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जार्ज फर्नांडीसः कुछ संस्मरण

Posted on: 31 Jan 2019 11:30 by Mohit Devkar
जार्ज फर्नांडीसः कुछ संस्मरण

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

जाॅर्ज फर्नांडीस जब 1967 में पहली बार लोकसभा में चुनकर आए तो सारे देश में उनके नाम की धूम मची हुई थी। वे बंबई के सबसे लोकप्रिय मजदूर नेता थे। उन्होंने कांग्रेस के महारथी एस के पाटील को मुंबई में हराया था। तब जाॅर्ज संसोपा के उम्मीदवार थे। संयुक्त समाजवादी पार्टी के नेता थे, डाॅ. राममनोहर लोहिया। लोहियाजी ने डाॅ. परिमलकुमार दास और मेरी ड्यूटी लगाई कि हम दोनों जाएं और जाॅर्ज को नई दिल्ली स्टेशन से लेकर आएं। जाॅर्ज को हमने लाकर साउथ एवेन्यू में राजनारायणजी के घर छोड़ा। जाॅर्ज के दिल्ली आते ही हमारी गतिविधियां तेज़ हो गईं। मधु लिमए, किशन पटनायक, मनीराम बागड़ी, रामसेवक यादव, लाडलीमोहन निगम, कमलेश शुक्ल, श्रीकांत वर्मा आदि हम लोग डाॅ. लोहिया के घर पर अक्सर मिला करते थे और लोहियाजी के आंदोलनों को फैलाने पर विचार किया करते थे। स्कूल आॅफ इंटरनेशनल स्टडीज के साथ चले मेरे शोधग्रंथ को हिंदी में लिखने के विवाद पर जाॅर्ज ने मेरा डटकर समर्थन किया। अंग्रेजी हटाओ, जात तोड़ो, भारत-पाक एका, रामायण-मेला, दाम-बांधो आदि कई आंदोलनों में जाॅर्ज ने नई जान फूंक दी। जाॅर्ज को 214, नार्थ एवन्यू का फ्लैट मिला। 216 नंबर में अर्जुनसिंहजी और सरलाजी भदौरिया पहले से रहते थे। भदौरियाजी की बरसाती में कमलेशजी रहते थे। मैं सप्रू हाउस में रहता था। जब डाॅक्टर लोहिया बीमार पड़े तो वे विलिंगडन अस्पताल में भर्ती थे। हम लोग रोज वहां जाते थे। मुझे देर हो जाती थी तो कभी मैं डाॅ. लोहिया के बंगलो, 7 गुरुद्वारा रकाबगंज या भदौरियाजी के घर रात को रुक जाता था। अस्पताल बिल्कुल सामने ही था। उन दिनों जाॅर्ज के साथ घनिष्टता बढ़ गई। जार्ज बेहद सादगी पसंद इंसान थे। वे अक्सर मुसा हुआ कुर्ता-पाजामा पहने रहते थे। मंत्री बनने पर भी उनकी वेश-भूषा, खान-पान और रहन-सहन में कोई फर्क नहीं आया था। मंत्री बनते ही उन्होंने कोका-कोला और आइबीएम पर प्रतिबंध लगा दिया । मंत्री बनने पर उन्हें कृष्णमेनन मार्ग का बंगला मिला, जिसके सामने के दरवाजे और खिड़कियां उन्होंने निकलवा दिए थे, क्योंकि उस सड़क पर से जब कोई वीआईपी निकलता तो सुरक्षाकर्मी उन्हें बंद करवा देते थे। आपात्काल के दिनों में वे सरदारजी का भेस धारण करके घूमते थे। सीजीके रेड्डी और कमलेशजी के जरिए उनसे मेरा संपर्क बना रहता था। ‘बड़ौदा डायनामाइट केस’ में वे गिरफ्तार हो गए थे। आपात्काल के बाद वे मंत्री बने। मैंने 1977 में नागपुर में और 1990 में इंदौर में अंग्रेजी हटाओ सम्मेलन आयोजित किए थे। जाॅर्ज ने उनमें मदद की और भाग भी लिया। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में जाॅर्ज रक्षा मंत्री थे। कारगिल-युद्ध के दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने मुझे फोन किया। नवाज मुशर्रफ द्वारा चालू किए गए उस युद्ध को रुकवाना चाहते थे। अटलजी को मैंने सारी बात बताई। उन्होंने कहा, आप कल ही इस्लामाबाद जाइए और बात करके आइए। पासपोर्ट पर तत्काल वीजा लग गया और टिकिट बन गया। लेकिन दूसरे दिन सुबह-सुबह जाॅर्ज का फोन आया और उन्होंने कहा कि यदि पाकिस्तानी सरकार आपकी यात्रा का बेजा फायदा उठाने की कोशिश करेगी और यह झूठा प्रचार करेगी कि अटलजी और जाॅर्ज ने अपने मित्र को युद्ध रुकवाने के लिए भेजा है तो हम यह कैसे कहेंगे कि हम डाॅ. वैदिक को नहीं जानते। यही बात कुछ देर बाद मुझे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा ने भी कही। मुझे भी यह सावधानी जरुरी लगी। जार्ज ने ‘प्रतिपक्ष’ नामक पत्रिका भी निकाली थी। बिहार से वे कई बार संसद में चुने गए लेकिन राजनीति से दरकिनार होने पर वे काफी अकेले पड़ गए थे। उन्हें देखने के लिए दिल्ली के ‘एम्स’ अस्पताल और पंचशील एन्कलेव में मैं अक्सर जाया करता था। सुरेंद्र मोहन, जाॅर्ज और मेरे बच्चे- सभी सरदार पटेल स्कूल में पढ़ते थे। उसके सालाना अभिभावक समारोह में ये दोनों बड़े समाजवादी नेता साधारण अभिभावकों की तरह बैठे रहते थे। हमारे वरिष्ठ और प्रिय साथी जाॅर्ज फर्नांडिस को मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि !

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