आप कांग्रेस को खारिज कर सकते हैं, इंदिरा गाँधी को नहीं, मणिका मोहिनी की कलम से

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इंदिरा गाँधी मेरी प्रिय नेता थीं. उनकी राजनीति का एक दर्शन शास्त्र था. वे ‘इमरजेंसी’ लगाने के कारण जनता की नापसंदगी का सबब बनी लेकिन सच मानिए, अपने देश में इतनी ऊलजलूलताएँ हैं कि भाई, अपने देश में कुछ न कुछ इमरजेंसी तो लगनी ही चाहिए।

उनके देहावसान के समय मैं मुंबई में थी. सुबह ही खबर मिल गई थी। मैं तुरंत दिल्ली जाने के लिए बेचैन हो गई. सोचा, ट्रेन में बिना आरक्षण के शायद टिकट मिल जाए पर स्टेशन पर पहुँच कर पता चला कि दिल्ली जाने वाली सारी गाड़ियाँ बिना टिकट यात्रियों को दिल्ली ले जा रही हैं।

यह प्रबंध रेलवे का नहीं था बल्कि जनता बदहवास होकर बिना टिकट लिए ज़ोर-ज़बरदस्ती ट्रेन में बैठ रही थी। इतना हुजूम मैंने पहली बार देखा था। मैं भी एक ट्रेन में चढ़ गई और लोगों के बीच में फँस गई, इतनी कि साँस लेना मुश्किल हो गया. सभी फँसे हुए थे। मैंने दिल्ली जाने का इरादा त्यागा और लोगों को खदेड़ते हुए और खुद खदेड़ी जाकर नीचे उत्तर आई. कहने की आवश्यकता नहीं कि इंदिरा गाँधी की मौत का ग़म मुझे बेहद था।

आप कॉंग्रेस को ख़ारिज कर सकते हैं, लेकिन इंदिरा गाँधी को नहीं। भारत में उनके जैसा राजनेता आज तक तो हुआ नहीं। आज उनके स्मृति दिवस पर उन्हें शत-शत प्रणाम।

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