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आडवाणी के आंसू और दर्द पहाड़ी दिग्गज शांता कुमार | Himachal Pradesh’s Former CM Shanta Kumar an Identity of Kangra…

Posted on: 14 May 2019 17:55 by Surbhi Bhawsar
आडवाणी के आंसू और दर्द पहाड़ी दिग्गज शांता कुमार | Himachal Pradesh’s Former CM Shanta Kumar an Identity of Kangra…

हिमाचल प्रदेश के ख्यात पर्यटन स्थल कांगड़ा की एक पहचान वहां के पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार भी रहे हैं। 84 वर्षीय शांता कुमार यहां से एकाधिक बार सांसद रहे। कई बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे और भारत सरकार में मंत्री भी। बीते लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व भाजपाध्यक्ष अमित शाह ने उन्हें मार्गदर्शक मंडल का हिस्सा बनाकर सत्ता की राजनीति से बेदखल कर दिया था, ठीक लालकृष्ण आडवाणी औऱ मुरली मनोहर जोशी की तरह। इस बार इन तीनों का ही लोकसभा का टिकट काटकर सक्रिय राजनीति से भी बेदखल कर दिया गया।

हालांकि बीते चुनाव में शांता कुमार ने डेढ़ लाख मतों से भी ज्यादा के अंतर से जीत दर्ज कराई थी। बुजुर्ग नेताओं के टिकट काटने की शुरुआत इस बार आडवाणी से ही की गई। उसके बाद उनसे मिलने गए शांता कुमार ने मुलाकात के बाद कहा था टिकट कटने के बाद आडवाणीजी की आंखों में आंसू थे। पार्टी नेतृत्व का यह तरीका ठीक नहीं था। उनके लिए कोई और सम्मानजनक रास्ता निकाला जाना चाहिए था। उन्हें इस तरह देखना निश्चित तौर पर पीड़ादायक अनुभव था।

इस तरह की बातें कहने वाले शांता कुमार को कदाचित यह भान रहा होगा कि उनके साथ भी इसी तरह का व्यवहार हो सकता है। वे अकेले नहीं इसी तरह का व्यवहार लोकसभा की अध्यक्ष सुमित्रा महाजन, कलराज मिश्र, उमा भारती व सुषमा स्वराज के साथ भी किया गया। हालांकि स्वराज औऱ भारती को यह अपेक्षा पहले से रही होगा, लिहाजा उन्होंने पहले ही चुनाव लड़ने से मना कर दिया। वहीं सुमित्रा महाजन को चुनाव अभियान बीच में रोककर कहना पड़ा कि मुझे लोकसभा का टिकट नहीं चाहिए।

बहरहाल, कांगड़ा में मतदान के बाद शांता कुमार भी राजनीतिक इतिहास की विषयवस्तु हो गए हैं। उनकी जगह पार्टी ने किशन कपूर को मैदान में उतारा। उनका मुकाबला कांग्रेस के पवन काजल, बहुजन समाज पार्टी के केहर सिंह के साथ हुआ। इसके अलावा स्थानीय राजनीतिक दलों नवभारत एकता दल के प्रेमचंद विश्वकर्मा, स्वाभिमान पार्टी के डॉ. स्वरूप सिंह राणा, हिमाचल जनक्रांति पार्टी के सुभाष चंद और अखिल भारत हिंदू महासभा की निशा कटोच के साथ भी हुआ।

निर्दलियों के बगैर बात कैसे पूरी होती। लिहाजा चंद्रभान, कर्नल नरेंद्र पठानिया, बचन सिंह राणा और डॉ. संजीव गुलेरिया भी मैदान में डटे रहे। मुकाबला जमकर हुआ, लेकिन माहौल किसी का नहीं बना। लहर विहीन चुनाव में यहां से चुनकर दिल्ली तक कौन पहुंचता है इस पर प्रदेश ही नहीं देश की निगाहें लगी हैं। कांगड़ा लोकसभा क्षेत्र के सत्रह विधानसभा क्षेत्रों की जनता तो फैसला ले ही चुकी है।

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