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और अब कुंभकर्ण भी

Posted on: 05 Dec 2018 15:27 by Surbhi Bhawsar
और अब कुंभकर्ण भी

मुकेश तिवारी

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सत्ता के सेमीफाइनल यानी 2018 के विधानसभा चुनाव में दो राज्यों में प्रचार का आज आखिरी दिन है और चर्चा में कुंभकर्ण आ गया है। ऐसा इसलिए क्योंकि एक बड़े दल के सबसे बड़े नेता की जुबान फिसली और वह राजस्थान के बड़े नेता कुंभाराम के नाम पर चल रही योजना का उल्लेख कुंभकर्ण योजना के रूप में कर गए। अब दूसरे बड़े दल ने उनका मजाक उड़ाने के लिए इसे मानो हथियार बना लिया है। बड़ी-बड़ी रैली और सभा में सवाल पूछा जा रहा है कि जिस दल के नेता को कुंभाराम और कुंभकर्ण में फर्क पता नहीं है क्या उसके दल के हाथ में आप राजस्थान सौंपेंगे?

भगवान राम का मंदिर तो बीते कई सालों से चुनावी मुद्दा बनता आया है और सत्ता के इस सेमीफाइनल में भी एक प्रमुख मुद्दा रहा। भाषा की मर्यादा को छोड़कर नेताओं द्वारा एक-दूसरे को कंस और रावण बताने की परंपरा भी पुरानी हो चुकी है। इस परंपरा का निर्वाह भी पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में खूब हुआ। नया यह था कि सत्ता के सेमीफाइनल में राम भक्त हनुमान की जाति बताई गई और यह चुनाव में बहस का बड़ा मुद्दा भी बनी। चुनाव प्रचार जब आखिरी दौर में आ गया तो नेताओं ने रही सही कसर पूरी कर दी। उनकी जुबान से कुंभकर्ण भी नहीं बच पाया। अब सवाल यह उठेगा कि आखिर सत्ता के सेमीफाइनल में नेताओं के पास  कहने को बचा क्या? इस सवाल का सबसे ईमानदार जवाब उन प्रदेशों की जनता दे सकती है जहां सत्ता का यह सेमीफाइनल हुआ। जनता चाहे छत्तीसगढ़ की हो, मध्यप्रदेश की या फिर राजस्थान, तेलंगाना और मिजोरम की अगर आम लोगों से पूछा जाए तो शायद उनका जवाब यह होगा कि हमारे मुद्दों पर तो कोई बात ही नहीं हुई। सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के मुद्दे तो केवल चुनावी घोषणा पत्र, दृष्टि पत्र और संकल्प पत्र तक ही सीमित होकर रह गए। चुनाव प्रचार में ज्यादातर समय बात हुई तो सिर्फ चौकीदार, नामदार, राफेल, सीबीआई, राम मंदिर, गाय, गौशाला, संघ की शाखा, हनुमान जी की जाति और अब कुंभकर्ण पर।

लेखक Ghamasan.com के संपादक हैं।

 

 

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