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‘गुजरात माॅडल’ को बंगाल की गायों और बोर्ड नतीजों का झटका ? अजय बोकिल की टिप्पणी

Posted on: 06 Jun 2018 04:11 by Ravindra Singh Rana
‘गुजरात माॅडल’ को बंगाल की गायों और बोर्ड नतीजों का झटका ? अजय बोकिल की टिप्पणी

कुछ लोग इसे जल्दबाजी में निकाला गया निष्कर्ष भी मान सकते हैं, लेकिन जो खबरें सामने आई हैं, वो तो यही बयां करती हैं कि भाजपा का राजनीतिक आदर्श रहता आया गुजरात माॅडल कई मामलों में पिटने लगा है। उदाहरण के लिए क्वालिटी दूध उत्पादन के मामले में पश्चिम बंगाल ने गुजरात को बीट कर दिया है। वहां की ‘सुंदरिनी’ गाएं लगता है गिर की गायों के आगे निकल गई हैं। उधर स्कूली बोर्ड परीक्षाअों के नतीजों के मामले में गुजरात अब‍ बिहार से होड़ करता प्रतीत होता है, क्योंकि राज्य के 10 वीं और 12 वीं बोर्ड परीक्षा के अंग्रेजी में अच्छे नंबर लाने वाले विद्यार्थी अंग्रेजी में अपना नाम भी ठीक से नहीं लिख सकते।

राज्य में भाषा के इस गिरते स्तर को लेकर स्वयं गुजरात राज्य शिक्षा बोर्ड भी बेहद चिंतित है। इस गिरावट के लिए उसने सम्बन्धिभत व्यक्तियों पर कड़ी कार्रवाई करने का ऐलान किया है। संयोग से दोनो खबरें गुजरात की हैं और एक ही दिन में मीडिया में नमूदार हुईं। अभी तक यह माना जाता था कि गुजरात में गिर की गाएं दूध देने के मामले में अव्वल हैं। काठियावाड़ क्षेत्र में पाई जाने वाली नस्ल एक दिन में 10 से 40 लीटर तक दूध देती है। हमे यह तक बताया गया कि गिर की गायों के मूत्र में भी सोने के तत्व पाए जाते हैं। इन गायों में रोग प्रतिरोधक क्षमता भी काफी होती है। इसलिए देश भर में गिर की गायों की काफी मांग रहती आई है।

गुजरात को इन गायों पर गिर के शेरों जितना ही गर्व है। वैसे भी गुजरात को देश में दुग्ध क्रां‍ति का हरकारा माना जाता रहा है। इसके लिए अमूल की मिसाल दी जाती है। लेकिन लगता है कि श्वेत क्रांति का चरखा अब पश्चिम से पूर्व की तरफ घूमने लगा है। ताजा खबर यह आई कि क्वालिटी दूध उत्पादन के मामले में ममता दी के बंगाल ने गुजरात को पीछे छोड़ दिया है। राज्य में कुछ साल पहले महिलाओं को सशक्त करने के इरादे से मिल्क कोऑपरेटिव की शुरुआत की गई थी। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसका नाम सुंदरिनी नैचरल्स रखा था। अब सुंदरिनी ब्रांड वाले गाय के दूध, घी, शहद, मूंग दाल और चावल की काफी मांग है।

इससे मिलने वाले मुनाफे को को कोऑपरेटिव में काम करने वाली महिलाओं के बैंक अकाउंट में जमा किया जाता है। इससे लगभग तीन हजार महिलाओं को जिंदगी की जंग लड़ने की ताकत मिली है। इस अनूठे योगदान के लिए केन्द्र सरकार के राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड ने ‘सुंदरिनी’ को आदर्श माॅडल के तौर पर चुना है। साथ ही पश्चिम बंगाल राज्य पशु पालन विभाग के सुंदरबन कोऑपरेटिव मिल्क ऐंड लाइस्टॉक प्रड्यूसर्स यूनियन लिमिटेड को दूध उत्पादन का सर्वश्रेष्ठ कोऑपरेटिव चुना गया है। खास बात यह रही कि बीते 1 जून को विश्व दूध दिवस पर गुजरात के आणंद में केंद्रीय पंचायती राज और कृषि मंत्री पुरुषोत्तम रुपाला ने ‘सुंदरिनी’ को एक्सीलेंस अवॉर्ड दिया था।

उसी दिन सुंदरबन कोऑपरेटिव मिल्क एंड लाइवस्टॉक प्रोडयूसर्स लि. को नए और ऑर्गैनिक तरीकों से उपभोक्ताओं के लिए प्राकृतिक और सुरक्षित खाद्य पदार्थ बनाने के लिए फिक्की मिलेनियम अलायंस अवॉर्ड के तहत 25 लाख रुपए का इनाम भी दिया गया था। बताया जाता है कि वहां गायों को एंटीबायोटिक नहीं दिए जाते। सारा काम महिलाएं ही सम्हालती हैं।

इसी तरह अपने देश में बोर्ड परीक्षाअों में फर्जीवाड़ा, सामूहिक नकल वगैरह कोई नई बात नहीं है। लेकिन इसका क्लायमेक्स दो साल पहले बिहार में देखने को मिला, जहां 12 के टाॅपर को यह भी पता नहीं था कि उसने किस विषय में परीक्षा दी है। तब बाकी राज्यों ने यह सोच कर राहत की सांस ली थी कि कम से कम उनके यहां मेरिट में तो टोटल फर्जीवाड़ा नहीं होता। गुजरात में भी नहीं होता होगा, लेकिन इस साल 10 वीं एवं 12 बोर्ड के जो नतीजे आए हैं, उनमे ये खुलासा हुआ है कि भाषा के पेपर में अच्छे अंक लाने वाले छात्र छात्राों को अंग्रेजी में अपना नाम भी ठीक से लिखना नहीं आता।

इसका अर्थ यह नही कि बाकी राज्यों में सबको आता है, लेकिन यह बात गुजरात में उजागर हुई है। वहां अंग्रेजी भाषा के पर्चे में 96 छात्रों ने ‘माय बेस्ट फ्रेंड’ पर एक जैसा निबंध लिख डाला। नतीजों से हैरान खुद बोर्ड ने इन सभी छात्रों को तलब किया है। कहा जा रहा है कि यह गड़बड़ी गंभीर है और इस मामले में सख्त कार्रवाई की जाएगी। इस मामले में गुजरात बिहार से बेहतर इस मामले में है, क्योंकि वहां इस गंभीर गड़बड़ी और शिक्षा के स्तर में गिरावट पर तुरंत कार्रवाई हुई, जबकिे बिहार में टाॅपर घोटाला मीडिया में कई दिनों तक सुर्खियों में रहने के बाद मजबूरन सरकार ने सीबीआई जांच बैठाई। यह मामला अभी कोर्ट में चल रहा है।

यह तर्क दिया जा सकता है कि कोई सदा एवरेस्ट पर नहीं रह सकता। गुजरात का विकास माॅडल बहुआयामी और राजनीतिक भी है। इसलिए किन्हीं एक दो मामलों के आधार पर उसे खारिज करना मूर्खता और सियासी भूल है। मान लिया, लेकिन विकास के जो पैमाने खुद गुजरात माॅडल को गुजरात माॅडल बनाते हैं, वो ही कहीं गड़बड़ाने तो नहीं लगे हैं। बंगाल की गायें, गुजराती गायों की तुलना में बेहतर क्वालिटी का दूध दें, इससे गायों के साथ-साथ उन्हें पालने वालों का रूतबा भी बढ़ता है।

वैसे बंगाल और गुजरात में एक और समानता है कि दोनो राज्यों में शेर ( टाइगर ) पाए जाते हैं। उधर बंगाल टाइगर और इधर गिर के गबरू टाइगर। राजनी‍ितक तौर पर गिर के टाइगर, बंगाल टाइगरों को चित करने की लगातार कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बात बन नहीं पा रही है, उस पर बंगाल की गायें भी ममता दी और वहां के टाइगरों की तरह हावी हुई जा रही हैं। दूसरी तरफ स्कूली शिक्षा के स्तर में आ रही गिरावट बिहार की याद दिला रही है। तो क्या ‘गुजरात माॅडल’ जैसे राजनीतिक जुमले को जमीनी ताकत मिलना बंद हो गई है ?

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