अपनों को लंदन में संभाल रहे ‘गांधी’!

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लंदन से परीक्षित यादव

मोहनदास करमचंद गांधी ने अपनी लड़ाई साउथ अफ्रीका से शुरू की थी। एक गांधी ऐसा भी है, जो इंग्लैंड में ‘ लड़ाई ‘लड़ रहा है। यहां के सन्नाटे और अकेलेपन में भारतीयों का मसीहा बना हुआ है। पोरबंदर के गांव में जन्मे प्रताप गोधानिया भगवद गीता और गांधी के उसूलों पर चल रहे हैं। मदद ही उनका मकसद है। 12 साल से इंग्लैंड में है। यहां आने वाले हर भारतीय के ठहरने का इंतजाम करवाते हैं।

स्ट्रैटफोर्ड, बार्किंग और इल्फोर्ड में कई मकान लीज पर ले रखे हैं। यही सब को रुकवाते हैं। घूमने आया हो या नौकरी करने, खेलने आया हो या पढ़ने, अगर उसकी बात प्रताप से हो गई है, तो उसे परेशान होने की जरूरत नहीं। दोस्त और पहचान वाले गांधी कह कर बुलाते हैं। वजह यही है कि अक्सर महात्मा गांधी की बातें करते रहते हैं। उनकी लड़ाई और कामयाबी याद दिलाते रहते हैं। गीता के उपदेश भी देते हैं ‘क्या लेकर आया था क्या लेकर जाएगा, जुबान पर चढ़ा रहता है। घर का किराया तो लेते हैं, लेकिन अगर कम हो या ना हो तो भी काम चला लेते हैं।

अस्पताल हो या पुलिस का मामला प्रताप मदद करते हैं। भारतीयों के लिए यूके सरकार से भी लड़ रहे हैं। तीन मामले अदालत में हैं। खुद वेंबली में रहते हैं। पत्नी साथ है बाकी परिवार वडोदरा में है। प्रताप कहते हैं ना मैं कभी अपना प्रमोशन करता हूं, ना ही किसी को आगे होकर मदद देता हूं। लेकिन कोई मुझ तक पहुंच जाए तो फिर कसर भी नहीं छोड़ता। इस बात पर कभी नहीं इतराया हूं। यही असली फर्ज है। इस भलाई के बावजूद इतना तो कमा ही लेता हूं, कि ठीक-ठाक जिंदगी जी लूं।

सभी भारतीय अखबार और टीवी चैनल देखते रहते हैं। भारत के हर मुद्दे की खबर है। पाकिस्तान की चालाकियां पर उसे कोसते भी हैं। कुछ तजुर्बे हुए हैं जहां पाकिस्तानियों से चोट खाई है। कहते हैं मुझे इंतजार है कि कोई अच्छा शख्स लाहौर, कराची या इस्लामाबाद से मिले जिसपर यकीन कर सकूं। अब तक ऐसा नहीं हुआ है।

आईटी कंपनी के लोग प्रताप के पास ज्यादा आते हैं। इनमें दक्षिण भारतीय सबसे ज्यादा है। 3 मोबाइल साथ रखते हैं 10 हजार से ज्यादा नंबर सेव है। यह भी कहते हैं कि मेरा नंबर 1 लाख से ज्यादा लोगों के पास सेव होगा। लंदन की हर अच्छी आदत और चीज भारत पहुंचाना चाहते हैं। खुद की कहानी भी दिलचस्प है। 13 साल पहले महज 180 पॉइंट लेकर हीथ्रो हवाईअड्डे पर पहुंचे थे। खूब भटकने के बाद नौकरी मिल गई। धीरे-धीरे ताकत इतनी आ गई कि औरों की मदद कर सकें।

इंग्लैंड में परिवार के दर्जन से ज्यादा लोग हैं लेकिन किसी की मदद नहीं लेते। होटल मैनेजमेंट में डिग्री हासिल की है। किताबें और अखबारों को दोस्त बना रखा है। कहते हैं महात्मा गांधी जितना बड़ा नहीं हूं कि दुनिया के बारे में सोच सकू। मुझे तो सिर्फ भारतीयों की फिक्र है। यहां आने वालों के लिए जो कर सकता हूं करूंगा। भारत में चल रहे फर्क को लेकर भी झल्लाते हैं। कहते हैं आखिर क्यों बिहार पिछड़ा है, आखिर क्यों गुजरात उसकी मदद नहीं करता। ऐसे कई उदाहरण प्रताप के पास है जिससे समझना चाहते है कि किसी नेता और सरकार का इंतज़ार मत करो, एक दूसरे की मदद करो तभी देश बनेगा।

क्या जरूरी है कि कोई नेता इस बीच में आए और मदद पहुंचाएं। मुझे भी घर की याद आती है ।अपने गांव पहुंच कर नुक्कड़ पर गप्पे मारना चाहता हूं, लेकिन लंदन में ‘भारत’ को अकेला नहीं छोड़ सकता। जिस दिन यहां सामान्य भारतीयों को इज्जत और तवज्जो मिलने लग जाएगी अपने गांव लौट कर खेती करूंगा लेकिन, जब तक यहां भारतीयों की मुश्किलें हैं मैं मदद करता रहूंगा। यहां की ट्रेन हो चाहे कोई और सुविधा, यह सब भारत पहुंचना चाहिए। मीडिया से अगर कोई प्रताप के पास पहुंच जाए तो उसे खास तवज्जो मिलती है। उसे यहां-वहां घुमाने ी ले जाते हैं। मकसद यही है कि वह अपने तजुर्बा अखबार या टीवी में शेयर करेगा और इंग्लैंड की कामयाबी भारत तक भी पहुंचेगी।

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