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सियासी नक़ाब उतारती ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’

Posted on: 13 Jan 2019 12:03 by Pawan Yadav
सियासी नक़ाब उतारती ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’

विनोद नागर
भारत में राजनीतिक पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्में अपनी गुणवत्ता के लिये कम बल्कि उनसे जुड़े विवादों के कारण ज्यादा सुर्खिया बटोरती हैं. इस शुक्रवार रिलीज़ हुई ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ न तो पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बायोपिक है और न ही इसे बनाने के कोई राजनीतिक निहितार्थ फिल्म देखते हुए सामने आते है. फिल्म के दो ढाई मिनट के ट्रेलर के आधार पर जो बवाल खड़ा किया गया था वह अंततः ढाक के तीन पात साबित हुआ. न तो फिल्म में कोई राजनैतिक रहस्योद्घाटन करने की चेष्टा की गई है और न ही किसी व्यक्ति अथवा पार्टी विशेष को नीचा दिखाने का प्रयास निर्देशक युवा निर्देशक विजय रत्नाकर गुट्टे ने किया है|

पूर्व प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू की चार साल पहले छपी जिस अंग्रेजी किताब पर यह फिल्म बनी है उसका पूरा शीर्षक काफी बड़ा है- ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर: मेकिंग एंड अनमेकिंग ऑफ़ मनमोहन सिंह’. चूँकि प्रकाशित पुस्तक के सारे पन्ने पहले से ही खुली हवा में फड़फड़ाते रहे हैं इसलिये इस पर बनी फिल्म को विवादों में घसीटने का कोई औचित्य नहीं. अधिकाँश लोगों में इस फिल्म को देखने की रूचि इस बात को लेकर है कि अनुपम खेर ने किस जतन से मनमोहन सिंह को परदे पर जीवंत किया है.. सुजैन बर्नेर्ट कितनी सोनिया गाँधी जैसी लगी हैं.. आहना कुमरा(प्रियंका गाँधी) अर्जुन माथुर(राहुल गाँधी) सहित विभिन्न कलाकारों ने जो राजनीतिक किरदार निभाए हैं वे असली राजनेताओं से कितने मिलते जुलते हैं..?

दरअसल, ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ को मनोरंजन के पारंपरिक दृष्टिकोण और सतही नज़रिए से देखने के बजाय विशुद्ध राजनीतिक फिल्म देखने की मनःस्थिति में ढालना होगा तभी आप फोर्थ वाल (केन्द्रीय पात्र द्वारा दर्शकों से सीधे संवाद) सरीखी विदेशों में प्रचलित सिनेमाई विधा का पूरा मजा ले सकेंगे. यदि ऐसा कर पाएं तभी आप मेकअप और तकनीक से इतर अनुपम खेर के कायांतरण और अक्षय खन्ना के अभिनय सामर्थ्य का समान रूप से लोहा मानकर श्रेष्ठी कलाकार के रूप में दोनों की पीठ बराबरी से थपथपाएंगे. बॉलीवुड में पॉलिटिकल ड्रामा जॉनर की फिल्मों के निर्देशक चाहे वे गुलज़ार (आँधी) हों या प्रकाश झा (राजनीति) अथवा मधुर भंडारकर (इंदु सरकार) पात्रों के नाम बदलकर और सांकेतिक शैली में फिल्म की राजनितिक पृष्ठभूमि रचते रहे हैं. विजय रत्नाकर गुट्टे ने भारत में राजनीतिक फिल्मों के लिये वाकई नई ज़मीन तोड़ी है. इसके लिये उन्हें शाबासी दी जानी चाहिए. सुभाष घई ने इसे हिन्दी सिनेमा के इतिहास की पहली बेहतरीन पॉलिटिकल ड्रामा फिल्म निरुपित किया है|

अंग्रेजी में एक्सीडेंट शब्द का आशय हादसा या दुर्घटना से ताल्लुक रखता है ऐसे में अकस्मात् प्रधानमंत्री बने डॉ. मनमोहन सिंह को एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर कहना आसानी से गले नहीं उतरता. संजय बारू ने प्रधानमंत्री के मीडिया एडवाइजर की हैसियत से मनमोहन सिंह की छवि गढ़ने में कितना योगदान किया यह खोज का विषय हो सकता है. पर उनकी किताब पर एक उम्दा फिल्म बनाकर निर्देशक विजय रत्नाकर गुट्टे ने अर्थशास्त्री से राजनीतिज्ञ बन प्रधानमंत्री पद पर दो कार्यकाल पूरा करने वाले मनमोहन सिंह के उत्थान और पतन से जुड़े घटनाक्रम की जो परतें उजागर की हैं वह कुटिल राजनीति से जूझने की विवशता का अहसास कराती है|

पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव का अंतिम संस्कार नई दिल्ली के बजाय हैदराबाद में करने, पीएम के रूप में राष्ट्र के नाम सन्देश की रिहर्सल, युवक कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी के नेतृत्व में मनरेगा के विस्तार की मांग की अहमद पटेल की विज्ञप्ति को ठुकराने का प्रसंग, फाईल फेंकने का विवाद, पीएमओ में अधिकारियों की आपसी टसल, हाई कमान से मिलने का दबाव, इस्तीफे की पेशकश, बीमारी हार्ट अटैक जैसे प्रसंगों को कुशलता से फिल्माया गया है. असल में पूरी फिल्म पीएमओ में रहते हुए संजय बारू और मनमोहन सिंह के आपसी संबंधों का दिलचस्प खुलासा करती है. मजे की बात यह है कि मनमोहन सिंह ने विवादों में घिरी इस फिल्म को लेकर अभी तक अपना मुँह नहीं खोला है. अभिनय के लिहाज़ से यह फिल्म अनुपम खेर और अक्षय खन्ना को नए उत्कर्ष पर ले जाती है|

संवाद खुद फिल्म की तासीर बयां करते हैं- अगर 24 घंटे के अन्दर किसी झूठ का जवाब न दिया जाए तो वह सच मान लिया जाता है.. संसद में पीएम की कमजोरी का फायदा सब उठा रहे हैं.. ये लोग ज़रूरत से ज्यादा वफादार हैं, अब आपकी सोनियाजी को लिखी चिठ्ठी मैं लीक करूँगा.. पैसे पेड़ पर नहीं उगते नवीनजी.. पीएम न रबर स्टैम्प हैं न पेपर टाइगर, प्रेस कांफ्रेंस में जिसे जो पूछना हो पूछ ले.. पॉलिटिक्स चुनाव जीतने वालों का खेल है जो चुनाव लड़ा ही नहीं वो क्या पॉलिटिक्स करेगा.. फार्मर पीएम के साथ ऐसा बर्ताव, शायद राजघाट पर ज़मीन कम पड़ गई होगी|

देश की गरीब जनता को न्यूक्लीयर डील से क्या लेना देना, क्या डॉ. साहब आप भी एक पॉलिटिशियन की बातों में आ गए.. चुप रहकर बोलने में वाजपेयी जी उस्ताद थे, लेफ्ट को सपोर्ट वापस लेना है तो ले ले.. के सरा सरा का मतलब जो होना है होगा.. न्यूक्लीयर डील की लड़ाई हमारे लिये पानीपत की लड़ाई से भी बड़ी थी.. पॉलिटिक्स में जिद के नहीं चमचागिरी के मार्क्स मिलते हैं.. सम टाइम इट इज वाईज़ टू बी फूलिश.. ये इलेक्शन राहुल गाँधी के बस का नहीं है, मैं इसे बाहर बैठकर नहीं देख सकता.. लकड़ी की तलवार से जंग नहीं जीती जाती बारू.. पॉलिटिक्स में एक ही पॉवर सेंटर होता है पार्टी प्रेसीडेंट.. पार्टी डॉ. साहब को लायबिलिटी बनाना चाहती है और यह मैं होने नहीं दूंगा.. डॉ. साहब ने भीष्म जैसी गलती तो की जो परिवार के आगे झुक गए पर इतिहास उन्हें मीडिया के नज़रिए से नहीं देखेगा.. सच लिखना इतिहास के लिये जरूरी होता है, हम दोनों का सच लिखूंगा मैं.. पीएमओ के साथ विश्वासघात का आरोप लगते ही मेरी किताब की बिक्री बढ़ गई , पर तीन दिन में भी डॉ. साहब का फ़ोन नहीं आया.. हम फिर कभी नहीं मिले..

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