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लघुकथा : दिवाली

Posted on: 06 Nov 2018 08:09 by Ravindra Singh Rana
लघुकथा : दिवाली

– सुषमा दुबे

दिवाली का दिन था । सागर बेचैनी से इधर-उधर पूरे घर में टहल रहा था। करवा चौथ के दिन घटी घटना अभी भी उसके दिमाग में तरोताजा थी। गरिमा उसके लिए पूरे दिन भूखी रही। उस दिन सागर के आॅफिस में कोई पार्टी आई हुई थी। बॉस शहर से बाहर गये हुए थे, ऐसे में मेहमानों की सारी देखरेख उसी को करनी थी। रात 12 . 30 बजे वह थका हारा घर लौटा, वह भी शराब पीकर। गरिमा फोन लगा-लग कर थक गई थी। उसके घर पहुंचते ही गरिमा, सागर पर बिफर पड़ी। सागर नशे की हालत में बिना सोचे-समझे जाने क्या –क्या कह गया, इतना ही नहीं उसने गरिमा पर हाथ भी उठा दिया। यह भी नहीं सोचा कि वह बेचारी उसके लिए ही सुबह से भूखी-प्यासी है। गरिमा बिना कुछ खाए ही सो गई थी।

सुबह जब सागर की आंख खुली तब तक गरिमा घर छोड़कर मायके जा चुकी थी। तब से आज तक दोनों ने अपने अहं के कारण बात नहीं की। इधर गरिमा को भी दिवाली के दिन यूं मायके में रहना ठीक नही लग रहा था। पङ़ोसी 2-3 दिनों से ले-दे कर यही तहकीकात कर रहे थे कि 6 महीने पुरानी दुल्हन दिवाली पर मायके में क्यों है? मां सुबह से 4 बार उसे समझा चुकी थी । लेकिन गरिमा को सागर का व्यवहार बहुत बुरा लगा था, उससे भी ज्यादा बुरा लगा सागर का अपनी गलती स्वीकार ना करना। मन में तो लग रहा था की दीवाली अपने ही घर में मनाना चाहिए। वह बार-बार कभी फोन तो कभी दरवाजे को ताक रही थी। यही हाल कमोबेश सागर का भी था। शाम के 5 बज चुके थे, आस-पास सभी तरफ से मिठाइयों की महक आ रही थी और वह भूखा ही लेटा था। वह अचानक उठा और ताला लगाकर चल दिया। वापस लौट कर आया तब तक सांझ ढाल चुकी थी , अमानिशा की रात जगमग दीपों से झिलमिला रही थी घर – घर लक्ष्मी पूजन चल रहा था । उसने चारों ओर जगमगाते घरों पर दृष्टि डाली और एक स्मित मुस्कान के साथ ताला खोला । सागर के गृहप्रवेश करते समय उसके साथ गृहलक्ष्मी गरिमा भी थी। आज सही मायने में सागर ने अपने मन के अंधकार यानि अहं पर विजय पाई थी, ….और गृहलक्षमी को स-सम्मान गृहप्रवेश करवाने का सुकून भी।

shushma-dube

वरिष्ठ लेखिका और लघु कथाकार।

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