हिंदी के पहले क्रिकेट कमेंटेटर जसदेव सिंह नहीं रहे, प्रसिद्ध पत्रकार राजेश बादल की कलम से

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जसदेव सिंह अब नहीं रहे -ख़्याल भी एकबारगी हिला देता है ।जाना तो सबको है । सब क्यू में हैं लेकिन जब वो जाता है जो आपके अंदर किसी कोने में अपना सा बनकर बैठा GBरहता है तो बड़ी वेदना होती है ।उसे शब्दों में व्यक्त करना मुश्किल होता है।

उनकी हॉकी कमेंट्री और 26 जनवरी की परेड का बेमिसाल आँखों देखा हाल ।भरपूर रिसर्च,अदभुत सूचनाएँ, संतुलित और प्रभावशाली अंदाज़ । कौन भूल सकता है ? इंदिरागांधी ने एक बार उन्हें सम्मानित करते हुए कहा था ,आप दिल की धड़कनें तेज़ कर देते हैं ‘

इस महानायक से पहली मुलाक़ात जयपुर में हुई थी। शायद 1987 या 1988 में । मेरा चयन दूरदर्शन में न्यूज़ एंकर के तौर पर हुआ था। तब वे आए थे। हम लोगों को आवाज़ की दुनिया के मंत्र बताने के लिए। काफी देर इस पर चर्चा हुई कि ख़बर संप्रेषित करते समय एंकर के चेहरे और आवाज़ में कोई भाव होना चाहिए अथवा नहीं ।

उनका कहना था – होना चाहिए ।ओलिम्पिक में स्वर्णपदक जीतने की ख़बर आप किसी निधन की खबर या भाव शून्य होकर नहीं दे सकते । उन्होंने अपने तर्कों से उन लोगों को निरुत्तर कर दिया था,जो कहते थे कि एंकर को ख़बर से रिश्तेदारी नहीं दिखाना चाहिए । इसके बाद हमारी नियमित मुलाक़ातें होती रहीं ।

एक बुजुर्ग के तौर पर वो एक भले और आत्मीय शुभचिंतक बने रहे। अंतिम संपर्क हुआ ,जब मैं विरासत श्रृंखला के तहत हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद पर फ़िल्म बना रहा था । उनका साक्षात्कार कराया था । इस साक्षात्कार में उन्होंने बताया था कि मेजर ध्यानचंद को बीमारी की हालत में एम्स लाया गया था और उन्हें यूँ ही बरामदे में लिटा दिया था । जसदेव जी को पता चला तो भागे आए । एम्स के डॉक्टरों को फटकार लगाई । जब डॉक्टरों ने नाम सुना तो भौंचक थे ।हाल के बरसों में उन्हें भूलने की बीमारी लग गई थी । सच ! बड़ी तक़लीफ़ हुई थी ।

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