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हरिशंकर परसाई आज भी है प्रासंगिक, मुकेश नेमा जी की विशेष टिप्पणी

Posted on: 08 May 2018 08:33 by Ravindra Singh Rana
हरिशंकर परसाई आज भी है प्रासंगिक, मुकेश नेमा जी की विशेष टिप्पणी

हरिशंकर परसाई जी मध्यप्रदेश के! मै भी मध्यप्रदेश का! बचपन से किशोर होने तक खंडवा मे रहे वो! मै भी इसी शहर मे किशोर हुआ! परसाई जी जबलपुर मे बसे और फिर वही बने रहे! मै हूँ तो नरसिंहपुर का पर पिता ने रहने के लिये जबलपुर को चुना था इसलिये अब मै भी जबलपुर का ही हुआ! ताल तलैयो के इस शहर मे वे लंबे वक्त तक श्रीनाथ की तलैया मे रहे तो मै हाथीताल को अपना पुश्तैनी इलाका मानता हूँ! नर्मदा पुत्र थे वो ,हमेशा नर्मदा के आसपास रहे ! मेरा भी अब तक तक का जीवन लगभग इसी नदी के आसपास गुजरा है!

उन्होने लम्बे वक्त तक मास्टरी की और मै अपनी पढाई के दिनो मे मास्टरो के लिये सरदर्द बना रहा! मेरे शिक्षक जो मुझे सिखाना चाहते थे वो मेरे बूते के बाहर था और जो मुझे आता था ,उससे वो हमेशा आतंकित बने रहे! परसाईजी तो नौकरी के झंझट से खुद मुक्त हो गये! एक बार नौकरी छोडने के बाद फिर उसके फेर मे नही पडे ! खुदमुख्तार पत्रकार हुये ! मै भी यदि केवल पढने लिखने से रोटी कमाने की काबिलियत रखता तो मुझे अच्छा लगता! इतना काबिल हूँ नही इसलिये इतना साहस कभी जुटा नही सका ! और बासठ का होने के पहले कभी जुटा भी नही सकूँगा !

जो लिख गये हैं वो आज भी ताज्जुब मे डाल देता है! कितने समसामयिक है आज भी वो !सच्ची ,सटीक ,भेद जाने वाली लेखनी! पोंगा पंडितो को पछाड देने वाली निडर लेखनी ! उन्होने राजनीति ,धर्म ,समाज जैसे हर मुमकिन विषय पर लिखा! और फिर उनसा कोई लिख ही नही सका! नश्तर सी थी उनकी लेखनी जिसमे समाज के हर मवाद को निकाल फेंकने की ताकत थी!

उनका लिखा पढने से आज भी कूढमगजो के पेट में मरोडे उठने लगती है ! तिलमिला जाते है लोग ,पाँव पटकने लगते है और बहुत बार गाली गलौज पर उतर आते हैं ! एक लेखक के लिये इससे बडी तारीफ और क्या हो सकती है !
उन्हे कौन नही जानता था ! देश भर सारे बडे नेता ,उद्योगपति ,हैसियत वाले उनकी प्रतिभा के आगे नतमस्तक थे ! वे कोई भी सम्मान ,पद चुटकियों मे हासिल कर सकते थे पर एक बार भी ऐसा नही हुआ कि उन्होने अपने किसी फायदे के लिये कोई समझौता किया हो!

यह कबीर हमेशा अपनी फक्कडपन मे खुश बना रहा ! अपने मूल्यो पर कायम रहने वाले ,अपने लिखे को जीने वाले और सच के लिये अच्छे अच्छो को लात मारने मे उनसा कोई दूसरा हुआ ही नही! उनसे अपनी तुलना करूँ इतना जाहिल भी नही मै! बस यह सोच कर अच्छा लगता है कि मै उस सूरज के इलाके का ही टिमटिमाता दिया हूँ जो अपने कृतित्व से हमेशा तपता रहेगा! उनका भक्त हूँ म! एकलव्य हूँ उनका!

 

मुकेश नेमा

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