posted on: 09 Feb 2019 12:41 by Pawan Yadav
सच, क्या लिखेंगे

अमित मंडलोई

बुजुर्ग नेता ने देह त्याग दी। जन संवेदनाएं उमड़ पड़ी। निकाल लाए आंखें नम करने को ढेर सारे किस्से। कब, कहां, क्या किया, कैसे किया। किसके लिए झंडे उठाए, नारे लगाकर बंद दरवाजे खुलवाए। कहां अड़ कर खड़े हुए, कहां झुककर स्वीकार कर लिया। किसकी भूख-प्यास के लिए लड़ाई लड़ी। संघर्ष की कहानियां सुन-सुनकर गला रुंध गया। खालीपन महसूस हुआ, मन के भीतर तक नमी पसर गई। कहीं संकल्प का बीज पड़ता नजर आया, कोई काम भी क्या नहीं कर सकते हम भी, छोटा सा ही सही। तब लगा जीवन ऐसे ही सार्थक होता है, अगर इस अहसास का मनुष्यांतर हो पाए।

तब समझ आता है, देह के ताप सिर्फ देह ही नहीं भुगतती, पीढिय़ां उनका उत्सव मनाती या बोझ ढोती फिरती है। श्रम स्वेद उनके मस्तक का अभिषेक करते हैं तो छल उसे धड़ से अलग कर चरणों में पटक देते हैं। दुनिया को कहानी चाहिए, उसे कहना और सुनना पसंद है। दोहराते रहने में आनंद महसूस करती है। कहानी फिर उजली हो या स्याह उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। मगर फर्क उसे पड़ता है, जो उस किस्से का किरदार होता है। तय उसे ही करना होता है कि उसे कहां खड़ा होना है, फिर भी न जाने क्यों वह कहीं और खड़ा होता है। नहीं सोचता इस भूमिका का उसे जवाब देना ही होगा एक दिन। कोई न पूछेगा तो भी खुद से आंख तो मिलाना ही होगी।

फिर खयाल आता है, मृत्यु तो सबको ही आनी है। हम कब तक शोक-संवेदनाओं की इस परंपरा को जीवित रख पाएंगे। कितने सच में बचे हैं, जिनके जाने पर शोक भी हो और संवेदनाएं भी जागे। जो चेहरे आसपास नजर आते हैं, उनके लिए ऐसे ही किस्से क्या कहीं से लेकर आ पाएंगे। जानता हूं चारण तो सब ढूंढ लाएंगे, लेकिन ढूंढकर लाने के मायने ही क्या है। और हो सकता है इससे भी विराट सभाएं हों, भीड़ उमड़े, आंसू फूटे। उनका दरिया बह निकले। उस दौरान भी मगर मन में भले सब दोहराते रहें, करो तो कुछ ऐसा जो सात पुश्तों तक का इंतजाम हो जाए। जो किया सब देह के साथ चला गया, लेकिन पीढिय़ों का तनाव तो दूर कर गया।

लेकिन क्या उस भीड़ में कोई एक होगा, जो सच में यह सोचने का साहस जुटा पाएगा किसी एक छोटे से किस्से को सुनकर। हां कुछ ऐसा किए जाने की जरूरत है। या जो होगा भी तो वह भी यही सोचेगा कि अगर करना ही हो, तो यह सब किसी सूरत में नहीं करना होगा। और जो सोचकर देखिए कि खुदा न खास्ता कभी कोई चमत्कार हो जाए, ईश्वर तय कर दे कि अंतिम स्थल पर कोई कसम खाकर भी झूठ नहीं बोल पाएगा। मन कितना ही कड़ा कर ले, पसीना बहा ले, लेकिन मुंह खोलेगा तो सिर्फ और सिर्फ सच ही निकलेगा। बिना गीता-कुरान की कसम खाए दिवंगत के बारे में खालिस हकीकत ही बयां करना होगी।

फिर सोचो लोग क्या कहने को विवश होंगे। कैसे भरोसे की हत्या की। क्षमताओं का दुरुपयोग किया। संसाधनों को कठपुतली बनाया, झूठ का आडंबर रचा। जेबे काटीं, पेट पर लात मारी। रीढ़ निकाली, घुटनों के बल चलने को विवश किया। किसके इशारों पर नाचे, किसको अपने सामने नचाया। किन्हें बढ़ाया, किसे बैठाया और किसे धक्का मार कर चलता कर दिया। उस क्षण क्या नहीं टूट जाएगा सारा पाखंड। छिन्न-भिन्न हो जाएंगे कसीदे जो पढ़वाए गए चारणों से। यहां-वहां किसी तरह छपवाए गए। खालिस सच का सामना निस्तेज और निर्जीव देह भी कर पाएगी क्या। इतनी भी गुंजाइश कहीं दिखाई दे रही है।

फिर हिसाब तो सभी का और पूरा ही होगा ना। तुम्हारी देह के सामने खड़े होकर पूछा जाएगा, दोहराया जाएगा। तुम्हारे आखेट के किस्से तब शौर्य गाथा नहीं रक्त के फव्वारे बनकर फूटेंगे। आंसुओं की बाढ़ नहीं आ जाएगी, जो हर रोती आंख वहां आकर मिल जाएगी। एक-एक बूंद गर हिसाब मांगने लगेगा तो क्या जवाब दे सकोगे। और यह बात किसी एक किरदार, सिपहसालार या बादशाह सलामत की नहीं है। यह बात तो हर उस चेहरे की है, जो आईने में दिखाई देता है, आंखों के सामने खड़ा होता है। मैं भी, तुम भी, वह भी, हम सब भी।

और सच मानें, आखिर में यही निष्कर्ष लेकर लौटता हूं कि अगर वहां सच बोलना अनिवार्य हो जाए तब भी शायद ही कुछ बदलेगा। सच बोलने और सुनने से बेहतर शायद लोग वहां जाना ही छोड़ दें। या फिर मौन व्रत रख लें। अभी भी तो उसी मौन में जी रहे हैं, लेकिन फिर डरते हैं, क्योंकि जानते हैं यह मौन भी किसी दिन तो फटेगा ही। भले ही फिर आखिरी में कपाल क्रिया के ठीक पहले, हड्डियों की ताकत से कुछ ज्यादा जोर से ही सही।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। फेसबुक वॉल से साभार।

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