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क्या किसान आंदोलन पॉलिटिकल नहीं हो सकता है, नीरज राठौर की कलम से

Posted on: 01 Dec 2018 14:33 by Surbhi Bhawsar
क्या किसान आंदोलन पॉलिटिकल नहीं हो सकता है, नीरज राठौर की कलम से

अक्सर देखता हूँ कि सरकार के घनघोर समर्थक किसानों-मजदूरों के किसी भी आंदोलन को ये कहकर खारिज़ करने की कोशिश करते रहते हैं कि “ये आंदोलन पॉलिटिकल है! इस आंदोलन में आये किसान फ़र्ज़ी हैं, जो असली किसान है वह मेहनत से अपने खेतों में काम कर रहा है, उसे आंदोलन में आने की फुरसत नहीं! या आंदोलन में तो फलां-फलां रंग के झंडे हैं! या हमारे पिता जी भी किसान हैं लेकिन उन्होंने कभी क़र्ज़ नहीं लिया, वो अपनी मेहनत से ख़ुश हैं”….. इत्यादि।

ऐसे लोग कान खोलकर सुनें:

असल में ऐसा कहकर आप पॉलिटिक्स ज़ाहिर कर रहे होते हैं। किसान आंदोलनों को अगर आप राजनैतिक झंडे के आधार पर खारिज़ नहीं किया जा सकता। ख़ुद किसानों के संगठनों के भी अपने झंडे हैं और आप जिस पार्टी की तरफ से अप्रत्यक्ष रूप से बोल रहे हो उसका भी झंडा है। झंडे पर नहीं,  मुद्दे पर जाओ। वैसे भी किसानों की समस्या भी तो राजनैतिक ही है। किसान विरोधी राजनीति ही तो किसानों की समस्याओं का असली कारण हैं तो आप उम्मीद क्यों कर रहे हैं कि ऐसे आंदोलनों में झंडे नहीं होंगे? आप क्यों सोचते हैं कि किसान पोलिटिकल नहीं हो सकता?

हो सकता है आपके परिवार को खेती के लिए क़र्ज़ न लेना पड़ा हो, ये भी संभव है कि आपका परिवार किसानी करके बेहतर गुज़ारा कर पा रहा हो, हो सकता है आपके पिता जैसे करोड़ों किसानों की हालत बुरी न हो, वो क़र्ज़ में न दबे हों, लेकिन ये भी सच है कि देश के अधिकांश किसान बद्तर स्थिति में हैं और दिनोंदिन स्थिति बनने के बजाय बिगड़ती जा रही है। आज देश में आधे किसान क़र्ज़ में दबे हैं और ये संख्या बढ़ती जा रही है। ये भी सच है पिछले 20 साल में तीन लाख से अधिक किसानों ने फसल बर्बाद होने, उचित दाम न मिलने, क़र्ज़ में डूबने के कारण आत्महत्या कर चुके हैं।

ऐसे तो मेरे भी पिता जी इस आंदोलन में नहीं आ पाये और शायद उन्हें पता भी न हो इसके बारे में लेकिन इसका मतलब ये वो अपनी मेहनत से ख़ुश हैं. या इस आंदोलन से अनभिज्ञ किसान ख़ुश है। इसलिए अगर आप यहाँ आये किसानों को ये कहकर खारिज़ करेंगे कि जो मेहनतकश किसान हैं उन्हें यहाँ आने की फ़ुर्सत नहीं, वो अपनी मेहनत कर रहे हैं और ख़ुश हैं अथवा आंदोलन में शामिल किसान फ़र्ज़ी आंदोलन कर रहे हैं तो आप न सिर्फ़ अपनी सतही समझ का परिचय दे रहे हैं बल्कि अपनी पोलिटिकल पक्षधरता की पोल खोल रहे हैं। बल्कि आप किसानों को भी असली और नकली में बाँटने का घटिया काम कर रहे हैं! आपके लॉजिक से तो हर किसान आंदोलन झूठा और फ़र्ज़ी साबित हो जायेगा।

हो सकता है आपके परिवार को कभी क़र्ज़ न लेना पड़ा हो लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि देश में क़रीब 63% किसान सीमान्त किसान हैं मने 1 हेक्टेयर से कम जोत वाले! अगर आप अपने परिवार के ठीक-ठाक हालत के आधार आंदोलन करने वाले सभी किसानों का आंकलन कर रहे हैं तो आपसे अधिक मूर्ख और कौन होगा भला! किसानों की समस्या बहुत से कारणों से तय होती है जैसे- जोत का आकार, प्रति यूनिट ज़मीन पर निर्भर परिवार सदस्यों की संख्या, ज़मीन का उपजाऊपन, सूखा, बाढ़, प्राकृतिक आपदा, पारिवारिक विपत्ति, बीमारी, मार्किट में पैदा किये गये उपज का बाज़ार में कम दाम, मंहगाई और सबसे बढ़कर सरकार द्वारा किसानों की अनदेखी इत्यादि! ये सब देश, काल और फसल के हिसाब से भी बदलता रहता है. तो आप सब सब धान 22 पसेरी न करिए।

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