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नैतिक चरित्रहीन जनप्रतिनिधि, वरिष्ठ पत्रकार राजेश राठौर की टिप्पणी

Posted on: 19 May 2018 09:29 by Ravindra Singh Rana
नैतिक चरित्रहीन जनप्रतिनिधि, वरिष्ठ पत्रकार राजेश राठौर की टिप्पणी

हिंदुस्तान की राजनीति में जो नेता कसमें खाकर वादे करके मतदाताओं के पैर में गिर कर चुनाव जीतता है। वह बाद में इतनी जल्दी अपना चरित्र बदल देता है, इसका अंदाजा किसी को नहीं होता। कहते हैं कि गिरगिट की तरह रंग बदलना पुरानी कहावत है, लेकिन मुझे लगता है कि नैतिक रुप से जो चरित्रहीन होते हैं वह कभी भी कुछ कर सकते हैं पंचायत, नगर निगम, विधानसभा और लोकसभा में जिस तरीके से लेकर सारे जनप्रतिनिधि दल बदल लेते हैं। सिर्फ पैसों की खातिर या मंत्री पद की खातिर। वो भूल जाते हैं कि जब वह जनता के पास वोट मांगने गए थे, तब उन्होंने क्या कहा था।

कुछ घंटे और कुछ दिन बाद ही ये जनप्रतिनिधि अपना चोला उतारने में देरी नहीं करते। बेशर्म, सिद्धांत हीन और सबसे बड़ी बात नैतिक रुप से चरित्रहीन इन जनप्रतिनिधियों के मुंह पर भी तमाचा मारने का अब समय आ गया है। जब ये नेता वोटो की भीख मांगने आते हैं तो मतदाताओं को इनसे पूछना चाहिए कि क्या आप अपने पद और पैसे के लिए दल बदल लेंगे। किसी की भी गोद में जाकर बैठ जाएंगे। क्या जनप्रतिनिधि ऐसा करने से पहले उन मतदाताओं से पूछेगा जिनके कारण वह विधायक, सांसद या पार्षद बना है। क्या वह जनप्रतिनिधि अपनी अंतर आत्मा के अलावा लोगों को सिर ऊंचा करके यह कह पाएगा कि मैंने चुनाव जीतने के बाद क्यों दल बदला। वाकई शर्मनाक बात है कि जो जनप्रतिनिधि दल बदल लेते हैं उनको रोकने के लिए अब सरकार या चुनाव आयोग को कोई कड़ा कानून लाना चाहिए।

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सवाल इस बात का नहीं कि भाजपा या कांग्रेस कौन कितने विधायक, सांसद कब खरीदती है। सवाल इस बात का है कि दिनदहाड़े जो यह ब्लैकमेल जनप्रतिनिधि करते हैं उसका रुकना जरूरी है, क्यों मजाक बनाया जाता है जनता के सपनों का। क्या कारण है कि जनप्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद कोई मौका ऐसा नहीं चूकते जब वह अपना नैतिक चरित्रहीन होने का प्रमाण पत्र देने में देरी नहीं करते हो। क्या कारण है कि ये जनप्रतिनिधि जनता के दम पर विधानसभा और लोकसभा में पहुंचते हैं और जनता के साथ सरेआम विश्वासघात करते हैं। दल बदल कानून लाया गया लेकिन उसके बाद भी कर्नाटक जैसी घटनाएं रोकने के लिए कोई ऐसा कानून लाना पड़ेगा जिससे जनप्रतिनिधि 100 या 50 करोड़ लेकर या मंत्री पद लेकर किसी के भी हाथों बिक जाए ऐसा होना नहीं चाहिए।

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इस तरह के अभियान के लिए आम जनता को आगे आना पड़ेगा आने वाले समय में विधानसभा और लोकसभा चुनाव होना है। उस जनप्रतिनिधियों से यह पूछा जाना चाहिए कि आप अपना दल तो नहीं बदलेंगे, और दल बदलेंगे तो पैसों के खातिर या अपने स्वार्थ के लिए। चुनाव आयोग को अब प्रयास करना चाहिए कि  पैसों की खातिर या मंत्री पद की खातिर भूल जाते हैं कि जो जनता के पास वोट की भीख मांगने गए थे, तब उन्होंने क्या कहा था। कुछ घंटे और कुछ दिन बाद ही अपना चोला उतारने में  देरी नहीं करते।

बेशर्म, सिद्धांतहीन और सबसे बड़ी बात नैतिक रूप से चरित्रहीन जनप्रतिनिधियों के ऊपर भी तमाचा मारने का समय आ गया है। जब ये नेता वोटों की भीख मांगना आते हैं, तो मतदाताओं को इनसे पूछना चाहिए कि आप अपने पद और पैसे के लिए बदलेंगे या किसी की भी गोद में जाकर बैठ जाएंगे ।क्या जनप्रतिनिधि भी ऐसा करने से पहले उन मतदाताओं से पूछेगा जिनके कारण वो विधायक, सांसद, पार्षद बना हे।  अब सरकार या चुनाव आयोग को कोई  कानून बनाना चाहिए।

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