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प्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी जी के साथ भुट्टे के भजिए का आनंद, वरिष्ठ पत्रकार अर्जुन राठौर की टिप्पणी

Posted on: 24 May 2018 04:25 by Ravindra Singh Rana
प्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी जी के साथ भुट्टे के भजिए का आनंद, वरिष्ठ पत्रकार अर्जुन राठौर की टिप्पणी

बात उन दिनों की है जब प्रभाष जोशी जी जनसत्ता के संपादक थे और वे यमुना पार रहा करते थे उन्हीं दिनों मेरा दिल्ली में आना-जाना बना रहता था । प्रभाष जी से मिलने के लिए मैं यमुनापार उनके निवास पर पहुंचा, शाम का समय था ओर ठंड के दिन थे मुझे उनके छोटे भाई गोपाल जोशी जो कि स्वदेश में पत्रकार थे मिल गए , वे कहने लगे नाना दिल्ली कब आया। मैंने कहा एक दो दिन पहले ही दिल्ली आया था किसी काम से मैंने सोचा दादा याने प्रभाष जी से मिलता चलूं।

गोपाल जोशी की आदत थी वह हर किसी को नाना कहकर संबोधित करते थे । हम लोग प्रभाष जोशीजी के पास थोड़ी देर बैठे थे कि अचानक प्रभाष जी का भुट्टे के भजिए खाने का मन बन गया गोपाल जोशी ने मुझसे कहा चलो मंडी होकर आते हैं आज दादा के साथ भुट्टे के भजिए खाएंगे। गोपाल जोशी ने लिया बड़ा सा थैला लिया और हम बस से सीधे मंडी पहुंच गए।

मंडी में हमने आधा थैला भुट्टे खरीदें और उन्हें लेकर वापस घर पहुंचे। थोड़ी ही देर में रसोई में से भुट्टे के भजिए बनकर आ गए। थोड़ी देर में वहां पर प्रभात जी के कुछ पत्रकार मित्र भी आ गए और भुट्टे के भजिए का जो दौर शुरू हुआ वह रात 9 बजे बजे तक चलता रहा। प्रभाष जी से मेरी काफी देर तक चर्चा भी हुई। उन दिनों जनसत्ता में मेरे आलेख नियमित रूप से छपा करते थे । इंदौर ओर इंदौर के आसपास की की रिपोर्ट।

प्रभाष जी के साथ भुट्टे के भजिए की वह शाम हमेशा मुझे याद रहेगी प्रभाष जी की यह खासियत थी कि दिल्ली में रहने के बावजूद अपने मालवी पन को उन्होंने कायम रखा था और लगभग मालवी भाषा का ही वे बातचीत में उपयोग करते थे। गोपाल जोशी जी भी यही आदत थी वह भी बड़ी आत्मीयता से इंदौर की बातें किया करते थे।

अर्जुन राठौर 

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