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मार्केटिंग में फर्स्ट, प्रशासन में भ्रष्ट, वरिष्ट पत्रकार राघवेंद्र सिंह की टिप्पणी

Posted on: 14 May 2018 07:42 by Ravindra Singh Rana
मार्केटिंग में फर्स्ट, प्रशासन में भ्रष्ट, वरिष्ट पत्रकार राघवेंद्र सिंह की टिप्पणी

मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार 14 साल पूरे कर 15वें साल का आधा सफर भी तय कर लिया है। वैसे हालात देखें तो शांतिपूर्ण हैैं मगर भीतर ही भीतर असंतोष, गुस्सा, पीड़ा और दुख का लावा उबल रहा है। आमतौर पर किसी भी राज्य की व्यवस्था को बेहतर करने के लिए कोई भी सरकार कितना वक्त लेती है और जनता को उसे कितना समय देना चाहिए। आज इस पर ही बात होगी। मामला आने वाले समय में चुनाव के जरिए सरकार बनाने का होगा। इसलिए हम कुछ खास बिन्दुओं पर जो कुछ घटित हो रहा है। उसे शब्दों से समझने की कोशिश करेंगे। मसलन कानून व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, सड़क, बिजली और पानी में क्या स्थितियां हैैं?

Shivraj Singh Chouhan

हम शुरूआत करते हैैं भोपाल से। पिछले दिनों एक मंत्री की कार को रात में कुछ लोग ओवरटेक करके रोकते हैैं और मंत्री के साथ सदव्यवहार या दुव्र्यवहार जो भी हुआ हो धक्का मुक्की के बाद वह हवा में गोलियां भी चलाते हैैं। मंत्री के साथ उनके सुरक्षा कर्मी भी थे सो बात ज्यादा नहीं बढ़ती और आरोपी वाहन सहित भाग जाते हैैं। इसके बाद थाने में रिपोर्ट होती है, आरोपी वाहन सहित पकड़े जाते हैैं और गिरफ्तारी के बजाए उन्हें छोड़़ दिया जाता है। खबर आती है कि मंत्री जी कार्यवाही नहीं चाहते।

अब यहां सवाल मंत्री के कार्यवाही चाहने या नहीं चाहने का नहीं है। हमला मंत्री पर याने सरकार पर हुआ है। कानून व्यवस्था की सबसे खराब स्थिति को जानने के लिये यह उदाहरण काफी है। हमारी बेटियां सुरक्षित नहीं हैैं। उनके साथ बलात्कार होते हैैं, रिपोर्ट नहीं लिखी जाती है, आरोपी लगातार उनके साथ छेडख़ानी करते हैैं। स्थिति यह होती है कि कार्यवाही के अभाव में लड़कियां आत्महत्या तक कर लेती हैैं। शनिवार की एक घटना है प्रशासन अकादमी में जुवेनाइल जस्टिस कमेटी के सामने जो बात आई वह सरकार और प्रशासन के लिए चुल्लूभर पानी में मरने लायक भी नहीं छोड़ती।

shivraj singh chauhan

कमेटी के सामने सातवीं क्लास की एक छात्रा बताती है कि जब वह टायलेट करने घर से बाहर जाती है तो उसे असामाजिक तत्व न केवल छेड़खानी करते हैैं बल्कि उठा भी लेते हैैं। उसके बाद जब वह रिपोर्ट लिखाने जाती है पुलिस भी उनके जो गुंडे करते हैैं वही करती है। (हालांकि ऐसा सभी पुलिस वाले नहीं करते) लेकिन यह एक घटना हांडी के चावल की तरह है और किसी के लिए भी भीतर तक झोकझोरती है। दूसरी तरफ गृहमंत्री के क्षेत्र में एक बेटी के साथ गैंगरेप होता है और बाद में उसकी हत्या कर दी जाती है। ऐसी दर्जनों घटनाएं हैैं जिन्हें सरकार रोक भले ही न सकती हो मगर वह कानून व्यवस्था को बेहतर कर इतना तो कर ही सकती है कि फरियादी को थाने में जाने में डर न लगे। पुलिस से गुंडे घबराएं न की शरीफ।

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इसी तरह सरकार के एक अन्य मंत्री यशोधराराजे सिंधिया को शिवपुरी में पानी नहीं मिलने के कारण अधिकारियों को धरने पर बैठने की चेतावनी देती हैैं। सुश्री राजे जूनियर मंत्री नहीं हैैं कि उन्होंने भावना में बहकर कर दिया हो। पिछले 15 सालों से वे भाजपा की सरकार में शिवपुरी की प्यास बुझाने पानी के लिए प्रयास कर रही हैैं। नौबत यह है कि बार-बार नई तारीख मिलती जल प्रदाय की और हर वह आगे खिसक जाती है। गर्मी में जब सूरज आग उगल रहा है। छह महीने बाद चुनाव हैैं तब एक मंत्री की यह कितनी बड़ी लाचारी है कि उसे धरने देने की धमकी देनी पड़ रही है।

इसी तरह राजधानी भोपाल के कोलार क्षेत्र जहां पानी के लिए पिछले दिनों मुख्यमंत्री की मौजूदगी में अधिकारियों ने कोलार जल देने का वायदा किया था लेकिन गर्मी के मौसम में भी पानी की आपूर्ति कोलार में नहीं हो पाई है। यह है प्रशासन का ढीठपन। उसे विधायक, मंत्री और मुख्यमंत्री की भी कोई परवाह नहीं। जबकि यह काम उसकी सामान्य ड्यूटी में आता है। कोई भी नगर निगम, नगर पालिका अपने क्षेत्र के लिए पानी मुहैया कराए।

shivraj singh chouhan

अब भोपाल को ही लें यहां बड़ी झील से लेकर कोलार, केरवा और नर्मदा से जलापूर्ति हो रही है। कुल जो पानी आ रहा है वह 36 लाख की आबादी के लिये पर्याप्त है। लेकिन प्रशासन में भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन के चलते 25 लाख की आबादी को भी यह पर्याप्त नहीं हो रहा है। जल प्रदूषण की हालत यह है कि यहां पानी में इतना जहर है कि उससे लोगों में कैंसर का शिकार होने के खतरे बढ़ गए हैैं। लेकिन इस सब पर जिम्मेदार अफसर और सरकार किसी ने कोई बुनियादी और ठोस कदम नहीं उठाया है।

इसी तरह किसानों की बात करें तो सूखा हो या अतिवृष्टि। राज्य के किसानों ने बम्पर पैदावार करके प्रदेश को कृषि कर्मण अवार्ड से लगभग लाद सा दिया है क्योंकि पांच बार जान देकर भी किसानों ने देश भर में प्रदेश को अव्वल रखा है। अलग बात है कि उसके टमाटर, प्याज, लहसुन सड़कों पर इसलिए फिक जाते हैैं क्योंकि उसे बाजार मूल्य तो छोडि़ए लागत मूल्य भी नहीं मिल पा रहा है।

तुड़वाना भी उसके लिए घाटे का सौदा हो जाता है। इसलिए वह अपनी औलाद की तरह प्रिय लगने वाली फसल को या तो खेत में ही गाय बैलों को खिला देता है या सड़कों पर डाल बसों, ट्रकों के टायर तले रौंदवा देता है। पिछले हफ्ते को ही देखें तो सात दिन में छह किसानों ने आत्महत्या कर ली। समर्थन मूल्य पर गेंहू-चने की तुलाई में दिक्कत हो रही है। अगर तुलाई हो गई है तो किसानों के खाते में पैसे नहीं आ रहे हैैं। इधर बासमती धान की बात करें तो होशंगाबाद, रायसेन, सिवनीमालवा ऐसे इलाके हैैं जहां लाखों टन बासमती धान अभी भी किसानों के पास रखी हुई है और उसे लागत मूल्य तक नहीं मिल पा रहा है। जनवरी में जो बासमती 2900 रुपए क्विंटल बिक रही थी आज उसकी लेवाली 2200 रुपए क्विंटल तक सिमट गई है। अब ऐसे में किसान क्या करे?

स्वास्थ्य का जिक्र करें तो सरकारी अस्पताल की हालत सरकार जितना पैसा लगा रही है लगता उतनी ही खराब हो रही है। हमीदिया अस्पताल में कार्डिक सर्जरी के लिये लंबे समय से कोशिश हो रही है मगर ज्यादा सफलता निजी अस्पतालों को मिल रही है। वह भला हो भोपाल एम्स का जिसने बहुत सारे झंझावातों के बाद भी मरीजों को अच्छे इलाज के मामले में थोड़ी राहत दी है।

15 जून से शिक्षा सत्र शुरू होने वाला है। पिछली विधानसभा सत्र तक शिक्षा मंत्री ने करीब 35 हजार शिक्षकों को भर्ती कर स्कूलों में पढ़ाई होने का भरोसा दिलाया है। मगर अभी तक भर्ती की कोई प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। अब कब प्रक्रिया शुरू होगी। कब भर्ती परीक्षा के परिणाम आएंगे और कब चयनित शिक्षकों की पदस्थापना होंगी? फिर स्कूल चलो अभियान शुरू तो हो जाएगा लेकिन 15 सालों से स्कूल में पढ़ाई अभियान कब होगा इसका इंतजार करते करते एक पूरी पीढ़ी नालायक भले ही न बनी हो मगर लायक बनकर भी नहीं निकली है। यही हाल उच्च शिक्षा के हैैं। महाविद्यालय और विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों की कमी है। रिसर्च पर कोई काम नहीं हो रहा है। समय पर परीक्षाएं नहीं हो रही हैैं। गुड गर्वनेंस का तो शिक्षा जगत में दूर दूर तक कोई पता नहीं है।

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राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने पिछले दिनों जरूर कुलपतियों से कहा है कि वह छुट्टी पर जाने के पहले आवेदन दें। इसका मतलब उच्च स्तर पर मनमानी और अराजकता का माहौल है। उन्होंने जब कार्यभार ग्र्रहण किया था तब। ई-फाइल नहीं आने पर कड़ा एतराज करते हुये कहा था कि अभी तो वे कागज पर हस्ताक्षर कर रही हैैं। अगली बार उनके पास ई-फाइल ही आनी चाहिए। इस बात को भी बीते महीनों हो गए हैैं। मंत्रालय में ही सरकार ई-फाइलिंग सिस्टम को सफल नहीं बना पाई है। पिछले हफ्ते की बात है करीब 43 फीसदी फाइल्स ऐसी थीं जो ई-फाइलिंग सिस्टम के तहत नहीं थीं।

एक एसीएस स्तर के अधिकारी ने तो साफ कह दिया कि वे अपने विभाग में इसका पालन अभी नहीं करा पाएंगे जबकि पाठक माईबाप को याद होगा कि 2013 का विधानसभा चुनाव भाजपा ने गुडगर्वनेंस के नाम पर ही लड़ा था। उसके 5वें साल यह हालत है ईफाइल सिस्टम मंत्रालय में ही लागू नहीं है तो डिस्ट्रिक और ब्लाक स्तर तक कैसे लागू होगा? किस तरह काम समय पर होंगे? किस तरह फाइल बढ़ाने के लिए बाबू और अफसरों की मुट्ठी गरम करने से जनता बच पाएगी?

प्रदेश में रेत माफिया और पहाड़ों को खत्म करने का काम हाहाकार मचने के बाद भी जारी है। सरकार ने रेत नीति बदलकर पंचायतों को सौैंप दिया। ऐसा सिर्फ कागजों पर हुआ। ज्यादातर रेत लुटेरे आज भी बिना नंबर के डम्परों में दादागिरी से रेत को सड़क किनारे इकट्ठा कर पहाड़ों की शक्ल दे रहे हैैं। होशंगाबाद और भोपाल के बीच में किसी नेत्रहीन को भी रेत चोरी और सीना जोरी के उदाहरण 24 घंटे देखने को मिल सकते हैैं।

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मार्केटिंग के जरिए सरकार ने पिछले साल नर्मदा सेवा यात्रा निकालकर उसका सफल समापन अमरकंटक में नर्मदा मां के उद्गम स्थल पर किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस कार्यक्रम में आने से चार चांद लग गए। उन्होंने भी कहा कि अब मां नर्मदा को लूटना बंद होना चाहिए। तब लोग उम्मीद कर रहे थे कि शायद रेत माफिया नर्मदा माई के छोटे बेटे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की नहीं सुन रहे होंगे लेकिन उसके बड़े बेटे नरेंद्र मोदी की बात पर जरूर मांई की छाती छलनी करना बंद करेंगे। अभी भी रेत माफिया सक्रिय है। नर्मदा जी की छाती पर जेसीबी चल रही है। उसके शिराओं से रक्त की जगह रेत नोंची खसोटी जा रही है।

15 सालों तक यह सब झेलने वाली मां नर्मदा अब कई जगह दम तोड़ रही है। आसपास के गांव खेती संकट में है क्योंकि भूजल स्तर नीचे जा रहा है। ट्यूबवेल, कुएं, हैैंडपंप सूख रहे हैैं। हालात इतने खतरनाक पहले कभी नहीं हुए। पूरी नर्मदा घाटी में जल संकट नजर आ रहा है। हालत यह है कि दस बारह घंटे किसानों को भले ही किसानों को बिजली देने के वादा किया जाए मगर सच्चाई यह है कि किसानों को खेत में बमुश्किल आठ घंटे बिजली रही है। यह स्थितियां संगीन हैैं। मार्केटिंग के जमाने में ढोल नगाड़े बजाकर जो चीखें आ रही हैैं उन्हें दबाया तो जा सकता है मगर खत्म नहीं किया जा सकता।

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पत्तों पर पानी डालने से पेड़ हरा नहीं होगा…
सरकारें योजना बनाकर उन पर अमल कराने के लिये मंत्रालय में बैठती हैैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की योजनाएं अच्छी रही हैैं। तभी तो दो बार से उनके नेतृत्व में विधानसभा चुनाव भाजपा ने जीते हैैं अब चुनावी साल है ऐसे में योजनाएं पर अमल कराने के लिये उन्हें मंत्रालय में बैठकर अपने आदेशों की सूची लेकर समय सीमा में काम कराने चाहिए। लेकिन हो यह रहा है कि वे जनता से मिलने का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैैं। जनता जिन बातों से दुखी है वह उनके मिलने से दूर नहीं होंगी बल्कि नौकरशाही जब उस काम करेगी तब मतदाता को राहत मिलेगी।

मुख्यमंत्री और मंत्री मैदान में हैैं और मंत्रालय में नौकरशाही आनंद में है। सीएम और मंत्री से जनता शिकायत करती है। कागज मंत्रालय और संचालनालय आते हैैं लेकिन समय सीमा पर उनसे काम कराने के लिए कोई सुपरमॉनीटरिंग सिस्टम नहीं है। इसलिए असंतोष बरकरार है और मुख्यमंत्री और मंत्री की मेहनत पर पानी फिर रहा है। इस सबके बाद भी मार्केटिंग में फर्स्ट भाजपा और शिव सरकार दिखाने के लिए तो फीलगुड में ही है। कह सकते हैैं फिलहाल मार्केटिंग फर्स्ट, प्रशासन भ्रष्ट। ऐसे में रहीम का एक दोहा पूरी सरकार और नेता पर बड़ा फिट है-
एकहि साधै सब सधै, सब साधे सब जाय।

रहिमन मूलहि सींचबो, फूलहि फलहि अघाय
अर्थात एक को साधने से सब सधते हैं। सब को साधने से सभी के जाने की आशंका रहती है। वैसे ही जैसे किसी पौधे के जड़ मात्र को सींचने से फूल और फल सभी को पानी प्राप्त हो जाता है और उन्हें अलग-अलग सींचने की जरूरत नहीं होती है।

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कांग्रेस तप रही है खरा सोना बनने…
15 साल से सत्ता से बाहर कांग्रेस के नेता सोना अर्थात सत्ता में आने के लिए 44-45 डिग्र्री तापमान में भी तपने को तैयार हैैं। उनके वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया कहते हैैं जितने तपेंगे उतना निखरेंगे। अब मान सकते हैैं कि कांग्रेस ने कमर कस ली है। इसकी शुरूआत दिग्विजय सिंह की नर्मदा यात्रा को मान रहे थे। कमलनाथ के अध्यक्ष बनने और ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुनाव समिति प्रमुख बनाए जाने को एक पड़ाव माना जा रहा है। अभी कार्यकर्ताओं के दिलों को जीत कर उन्हें मैदान में उतारना सबसे अहम होगा। ऐसा हुआ तो माना जाएगा कि कांग्रेस अब जड़ को सींचने लगी है।
(लेखक अाईएनडी24 समूह के प्रबंध संपादक हैं)

वरिष्ट पत्रकार राघवेंद्र सिंह

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