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फिल्म ‘गुलाबो-सीताबो’: नवाब चुन्न मिर्जा के रोल में छा गए अमिताभ बच्चन

सुजीत सरकार का नई फिल्म “गुलाबो सिताबो” देखी । फिल्मकार सुजीत सरकार बहुत ही मंजे हुए और निष्नात निर्देशक हैं । वे जीवन से जुड़ी हुई , जीवन में जीवन में रची बसी कहानियों को चुनते हैं और एक छोटे से कथानक को एक बड़ी शक्ल देकर फिल्म बनाते हैं । गुलाबो सिताबो वैसे तो शीर्षक जो दिया गया है फिल्म का समझ से परे है परंतु फिल्म का जो उपसंहार है वह है ‘ ना घर तेरा ना घर मेरा ये जग जोगी वाला फेरा ,राजा हो या रंक भिकारी , अंत शांत एकसा होई। तो एक फातिमा मंजिल है लखनऊ में जिसके कई दावेदार हैं परंतु अंत में असली मालिक उसे मात्र एक रुपए में बेचकर अपने पूर्व प्रेमी के साथ चली जाती है आखिरी में कहानी में जो टिविस्ट है वह अद्भुत है।

अमिताभ बच्चन फिर नवाब चुन्न मिर्जा के रोल में छा जाते हैं बांके रस्तोगी के रोल में आयुष्मान खुराना भी कम नहीं गिरत हैं । दोनों का अभिनय अद्भुत है। ऐसा प्रतीत होति है जैसे अमिताभ बच्चन ने नवाब चुन्न मिर्जा के काल्पनिक पात्र है जीवित कर दिया है। अमिताभ बच्चन अपने अभिनय के सर्वोच्च शिखर पर हैं। उन्होंने बहुत ही बेमिसाल अभिनय किया है। सहायक कलाकार विजय राज (ज्ञानेंद्र शुक्ला ) सृष्टि श्रीवास्तव, वृजेन्द्र काला (वकील ) ने भी अच्छा अभिनय किया है।

फिल्म का एंबिआंस लखनऊ की पृष्ठभूमि है जो कहानी के लिए बिल्कुल माकूल है। फातिमा मंजिल अपने आप में एक किरदार है जो अपने खंडहर के रुप में अपनी कहानी कह रहा है। फातिमा मंजिल के रहने वाले किराएदार जो खुद को मालिक समझते हैं अंत में फातिमा मंजिल को छोड़ने के लिए मजबूर हो जाते हैं। इस तरह आरकिओलॉजिकल विभाग और धनकुबेर बिल्डर , फातिमा मंजिल पर अपना हक जमाते हैं परंतु अंत में कुछ नहीं हासिल कर पाते हैं।

फिल्म की शुरुआत कठपुतलियों के खेल से होती है जिसमें एक कठपुतली का नाम रहता है गुलाबो और दूसरी तक पुतली का नाम रहता है सिताबो । कठपुतली खेल के माध्यम से निर्देशक अपने निर्देशन को साबित करता है और दिखाता है कि हम सब जो इस दुनिया में रहते हैं किसी अनजानी डोर से दुनिया के सर्जक से बंधे हुए हैं ,और हमारे हाथ में कुछ भी नहीं है। फिल्म के प्रोड्यसर हैं रोनी लाहिरी और शकील कुमार। फिल्म को लिखा है जूही चतुर्वेदी ने, फिल्म का संगीत दिया है शांतनु मोइत्रा ने जो बहुत ही कर्णप्रिय है समय-समय पर पार्श्व में बजने वाला गाना जिंदगी की हकीकत को बयान करता है।अवि मुखोपाध्याय की सिनेमैटोग्राफी सुंदर है प्रभावशाली है।

समीक्षक
चन्द्रशेखर बिरथरे ‘पथिक’

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