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पहले कोहली के चैलेंज का जवाबी वीडियो आ जाए, पेट्रोल की चिंता बाद में, कीर्ति राणा की जबरदस्त टिप्पणी

Posted on: 25 May 2018 06:22 by Ravindra Singh Rana
पहले कोहली के चैलेंज का जवाबी वीडियो आ जाए, पेट्रोल की चिंता बाद में, कीर्ति राणा की जबरदस्त टिप्पणी

हर ज़रूरी चीज़ महँगी होती जाए तो एक ही कारण होता है पेट्रोल-डीज़ल के बेक़ाबू होते भाव। सरकार कहती रही है कि तेल कंपनियों की मजबूरी और विश्व बाजार में कच्चे तेल के भाव की घटत-बढ़त जैसे कारणों से उसके हाथ में कुछ नहीं है। अभी जब कर्नाटक में चुनाव चल रहे थे, सरकार अपनी नाक बचाने में लगी थी तब क्या कांग्रेस-जदस का हाथ था जो एक पखवाड़े पेट्रोल के भाव हिले-डुले तक नहीं। देश की इस सबसे बड़ी चिंता का हल जिन पेट्रोलियम मंत्री को खोजना है वे प्रधानमंत्री की रैली की तैयारियों में जुटे हैं।

 

 

ट्विटर प्रेमी पीएमओ को मानना पड़ेगा कि पेट्रोल भाव वृद्धि वाले ट्विट के जंजाल से बच कर विराट कोहली के ‘हम फ़िट तो इंडिया फिट’चैलेंज वाले ट्विट का जवाब देना ज़रूरी समझा। इस चेलेंज को स्वीकारना देश हित और युवाओं को प्रेरित करने के लिहाज़ से ज्यादा ज़रूरी लगता है। सरकार की सेहत बिगड़े तो बिगड़े उसे तो सामने माइक आते ही सुधारा जा सकता है। अभी तो अनुष्का के ताज़े-ताज़े पति को बताना है कि सेहत के मामले में राष्ट्रवाद के अखाड़े का यह पहलवान सब पर भारी है।पहले एक वीडियो वाला ट्विट कोहली के नाम जारी हो जाए फिर शायद पेट्रोल वाली आग भी बुझा ली जाए।

अपना तो मानना है जैसे देश ने लालबहादुर शास्त्री के अनुरोध पर सोमवार का उपवास शुरू किया था वैसे ही नरेंद्र भाई, डालमिया वाले लालक़िले से इस पंद्रह अगस्त को सप्ताह में एक दिन पेट्रोल-डीज़ल वाहन को हाथ ना लगाने, सवा सौ करोड़ देशवासियों को सप्ताह में एक दिन पैदल चलने का संकल्प दिला दें तो चुटकी बजाते तेल कंपनियों की हवा निकल जाएगी।जब वो बताएँगे मित्रों मैं ट्रेन आने पर चाय की केटली लिए पैदल ही भागदौड़ करता था तो उनके इस भावुक प्रसंग को सुनकर लोगों में ताउम्र वाहन त्याग का संकल्प लेने, अपने हाथों से वाहनों को आग के हवाले करने की होड़ सी लग जाएगी।रही बात पैदलासन और पैदल चलने के फ़ायदे बताने की तो बाबाजी कुछ दिन पांतजलि के कारोबार से छुट्टी लेकर मदद कर देंगे।

चार दिन पहले घर में कौन सी सब्ज़ी बनी थी यह तो याद रहता नहीं फिर चार साल पहले मोदी ने, सुषमा, स्मृति ने क्या कहा था शायद ही याद आए लेकिन भला हो डिजिटल इंडिया पुरोधा का जो इन चार साल में आमजन को सोशल नेटवर्किंग का ऐसा डाक्टर बना दिया है कि अब वो सारी वीडियो क्लिपिंग देखने को मिल रही हैं जब मनमोहन सरकार के वक्त पेट्रोल के भाव में वृद्धि पर भाजपा ने आसमान में आग लगाने जैसा विरोध और अंगारे बरसाते बयानों से आम जन के गले यह बात उतार दी थी कि बस बहुत हुआ अब यह सरकार नहीं।

इन चार सालों में और कुछ हुआ या नहीं हुआ कम से कम देश में
राष्ट्रवाद इतना तो मजबूत हो ही गया है कि ये बढ़ती महँगाई, पेट्रोल-डीज़ल के बढ़ते भाव भी इस भीषण गर्मी में शीतल बयार के झोंके से हो गए हैं।हमारी सोच सकारात्मक रहेगी तो ही हम विश्व गुरु बन पाएँगे, ट्रंप को ताक़त दिखा सकेंगे और चीन की नाक में नकेल डाल सकेंगे। अपने वाहन में पेट्रोल डलाते वक्त हमारा सोच यह होना चाहिए कि कम से कम सत्तर साल में पहली बार देश को यह दिन देखने को तो मिला।पाँच साल पहले तो इतने भाव हुए नहीं थे तब मामाजी ने नई नवेली साईकिल खरीद कर, बाक़ी राज्यों में बैलगाड़ी पर सवारी कर खूब फोटोशूट कराए थे।अब जब एमपी सबसे अधिक दाम पर पेट्रोल बिक्री में नाम कमा रहा है तो गौशाला में जंग खा रही साइकल क्यों तलाशें।

हाल के दिनों में तो पेट्रोल भाव वृद्धि के मामले में महानगरों से भी आगे निकलने की होड़ सी लगी हुई है राज्यों में।हमें तो वैसे भी गर्व होना चाहिए कि स्वच्छता में नंबर वन और नंबर टू (इंदौर, भोपाल) ख़िताब के बाद कम से कम सर्वाधिक महँगे पेट्रोल मामले में हम देश में नंबर वन तो बने।भले ही मिलता हो 25 रु लीटर कम भाव में पेट्रोल पाकिस्तान में, आख़िर वह है तो हमारा दुश्मन देश, पेट्रोल जितना महँगा हो जाए चलेगा लेकिन उस दुश्मन से तुलना नहीं। ठीक है उसका दिल काला, ज़ुबान कड़वी लेकिन चीनी आयात करने में कैसा हर्ज? हम गौतम-गांधी-महावीर के देश के ऐसे दीनदयाल हैं जो रमज़ान के पवित्र माह में उसके बिगड़ैल बच्चों पर हाथ नहीं उठाने का विश्वास दिलाने के लिए गंगाजल भी उठा सकते हैं।रमज़ान के इन्हीं दिनों में वहाँ से गोले-गोली चलें, हमारी सीमा वाले गाँवों के निर्दोष लोग मारे जाएँ तो यह क्या हमारी पवित्र चुप्पी के जवाब में वहाँ से पुण्य कार्य किया जा रहा है।

अब यह भी मान लें कि चार साल पहले पेट्रोल दाम वृद्धि वाले जितने भी वीडियो क्लिपिंग वायरल किए जा रहे हैं वह सब भी खाते में 15 लाख रु जमा होने जैसे कोरे जुमले थे। यदि ऐसा है तो तेल कंपनियों को पेट्रोल का नामकरण जुमला ही कर देना चाहिए।लोगों को इस भाववृद्धि ने चिंता में डाल रखा है लेकिन सरकार को इतनी चिंता नहीं है, कारण विपक्ष पेट्रोल के नाम पर नहीं मोदी को हटाने के नाम पर एकजुट हो रहा है। अब जो सर्वे आना शुरू हुए हैं वो तो पहले से ही सरकार को अंगद का पाँव बताने की स्क्रिप्ट तैयार किए हुए हैं।क्यों न सरकार के चार साल पूरे होने के जलसों का इंतज़ार किया जाए, हो सकता है सरकार पेट्रोल के दाम में भी कमी करने की उदारता दिखाकर इस सालाना जलसे को यादगार बना डाले।

 

 

अपन को तो पेट्रोल-डीज़ल के बढ़ते भाव पर अंकुश लगाने का आसान तरीक़ा यही लगता है कि क्रिकेट की तरह हर महीने किसी न किसी राज्य में राजनीतिक उथलपुथल, इलेक्शन की सरगर्मी चले और चुनाव वाला भारी पत्थर तेल कंपनियों के पैरों में बँधा रहे। कर्नाटक चुनाव के वक्त इसी भारी पत्थर ने कमाल दिखाया तो है

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