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इंदौर में पहली बार कॉमर्स की कोचिंग शुरू की थी गौतम कोठारी ने

Posted on: 04 May 2018 10:51 by Praveen Rathore
इंदौर में पहली बार कॉमर्स की कोचिंग शुरू की थी गौतम कोठारी ने

इंदौर। पीथमपुर औद्योगिक संगठन के अध्यक्ष गौतम कोठारी अपना करियर शुरू करने से पूर्व पढ़ाई के लिए राजनांदगांव से कलकत्ता गए, वहां से सीए की पढ़ाई करने इंदौर आए और यहां कोचिंग पढ़ाते हुए करियर की शुरुआत की। उन दिनों कॉमर्स की कोचिंग नहीं होती थी, इंदौर में पहली बार कर्ज लेकर कॉमर्स का कोचिंग इंस्टिट्यूट शुरू किया। उद्घाटन करने के लिए पिताजी को बुलाया, तो उन्होंने पूछा कि पैसे कहां से लाया? उनको बताया कर्ज लिया है, तो वे नाराज भी हुए। आज तीन कोचिंग इंस्टिट्यूट चल रहे हैं। सन 2000 में इंदौर में ही कोठारी कॉलेज शुरू किया। बेटे की पीथमपुर में फैक्टरी है। इनकी लीडरशिप से उद्योग जगत इतना प्रभावित है कि 1988 से लगातार पीथमपुर औद्योगिक संगठन का नेतृत्व कर रहे हैं। घमासान डॉटकॉम से उन्होंने अपने जीवन के अनुभव साझा किए…

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सवाल : इंदौर में आपके करियर की शुरुआत कैसे हुई?
जवाब : मैं राजनांदगांव जिले का निवासी हूं। १९७३ में पढ़ाई के लिए कलकत्ता गया, वहां सीए फर्म राजेंद्र लोढ़ा के यहां इंटर्नशिप की। चूंकि कलकत्ता सूट नहीं हो रहा था, तो सीए की परीक्षा के लिए इंदौर का चयन किया। १९७८ में इंदौर आ गया। मैं अच्छे परिवार से हूं, लेकिन मैंने निश्चय किया था, कि अपने ही दम पर आजीविका चलाऊंगा। 1978-79 में मैं बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने साइकिल पर जाया करता था। बच्चों ने सलाह दी कि कहीं कोचिंग इंस्टिट्यूट डाल लें, हम वहीं पढऩे आ जाएंगे। इसके बाद 1980 में मैंने कोठारी इंस्टिट्यूट की राजबाड़ा से शुरुआत की। तब तक मैं सीए बन चुका था। 1985 में मेरे पास एक प्रोजेक्ट बनाने के लिए कोई आया और उन्होंने मुझे ऑफर किया कि मैं इस प्रोजेक्ट में शामिल हो जाऊं। उन दिनों इसी प्रोजेक्ट के लिए सरकारी ऑफिसों जाना होता था। उन दिनों केंद्र सरकार ने उद्योगों को दी जाने वाली सब्सिडी खत्म कर दी थी, जिससे पीथमपुर के 128 उद्योगों सहित जो पाइप लाइन में प्रोजेक्ट थे, वे सभी परेशानी में आ गए। उसी समस्या से मेरा डाईकॉस्टिंग का प्रोजेक्ट भी अटकने लगा। तब मुझे लगा कि पीथमपुर में कोई इंडस्ट्रीज की समस्या के लिए लड़ सके, ऐसा कोई संगठन नहीं है। मैंने पीथमपुर में मीटिंग ली, जिसमें 13 उद्योग शामिल हुए, इसी मीटिंग में 5 अक्टूबर 1988 में पीथमपुर औद्योगिक संगठन की स्थापना हुई। उद्योग की लड़ाई शुरू की। मीडिया का सहारा लिया। इसका असर यह हुआ कि डेढ़ माह में इतना छापा कि तत्कालीन कलेक्टर भागीरथ प्रसाद ने हमारी रेसीडेंसी पर मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह से मुलाकात कराई, वे समस्याएं सुनकर चौंके और उन्होंने तत्काल अधिकारियों को आड़े हाथों लिया और पीथमपुर के विकास की गति शुरू हुई। तब पीथमपुर में इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं था। प्लॉट तो अलॉट कर दिए थे, लेकिन वहां जाने के लिए सडक़ तक नहीं थी। पानी भी नहीं था। बड़े उद्योगों ने संगठन को नोटिस किया और धीरे-धीरे वे इस संगठन से जुडऩे लगे।
सवाल : आपके प्रोजेक्ट का क्या हुआ?
जवाब : मेरा प्रोजेक्ट पूरे तरह काइनेटिक होंडा पर डिपेंड था, काइनेटिक होंडा चल नहीं पाई, इस प्रोजेक्ट भी नहीं चल पाया। इंडस्ट्रीज की लीडरशिप करते हुए एमपीएफसी के एमडी नजीबजंग से मेरी अनबन हो गई थी, उन्होंने मेरे प्रोजेक्ट को 1992 में टेकओवर करवा दिया। साराडिगा डायगेस्ट में 6 डायरेक्टर अन्य भी थे। मेरी दूसरी यूनिट जीबी इंजीनियरिंग थी, जो ऑटोमोबाइल इंडस्ट्रीज के लिए उपकरण बनाती थी। कुछ साल बाद ये इंडस्ट्रीज भी बंद कर दी। इसके बाद मैंने बाजार का लेनदेन और एमपीएफसी का सेटलमेंट किया और अपने आपको कर्ज से मुक्त किया।
सवाल : एजुकेशन में भी आपने काम किया, पत्रकारिता भी की।
जवाब : मैंने सीए, एम.कॉम, एलएलबी व जर्नलिज्म की डिग्री ली। प्रतियोगिता प्रवेश और दैनिक चौथा प्रहरी निकाला। कैरियर फार यू मैग्जिन निकाली। संगठन का भी एक समाचार पत्र निकाला। कालांतर में दैनिक चौथा प्रहरी को साप्ताहिक किया। साप्ताहिक का भविष्य भी बहुत बेहतर नहीं दिख रहा था, तो अखबार को अध्यात्मिक रूप दिया और आज पूरे देश और पड़ोसी देश नेपाल तक अखबार का प्रसारण किया जा रहा है।
सवाल : परिवार में कौन-कौन है और अन्य कोई बिजनेस है?
जवाब : पत्नी है, एक पुत्र है, एक पुत्री है। पुत्र की पीथमपुर में कृषि पाइप की फैक्टरी है।
सवाल : आपकी हॉबी क्या है?
जवाब : संगीत, लेखन, अध्ययन में मेरी खास रुचि है। इसके अलावा हॉकी और फुटबॉल में भी रुचि रही, लेकिन स्वास्थ्य कारणों से डॉक्टरों की सलाह पर हॉकी और फुटबॉल खेलना बंद कर दिया है।
सवाल : जीवन में क्या मलाल रहा है, कि कोई काम आप कर नहीं पाए?
जवाब : मैंने जो सोचा वो किया, मैने अपने कार्य को कर्तव्य के रूप में देखा। इसलिए कभी कोई मलाल नहीं रहा। अचिवमेंट को कभी मैंने नहीं देखा। पिछले दिनों संगठन में यह बात उठी भी थी कि तीस वर्षों में क्या किया है, क्या उपलब्धि रही? इसका लेखा-जोखा होना चाहिए। इस पर एक पुस्तक प्रकाशित करने का निर्णय किया है, जिसमें पीथमपुर के विकास की यात्रा के साथ ही संगठन का भी लेखाजोखा होगा। इस पुस्तक को प्रकाशित करने की जवाबदारी मुझे साथियों ने दी है। इसकी तैयारियां कर रहा हूं।

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