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‘श्राद्ध’ की इस चुनौती में छिपे राजनीतिक स्वार्थ और असंवेदना, अजय बोकिल की कलम से…

Posted on: 31 Oct 2018 09:55 by Mohit Devkar
‘श्राद्ध’ की इस चुनौती में छिपे राजनीतिक स्वार्थ और असंवेदना, अजय बोकिल की कलम से…

ये बयान किसी भी नीयत से दिया गया हो, लेकिन है बेहद हल्का और निहायत संवेदनहीन। बयान कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर अथवा शशि थरूर की ‘आत्मघाती’ शैली का भी नहीं है, बल्कि उससे भी घटिया है। बिना यह सोचे दिया लगता है कि सभी राजनीति के दलदल में गले-गले तक धंसे हुए हैं। शारीरिक व्याधि का शिकार कोई भी हो सकता है। लेकिन उस पर सियासत करना तो सही सोच नहीं है। दरअसल गोवा के मुख्योमंत्री मनोहर पर्रिकर की लंबी बीमारी पर राज्य में कांग्रेस प्रवक्ता जितेन्द्र देशप्रभु ने एक बेहद हल्का और व्यंग्यात्मक सवाल किया कि गोवा के सीएम 14 अक्टूबर से दिखाई नहीं पड़े हैं। न व्यकिगत रूप से और न ही सार्वजनिक रूप से। इससे संदेह होता है कि वो (जिंदा) हैं भी या नहीं? साथ ही उन्होने भाजपा को ‘सलाह’ दे डाली कि वह सीएम का उठावना और श्राद्ध करे ताकि इस बात की पुष्टि हो, क्योंकि राज्य सरकार सीएम की भौ‍तिक उपस्थिति के बिना ही चल रही है। भाजपा ने देशप्रभु की इस घटिया टिप्पणी को सिरे नकार दिया। उसने कांग्रेस के इस बयान को हताशा का परिणाम बताते हुए आरोप लगाया कि कांग्रेस ने राजनीतिक बातचीत के स्तर को गिरा दिया है।
बेशक, गोवा के मुख्यतमंत्री गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं। ऐसे में सरकार वहां एक तरह से अस्पताल से ही चल रही है। बताया जाता है कि ‍पर्रिकर के घर को ही एक अत्याधुनिक अस्पताल में बदल दिया गया है। उनकी पूरी देखभाल की जा रही है। लेकिन वो कब ठीक होंगे, यह बताना मुश्किल है। ऐसे में गोवा में मुख्योमंत्री होकर भी न होने जैसा है। इसलिए देशप्रभु ने यह आरोप भी लगाया कि मुख्यमंत्री के इर्द-गिर्द रहने वाले अधिकारियों का एक समूह उनकी गैरमौजूदगी में अवैध तरीके से निर्णय ले रहा है। कुछ समय पहले तक तो यह बताने से भी परहेज किया जा रहा था कि पर्रिकर को हुआ क्या है? उनकी किस बीमारी का इलाज चल रहा है? इसका खुलासा भी हाल में कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए राज्य के स्वास्थ्य मंत्री विश्वजीत राणे ने यह कहकर किया कि पर्रिकर को पै‍िन्क्रयास का कैंसर है। इस पर देशप्रभु ने चुनौती के अंदाज में मीडिया के सामने कहा कि राज्य में बीजेपी के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार को गोवावासियों के समक्ष यह साबित करना चाहिए कि पर्रिकर जिंदा हैं। उन्होंने मीडिया को भी यह कर लपेटा कि वह पर्रिकर की बीमारी की गंभीरता को कमतर दिखाने की कोशिश कर रहा है। कांग्रेस को शक है ‍कि कहीं ‍पर्रिकर के बारे में कोई ‘गंभीर’ बात छिपाई तो नहीं जा रही है?
इस देश में नेताअों का बीमार होना कोई नई बात नहीं है। इसका प्रमुख कारण अत्यधिक परिश्रम, तनाव तथा स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही भी हो सकता है। खासकर मंत्री बनते ही ‘बीमार’ हो जाने वाले नेताअोंकी संख्या भी कम नहीं है। इसमें सुविधा यह है कि इलाज का तमाम खर्च सरकार अपनी जेब से करती है। यह सुविधा उन्हें मिलती रहे, इसलिए कई दफा ऐसे ‘बीमारू’ मंत्रियों को उनके पद पर कायम रखा जाता है, भले ही उनके विभाग का दैनंदिन काम कोई दूसरा देखे। पर्रिकर भी गंभीर बीमारी जूझ रहे हैं। वे एक अच्छी छवि वाले मंत्री रहे हैं, इसलिए लोगों को उनसे सहानुभूति है। इस बीच मुख्यममंत्री की बीमारी की आड़ में राज्य में राजनीतिक तख्तापलट की कोशिश भी हुई। विधानसभा चुनाव के बाद तत्काल सरकार बनाने में नाकाम रही कांग्रेस ने पर्रिकर की बीमारी में सत्ता पर काबिज होने की संभावना देखी। हालांकि बीजेपी ने ईंट का जवाब पत्थर से देने की शैली में कांग्रेस के विधायकों को ही तोड़‍ लिया।
लेकिन यहां मुद्दा सत्ता की ‘खो-खो’ खेलने का नहीं है बल्कि मानवीय गरिमा तथा राजनीतिक संवेदनशीलता को कायम रखने का है। अत्यंत गंभीर रूप से बीमार होने तथा महीनों से बिस्तर पर पड़े होने पर भी मनोहर पर्रिकर को सीएम बनाए रखना भाजपा की राजनीतिक मजबूरी हो सकता है, लेकिन इसे उन पर राजनीतिक हमले की वजह मान लेने में अोछा राजनीतिक भाव छुपा है। क्योंकि बीमार कौन नहीं होता या नहीं हो सकता? इस देश में कई बड़े नेताअों की गंभीर ‍बीमारियों के बारे में देश को आज भी ठीक से यह मालूम नहीं है कि उन्हें कौन सी बीमारी ने घेर रखा है और क्यों वो जब-तब इलाज कराने विदेश जाते हैं। यह भी सही है कि गोवा में दो और मंत्रियों को पिछले दिनो बीमारी के चलते पद से हटाया जा चुका है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि पर्रिकर के मामले में इतनी रहमदिली क्यों बरती जा रही है? लाचार हालत के बाद भी उन्हें सीएम की कुर्सी पर क्यों ‍िबठाए रखा गया है? इसमें कौन-सी सियासी मजबूरी है? वरना राजनीतिक निर्ममता का तकाजा तो यही है कि ऐसे आदमी को तुरंत पद से हटा दिया जाए।
लेकिन देशप्रभु ने जो प्रश्नवाचक टिप्पणी की, वह इससे भी निचले दर्जे की चीज है। मराठी में कहावत है कि ‘बाप दिखा अन्यथा श्राद्ध कर। इसका अर्थ यह है कि गोलमोल बातों से काम नहीं चलता। अगर बाप जिंदा है तो बेटा उसका श्राद्ध कैसे कर सकता है? अगर वह श्राद्ध कर रहा है तो मान लीजिए कि बाप दुनिया छोड़ चुका है। अर्थात श्राद्ध व्यक्ति के इस संसार में न होने का प्रमाण पत्र है। लेकिन कांग्रेस नेता ने जो टिप्पणी की उसका रिश्ता दरअसल उस ‘राजनीतिक श्राद्ध’ से है, जो किसी भी स्थिति में, किसी भी मुद्दे पर और खासकर सत्ता पक्ष को दुविधा में डालने व उसे रक्षात्मक मोड में लाने की नीयत से किया जाता है। ध्यान रहे कि पर्रिकर से पहले तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता भी साल भर से ज्यादा अस्पताल में रही थीं। लेकिन उनकी सार्वजनिक उपस्थिति न होने पर ‍िकसी ने अम्मा के जीवित होने न होने तथा उनका श्राद्ध कराने की मांग नहीं की थी। अंतत. उन्होंने अस्पताल में ही दम तोड़ा। लेकिन पर्रिकर मामले में लगता है कि कांग्रेस सत्ता में आने के लिए इस कदर बेताब है कि वह कोई विकल्प छोड़ना ही नहीं चाहती। यानी पार्टी बीमार सीएम से सिंहासन खाली कराए और उस पर कांग्रेस को बैठने दे। ‘श्राद्ध’ की इस ‘चुनौती’ में छिपी राजनीतिक अधीरता है, जिससे कम से कम कांग्रेस जैसी पार्टी को तो बचना चाहिए। बीमार तो कांग्रेस सरकार के मंत्री भी रहे हैं, लेकिन उन्हें तुरंत कुर्सी से चलता शायद ही ‍िकया गया हो। माना कि आम आदमी की संवदेना और राजनीतिक संवेदना के तत्व और तकाजे अलग-अलग होते हैं। राजनीतिक संवेदना में दिखावा और सत्ता स्वार्थ होता है, जो व्यक्तिगत संवेदना में कम ही होता है। राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस नेता ने पर्रिकर की सेहत को लेकर जो टिप्पणी की, पार्टी को उसके औचित्य के बारे में आत्मचिंतन करना चाहिए। क्योंकि राजनीितक मौत में तो पुनर्जन्म के सौ मौके मिल सकते हैं, लेकिन व्यक्ति की मौत के बाद तो केवल श्राद्ध ही किया जा सकता है।
‘राइट क्लिक’
( ‘सुबह सवेरे’ में दि. 31 अक्टूबर 2018 को प्रकाशित)

अजय बोकिल

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