‘‘मरना कोई खास बात नहीं, पर न जीना एक भयानक बात है।’’

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उपन्यास

ये पंक्तियां संसार के एक महान उपन्यास — ले मिजराबेल — के आखिरी पन्नों से हैं। जीवन की मार्मिकता और गहनता का जितना विषद, जितना सूक्ष्म, जितना संवेदनशील, जितना प्रभावमय, जितना यथार्थ चित्रण इस उपन्यास में हुआ है, दुनिया के कम ही उपन्यासों में हुआ होगा। यह उपन्यास 1862 में प्रकाशित हुआ था। 157 साल पहले। कहानी फ्रांस की पृष्ठभूमि में है। पर यह उपन्यास समग्र मानवता का उपन्यास है। डेढ़ सौ साल की दूरी के बाद भी न सिर्फ आज सामयिक है, अपितु आने वाली उन सदियों तक भी सामयिक रहने वाला है, जब तक इंसानी दुख-दर्द और समाज-व्यवस्था का समग्र रूपांतरण नहीं हो जाता।

हिंदी में यह उपन्यास पहली बार 2008 में संवाद से छपा था। हजार से अधिक पृष्ठों के इस उपन्यास के पहले खंड का अनुवाद शोलोखोव के ‘धीरे बहो दोन रे’ के अनुवादक गोपीकृष्ण गोपेश ने किया था और दूसरे खंड का अनुवाद हावर्ड फास्ट और हॉब्शबाम की कृतियों के समर्थ अनुवादक लाल बहादुर वर्मा ने।

आज इसके दूसरे संस्करण का संपादन पूरा किया। दूसरा संस्करण अब अधिक मुकम्मल होगा। इसके लिए एक नई भी भूमिका भी लिखी है। यह कहना एक तथ्य को दोहराना होगा कि यह विश्व-साहित्य की अप्रतिम निधि तो है ही, अनुवाद भी हिंदी के श्रेष्ठतम अनुवादों में परिगणित होने योग्य है।

यह नया संस्करण मई-2019 के अंत तक प्रकाशित हो रहा है।

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