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आज फिल्म निर्माता संघ से मिल रहे हैं सिनेमाघर संचालक, कीर्ति राणा की कलम से

Posted on: 25 Oct 2018 10:30 by Pinki Rathore
आज फिल्म निर्माता संघ से मिल रहे हैं सिनेमाघर संचालक, कीर्ति राणा की कलम से

जीएसटी के बाद लोकल बॉडी टैक्स (दोहरे टैक्स) के विरोध में सिर्फ मप्र में ही 5 अक्टूबर से सिंगल स्क्रीन और मल्टीप्लेक्स की हड़ताल जारी है। मप्र में विस चुनाव के चलते 6 अक्टूबर से आचार संहिता लग चुकी है, ऐसे में जब तक चनी हुई सरकार काम ना संभाले तब तक इस हड़ताल का कोई औचित्य नहीं है। चूंकि मल्टीप्लेक्स वालों के आगे फिल्म वितरक मजबूर हैं इसलिए हड़ताल जारी है। सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर संचालकों को सर्वाधिक परेशानी से जूझना पड़ रहा है। इन सिनेमाघरों से जुड़ा हजारों कर्मचारियों का स्टॉफ बेकार बैठा है। 25 अक्टूबर गुरुवार को मप्र के सिनेमाघर संचालक सीसीए के पदाधिकारियों के साथ प्रोड्यूसर गिल्ड से मुलाकात कर परेशानी बताएंगे ताकि इस हड़ताल को स्थगित कर सिनेमा कारोबार मप्र में पुन: शुरु कराया जा सके।तीन सप्ताह से अधिक दिनों से चल रही हड़ताल से फिल्मी कारोबार के साथ ही मप्र सरकार को भी करोड़ों के टैक्स का नुकसान हो रहा है।

मप्र में सस्ता सिनेमा, बेहतर सुविधा देने के नाम पर सरकार से मल्टीप्लेक्स शुरु करने की मंजूरी लेने के बाद इंदौर सहित मप्र में मनमानी दर पर टिकट बिक्री जारी है। यही नहीं खानपान सामग्री के दाम पर भी नियंत्रण नहीं है।   इसके विपरीत साउथ में सरकार ने मल्टीप्लेक्स की टिकट दर दोसौ रुपए निर्धारित कर रखी है।

दोहरा टैक्स क्यों दें 

मप्र में 5 अक्टूबर से शुरु हुई हड़ताल का मुख्य कारण केंद्र और राज्य सरकार द्वारा मनोरंजन कर की मार है। केंद्र जीएसटी के तहत 18%कर वसूल रही है। इसके साथ ही लोकल बॉडी टैक्स (एलबीटी) के रूप में नगर निगमों द्वारा भी अधिकतम 20%प्रतिशत तक मनोरंजन कर वसूला जा रहा है। सिनेमाघर संचालकों का कहना है जब एक देश एक कर में जीएसटी लागू किया गया तो एलबीटी क्यों। इंदौर में नगर निगम ने इस कर को घटा कर 5% कर दिया लेकिन भोपाल नगर निगम द्वारा 15% तय किया गया है। इस दोहरे टैक्स के विरोध में हड़ताल शुरु हुई और 6 अक्टूबर को आचार संहिता लग गई। फिल्म व्यवसाय से जुड़े लोगों को पता है कि आचार संहिता के चलते मामले का हल नहीं हो सकता फिर भी हड़ताल जारी है।

इसलिए डॉन जैसा मान रहे मल्टीप्लेक्स वालों को

मप्र में पीवीआर और आयनॉक्स की करीब 50 स्क्रीन होंगी, जबकि सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों की संख्या 400 के करीब है। मुसीबत सिंगल स्क्रीन वालों की है क्योंकि सिनेमाघरों के मालिक भी हैं जबकि मल्टीप्लेक्स मॉल्स में किराए पर संचालित हो रहे हैं लेकिन निर्माताओं पर दबाव इनका अधिक होने से चाहकर भी फिल्म वितरक फिल्मों के रिलीज आर्डर जारी नहीं कर रहे हैं। बीच में यह सहमति बनी थी कि सिनेमाघर वाले पुरानी फिल्म चला सकते हैं लेकिन मल्टीप्लेक्स वालों के अड़ियल रुख के कारण यह भी संभव नहीं हो सका।

मप्र के बहाने देश भर में अपनी बात मनवाने का दबाव 

फिल्म उद्योग से जुड़े सूत्र बताते हैं कि मप्र में हड़काल जारी रख कर मल्टीप्लेक्स वाले देश के अन्य राज्यों पर भी दबाव बनाने की राजनीति कर रहे हैं क्योंकि मप्र की तरह अन्य राज्यों में भी लोकल बॉडी टैक्स के तहत कर चुकाना होगा।उस संकट से बचने के लिए मप्र में हड़ताल खत्म नहीं करना चाहते।

आज मुंबई में निर्माताओं से मुलाकात करेंगे

इंदौर सहित मप्र के सिंगल स्क्रीन संचालक गुरुवार को सीसीए पदाधिकारी बसंत लड्ढा, लोकेंद्र जैन और वितरकों के प्रतिनिधि कुमार आदर्श प्रोड्यूसर गिल्ड के पदाधिकारियों से मुलाकात कर उनसे इस बेमतलब की हड़ताल का सम्मानजनक हल निकालने के लिए पहल का अनुरोध करेंगे।यह भी बताएंगे कि प्रदेश के 400 सिनेमाघरों से जुड़ा स्टॉफ और उनके परिजन हड़ताल के चलते भारी परेशानी का सामना कर रहे हैं।साथ ही यह भी बताएंगे कि ये हड़ताल दिसंबर तक भी चले तो हल तब ही निकलेगा जब चुनाव संपन्न हो जाए, आचार संहिता हट जाए और नई सरकार का गठन हो जाए।

नई फिल्में नहीं लगीं, टेक्स का नुकसान

मप्र में 5 अक्टूबर से सिनेमाघर बंद होने के चलते नई फिल्मों से दर्शक वंचित हैं। अंधाधुन, लवरात्रि, बधाई हो बधाई जैसी फिल्में लगी ही नहीं, फिल्में नहीं लगने के कारण मप्र को मनोरंजन कर भी नहीं मिल रहा है।

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