क्या हिंदू धर्म फर्जी बाबाअों का चरागाह बन गया है? अजय बोकिल की कलम से

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देश की राजधानी दिल्ली में हाल में पकड़े गए फर्जी बाबा आशु महाराज उर्फ गुरू घंटाल उर्फ आसिफ खान की कहानी इसलिए नहीं चौंकाती कि यह भी धन लोलुपता, लंपटता, पीडि़त और धर्मभीरू हिंदुअों के भावनात्मक शोषण की असमाप्त श्रृंखला की एक और भदेस कड़ी है ‍बल्कि इसलिए क्षुब्ध करती है कि अब लोग धर्म भी बदल कर हिंदुअों का भावनात्मक, शारीरिक और आर्थिक शोषण करने लगे हैं? क्या आशु महाराज ‍सिर्फ इसीलिए मुसलमान से हिंदू बना कि यहां बाबागिरी का धंधा चलने की फुल गारंटी थी? यहां उसे टोकने वाला कोई नहीं था। क्योंकि जो अंध भक्त उसके अनुयायी बने, उन्होंने यह जांचने या जानने की कोशिश भी नहीं की कि जो शख्सन उन्हें उनकी समस्याअो के समाधान के आध्यात्मिक टोटके बता रहा है, वह हकीकत में है क्या और अतीत में क्या था? उसका चरित्र क्या है? जिस बदकिस्मत महिला ने अपनी बेटी के साथ बलात्कार का आरोप आशु महाराज पर लगाया क्या वो अपनी पीड़ा और परेशानी में यह तब बिसरा बैठी कि किस नराधम के हाथों में अपनी बेटी को सौंप रही है?

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क्या आध्यात्मिक अंध भक्ति का कारोबार इतना मुनाफेदार और विवेकशून्य हो गया है कि लोग अपने धर्मों को जेब में रखकर दूसरे धर्मों की बजा रहे हैं ?  यह पूरामा मला वाकई दिल और ‍िदमाग को झकझोरने वाला है। लगता है मानो देश में आसाराम, रामपालसिंह, बाबा राम रहीम, ब्रह्मचारी बाबा जैसे तमाम फर्जी बाबाअों के पाप घड़े में अभी काफी जगह बाकी है। वरना क्या कारण है कि कोई व्यक्ति अपना पारंपरिक धर्म बदल कर दूसरे धर्म में जाकर अपनी आध्यात्मिक और इलाज की दुकान खोल ले और वो धड़ल्ले से वो चलने भी लगे। आशु महाराज का किस्सा कुछ ऐसा ही है। जो कहानी अब तक सामने आई है, उसके मुताबिक ‍आसिफ खान दिल्ली के वजीरपुर स्थित जेजे काॅलोनी में  90 के दशक में एक साइकिल पंचर की दुकान करने चलाता था। दिमाग से तेज और आसिफ ने कुछ साल बाद ही साइकिल पंचर जो़डना बंद कर लोगों की किस्मत के पंचर जोड़ने का कारोबार शुरू कर ‍िदया। उसने 1997 में ज्योतिष विद्या सीखी और लोगों का भविष्य बताना शुरू कर ‍िदया। यह कारोबार भी चल निकला तो उसने बाकायदा रोहिणी इलाके में अपने घर पर ही आश्रम खोल लिया। बाद में उसका तंत्र-मंत्र का गोरखधंधा ऐसा चला कि आज उसके पास करोड़ों की सम्पत्ति है। कई लग्जरी कारें हैं। दिल्ली के पाॅश कहे जाने वाले हौजखास में बड़ा आश्रम है।

उसने ‍रियल एस्टेट में भी खूब पैसा लगाया। पैसा और प्रतिष्ठा हासिल करने के बाद हर बाबा ज्यादा लंपट भी होता जाता है। आशु महाराज भी उसी राह पर चलने लगा। उसने अब कितनी महिलाअों को अपनी हवस का ‍िशकार बनाया, इसका खुलासा होना है। लेकिन अपनी किशोर बेटी की बीमारी से परेशान एक महिला जब उसके सम्पर्क में आई तो बाबा ने इलाज के नाम पर बेटी के साथ गैंगरेप किया। इसमें उसका बेटा समर खान भी शामिल था। महिला ने पुलिस में रिपोर्ट की तो बाबा पहले फरार हुआ। बाद में पुलिस के हत्थे चढ़ा और अब हवालात में है। हैरानी की बात यह है कि पीडि़त महिला ने इस महाराज के खिलाफ मामला भी तब दर्ज कराया, जब वह अपनी बेटी के इलाज के लिए हौजखास के एक डाॅक्टर के पास पहुंची और डाॅक्टर ने फर्जी बाबा के खिलाफ पुलिस में ‍िरपोर्ट की सलाह दी। यानी तब जाकर उस महिला की आंखें खुलीं। अब तक की जांच में खुलासा हुआ है कि आशुं महाराज उर्फ गुरू घंटाल का वोटर आईडी अभी भी आसिफ खान के नाम से है। उसने धर्म परिवर्तन ‍कब किया या किया है भी नहीं, यह भी अभी साफ होना है। हालांकि इस फर्जी बाबा को कुछ साल पहले उसके दो नौकरों ने ही 50 लाख का चूना लगा दिया था।
आशु महाराज में और कितने ‘हुनर’ हैं, यह भी धीरे- धीरे उजागर होगा, लेकिन लोगों को सम्मोहित करने और उनके भावनात्मक शोषण की कला में वो माहिर है, इसमें कोई शक नहीं। वह अपने क्लायंट्स को फांसने के लिए बड़े -बड़े लोगों को आलीशान होटलों में बुलाता था। इनमें नेता, अभिनेता, आला अधिकारियों के साथ पुलिस अफसर भी होते थे। उन लोगों के हित साधने के लिए पूजा पाठ के नाम पर आशु महाराज लाखों रूपए ऐंठता था और लोग खुशी- खुशी देते भी थे।

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सीधी सी बात है कि जब लोग खुद लुटने तैयार हों तो लुटेरे को दोष देने से क्या फायदा ? जब अंध भक्त स्वयं अपना भावनात्मक शोषण कराने के लिए तैयार हों तो शोषक को गरियाने से क्या ‍हासिल? जब धर्म की फर्जी दुकानें भी शोरूम की तरह मुग्ध भाव सराही जा रही हों तो किसको पत्थर मारें? जब आध्यात्मिकता का फर्जी वाड़ा नैतिकता का जामा पहन ले तो किसके कपड़े फाड़ें? इससे भी बड़ा अफसोस इस बात का है कि ऐसे फर्जी चेहरों को बचाने वाले भी समाज में कम नहीं है। इनमें यह भाव निहित है कि हिंदू धर्म में कुछ ‘गलत’ हो ही नहीं सकता।

लेकिन आशु महाराज प्रकरण ने इस सोच की बुनियाद को ही हिला दिया है। सवाल तो यह उठ रहा है कि क्या हिंदू इतने भोले, बुद्धिहीन और आंखों पर पट्टी बांधे हुए हैं कि कोई भी धर्म की दुकान सजा कर उन्हें आसानी से बेवकूफ बना सकता है? आसिफ खान ने भी शायद इसी कमजोरी को पकड़ा और केवल इसीलिए उसने कथित तौर पर धर्म भी बदला। यूं कोई किस धर्म को माने या किस पूजा पद्धति में विश्वास रखे, यह उसकी निजी आस्था का प्रश्न है। कोई भी धर्म बुराइयों से मुक्त नहीं है। इस्लाम में भी मस्जिदों के पैसे के नाम पर गोरखधंधा चलता है और ईसाइयों में नने ही पादरियों के शारीरिक शोषण का ‍िशकार हो रही हैं। बाबा राम रहीम खुद को सिख बताता था। थाईलैंड में हाल में बौद्धों के मठ में जिस्म का धंधा चलने का खुलासा हुआ है। लेकिन फिर भी दूसरे और अपेक्षाकृत सं‍गठित धर्मों मंे बेखौफ फर्जीवाड़े और मानसिक शोषण का धंधा चलाना इतना आसान नहीं है। क्योंकि उन धर्मों का अपना निगरानी तंत्र भी कहीं काम करता है।

बेशक लोग अपनी धार्मिक आस्थाएं पहले भी बदलते रहे हैं, किन इसके पीछे कारण ज्यादातर निजी अथवा कुछ मामलों में प्रलोभन इत्यादि भी रहे हैं। लेकिन अपना धर्म छोड़कर कोई दूसरा धर्म सिर्फ इसलिए अपनाना ( अथवा ऐसा स्वांग करना) कि वहां अपनी दुकान अच्छी चलेगी, वाकई मन को क्षुब्ध और‍ पूरे हिंदू समाज को आत्म चिंतन पर विवश करने वाली घटना है। अपने आप से पूछें कि क्या हिंदू धर्म ऐसे फर्जी लोगों का सुलभ चरागाह बन चुका है कि कोई भी आए और हमारी अस्मत लूट ले जाए। इससे भी ज्यादा शर्मनाक तो यह है कि ऐसे फर्जी और निकृष्ट लोगों की करतूतों पर धर्म के नाम पर परदा डालने वाले लोग भी मौजूद हैं। तो क्या धर्म का कारोबार अब उस दौर में पहुंच चुका है, जहां हिंदुअोंको पूरी तरह पाखंडी बाबाअो, साधुअो, स्वापमियों, महाराजों और धर्म के फर्जी ठेकेदारों की दया पर ही जीना पड़ेगा? प्लीज सोचिए !

                                          अजय बोकिल

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