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पुलिस की मुस्तैद जिंदगी में ‘वीकली ऑफ़’ की बाल सुलभ खुशी!

Posted on: 05 Jan 2019 10:12 by Ravindra Singh Rana
पुलिस की मुस्तैद जिंदगी में ‘वीकली ऑफ़’ की बाल सुलभ खुशी!

अजय बोकिल

‘सरकारी नौकरी’ और ‘छुट्टी’ काफी हद तक समानार्थी शब्द हैं, क्योंकि वहां अधिकृत छुट्टी न होते हुए भी अमूमन छुट्टी जैसा माहौल ही होता है। लेकिन संदर्भ अगर पुलिस का हो तो यही शब्द विरूद्धार्थी माने जाते रहे हैं। यहां बात पुलिस के शब्दकोश की नहीं, कार्य प्रणाली की हो रही है। इसलिए जब मुख्यंमंत्री कमलनाथ ने मध्यप्रदेश के पुलिस वालों को पहली बार साप्ताहिक छुट्टी ( वीकली ऑफ़) का स्वाद चखाया तो निश्चित ही यह अमृत प्राशन की तरह सुखदायी रहा होगा। क्योंकि एक तो छुट्टी वह भी हक के साथ, पुलिस के लिए सपना ही रही है। पुलिसवाला और छुट्टी पर..! यह बात ही आसानी से पचने वाली रह नहीं गई थी।

क्योंकि वह वर्दीधारी इंसान हर रोज उसी मुस्तैदी (कभी कभी हैरान-परेशान और थका हुआ-सा भी) ड्यूटी पर नजर आता था। मानो वह हारी- बीमारी, गमी खुशी, राग-विराग से परे हो। नए साल में पहली बार राज्य के 60 हजार से अधिक पुलिस कर्मियों ने छुट्टी का मुंह देखा। सहज आनंद की एक खिड़की खुली देखी। परिवार के साथ कुछ क्षण बिताए। रूटीन में चलती जिंदगी को करीब से जाना। अपराध और विद्रूपता के अलावा भी दुनिया में बहुत कुछ है, यह बरसों बाद फिर से महसूसा। लगा कि जन्म कुंडली में शनि की जगह गुरू आकर बैठ गया हो। ना-ना करते भी जो रोस्टर बना है, उस हिसाब से रोजाना औसतन 8 हजार पुलिसकर्मी अवकाश पर रहेंगे।

अमूमन दफ्तरों में छुट्टी मिलना कठिन भले होता हो, लेकिन असंभव नहीं होता। लेकिन पुलिस की मुस्तैदी भरी नौकरी में मानो ‘छुट्टी’ शब्द था ही नहीं। था भी तो दुर्लभ श्रेणी में। कारण काम का बोझ और कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी। उस पर यह काल्पनिक डर कि इतने पुलिस वाले छुट्टी पर चले जाएंगे तो कानून का डंडा कौन घुमाएगा? सरकार के इकबाल का क्या होगा? साथ में यह मानसिकता भी कि जैसा चल रहा है, चलने दो। छुट्टी देने जैसे फंदे में कौन पड़े। यूं भी हर पुलिस वाला सालों नौकरी बजाते-बजाते ‍ घिसकर इतना जड़ हो जाता है कि घड़ी के कांटों में उलझने की ‘गलती’ नहीं करता। बस, वह चलता रहता है, जैसी कि घड़ी भी चलती रहती है। पुलिसवालों के बच्चे अपने ‘पापा’ से कम ही ‍मिल पाते हैं। परिवार में संवाद के क्षण सीमित ही होते हैं, क्योंकि ‘पापा’ को वर्दी पहनने की जल्दी होती है।

सवाल पूछा जा सकता है कि नौकरियां तो और भी हैं, शायद ज्यादा थका देने वाली भी हैं, लेकिन विश्राम की भी कोई ‘रेस्टिंग क्रीज’ तो होती है। माना जाता है कि 8 या 10 घंटे की ड्यूटी मानवीय कार्यक्षमता के हिसाब से काफी है। लेकिन व्यावहारिक पुलिस मैन्युअल में ऐसा कुछ नहीं होता। यहां ड्यूटी शुरू होने और खत्म होने के बीच केवल सोने भर का अंतराल होता है। वह भी कई बार ऊंघते हुए। नतीजा यह होता है कि ज्यादातर पुलिस वाले शारीरिक और मानसिक बीमारियों के शिकार होने लगते हैं।

अब मुद्दा यह ‍कि आखिर (सिविल) पुलिस वालों के साथ ही ऐसा क्यों? क्यों उनसे रोबोट की तरह काम करने की उम्मीद लगी रहती है? इसका एक जवाब तो यह है कि बढ़ती आबादी और सभ्यता के विकास के साथ- साथ अपराधों का बढ़ना और कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ना। समाज में तनाव और ‍अविश्वास के क्षितिज का लगातार विस्तार होना। शिक्षा के साथ नागरिकों में सिविक सेंस के विकास की जो अपेक्षा रही है, वह व्यवहार में कम नजर आती है। यही वजह है कि कई बार ट्रैफिक सिग्नल पर भी पुलिस को तैनात करना पड़ता है, भई लाल सिग्नल है, रूको ! ले‍किन यह लाल सिग्नल पुलिस कार्य घंटों में कभी नहीं दिखता था। अगर एनसीआरबी की वर्ष 2013 की रिपोर्ट देखें तो मप्र में 72 हजार 518 पुलिस के स्वीकृत पद थे, ‍जिनमे से 18 फीसदी खाली पड़े थे। जबकि राज्य की आबादी लगातार बढ़ रही है।

भारत के राष्ट्रीय औसत की ही बात करें तो देश में प्रति 1 लाख आबादी पर 140 पुलिस कर्मी होने चाहिए, जबकि मप्र में यह संख्या 122 ही है। अगर संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर के हिसाब से देखें तो मप्र में पुलिस ‍कर्मियों की प्रति लाख संख्या आधी है। यह स्थिति भी तब है, जब राज्य में बीते डेढ़ दशक में पुलिस कर्मियों की काफी भर्ती हुई है। लेकिन जितनी जरूरत है, उपलब्धता उससे बहुत कम है। परिणामस्वरूप काम का बंटवारा करना मुश्किल है। लिहाजा जो ड्यूटी पर हाजिर है, वही ‘वजीर’ है। ऐसे में ‘वीकली ऑफ़ जैसा दफ्तररों का चिर-परिचित शब्द भी पुलिस थानों में फारसी भाषा का लगता है। किसी भी थाने में टीआई के माथे पर सबसे ज्यादा शिकन तब देखने को मिलती है, जब कोई अधीनस्थ छुट्टी की दरख्वाकस्त लेकर उसके सामने खड़ा होता है। वजह यह कि यह भी चला गया तो काम कैसे और किसके भरोसे होगा ? कमोबेश यही हाल किसी टीआई की छुट्टी की अर्जी पर आला अफसरों का होता है। आलम यह ‍कि दूसरों को ‘ठीक’ करने वाला पुलिसकर्मी अपनी ही बेटी के हाथ पीले करने के लिए छुट्टी की भीख मांगता दिखता है।

यह स्थिति अकेले एमपी में ही हो, ऐसा नहीं है, अन्य राज्यों और पाकिस्तान तक में है। तमिलनाडु में तो यह मामला हाई कोर्ट तक गया। वहां कोर्ट ने पूछा कि आखिर पुलिस वालों को हर सप्ताह छुट्टी क्यों नहीं दी जा सकती ? हमसे पहले हरियाणा और यूपी ने भी पुलिस को साप्ताहिक अवकाश की घोषणा की थी। लेकिन पूरी शिद्दत से वह लागू नहीं हो पाया। ‍हरियाणा में वह साप्ताहिक छुट्टी पखवाड़े में बदल गई तो यूपी में अभी भी वह प्रायोगिक स्तर पर ही है। हालांकि खुद पुलिस वालों को भी इस परेशानी का अहसास है। कर्नाटक पुलिस एक्ट 2007 में इस बात का साफ उल्लेख है कि पुलिसकर्मियों को साप्ताहिक अवकाश दिया जाए। लेकिन वह भी किताबी सुभाषित साबित हुआ। पाकिस्तान रेलवे पुलिस ने हाल में अपने कर्मचारियों को ‘वीकली आॅफ’ का ऐलान किया है।

ऐसे में छुट्टी, वो भी रोटेशन से हर सप्ताह, सचमुच एक सपना सच होने जैसा है। दरअसल इस सुविधा को ‘ऐश’ के बजाए पुलिस की नौकरी के मानवीय पहलू के रूप में देखा और समझा जाना चाहिए। चुनाव से पहले कांग्रेस ने इसे अपने घोषणा पत्र में शामिल किया। लेकिन खास बात यह है कि मुख्य मंत्री कमलनाथ की संकल्प शक्ति ने इसे हकीकत में बदल दिया। क्योंकि मप्र में पुलिस वालों को छुट्टी और पुलिस कमिश्नर प्रणाली की गाजर हर नई सरकार दिखाती आई है, लेकिन अमल के स्तर पर आकर वह फेल हो जाती है।

अभी यह कहना मुश्किल है ‍कि पुलिस वालों को ‍मिल रही ‘साप्ताहिक अवकाश’ की खुशी कितने दिन टिकेगी। क्या यह रूटीन व्यवस्था का ‍हिस्सा बनेगी या फिर कुछ दिनों बाद फोर्स कम होने के बहाने की आड़ में दफा हो जाएगी? इससे भी बड़ी बात उन वीआईपियों और आम जनता को अपना मानस बदलने की है, जो पुलिस और ड्यूटी को एक दूसरे का पर्यायवाची मानते हैं। बेशक पुलिस थाने पर कभी ताला नहीं लग सकता। क्योंकि वह समाज की गति‍विधियों का अनथक निगहबान है, लेकिन थाने के ताले की चाबी सम्हालने वाला दो घड़ी सुकून से बिताने का हकदार तो है। सच कहें तो आज की तारीख में बच्चों के बाद छुट्टी शब्द से कोई खुश होगा तो वो पुलिस वाले ही हैं। बस, खतरा इतना है ‍कि यह छुट्टी कहीं, राहत से बढ़कर आदत में न बदल जाए, दूसरे कई सरकारी दफ्तररों की तरह।

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