हिंदी हटाओ के संघर्ष से भाजपा लाओ तक द्रविड़ राजनीति | Dravid Politics to bring BJP back

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DMK AIADMK

तमिलनाडु में इस बार राजनीतिक फिजां बदली-बदली सी है। कभी जहां हिंदी के विरोध में हिंसक आंदोलन हुआ करते थे औऱ ऱाजनीतिक दल, खासतौर पर द्रविड़ राजनीति पर आधारित दल अपने चुनाव घोषणा पत्र में भी हिंदी न थोपने और अंग्रेजी को संवैधानिक भाषा का दर्जा देने की बात किया करते थे वे अब बदले-बदले से नजर आ रहे हैं।

इस बार तो दोनों प्रमुख द्रविड़ दलों राज्य में सत्तारुढ़ अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनैत्र कषगम (एआईएडीएमके) और द्रविड़ मुनैत्र कषगम (डीएमके) ने सभी केंद्रीय सरकारी दफ्तरों में तमिल को आधिकारिक भाषा की तरह शामिल करने की मांग इस बार रखी है। लगभग 50 साल से सत्ता में रहने के कारण द्रविड़ियन पार्टियों की बदलती सच घोषणापत्रों में दिख रही है।

इससे भी कहीं आगे नास्तिक पृष्ठभूमि की द्रविड़ पार्टी एआईएडीएमके ने तो ठेठ धार्मिक नारों पर आधारित राम मंदिर निर्माण और हिंदू राष्ट्र का समर्थन करने वाली भारतीय जनता पार्टी के साथ हाथ मिलाया है। इसका उसके परंपरागत वोट बैंक और कैडर पर क्या असर पड़ता है यह इस चुनाव में देखने वाली बात होगी। उधर, डीएमके के साथ कांग्रेस है। यह गठबंधन बीते दी-तीन चुनावों से है औऱ बीते चुनाव में तो इसे एक भी सीट पूरे राज्य में नहीं मिली थी। लिहाजा इस बार सारे देश के राजनीतिक विश्लेषकों की निगाहें इस पर लगी हैं कि 18 अप्रैल को राज्य की जनता इस गठबंधन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को माफ करती है या नहीं।

इसके अलावा कांग्रेस अध्यक्ष ने भी बीते सालों में विभिन्न मठ-मंदिरों में जाकर खुद को आस्तिक साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसकी द्रविड़ वोट बैंक पर क्या प्रतिक्रिया होती है, देखने वाली बात होगी। सत्ता से बाहर रहने के बाद कांग्रेस में भी टूट-फुट हुई है। जीआर वासन इस बार अकेले ही एआईएडीएमके के साथ हाथ मिलाकर चुनाव लड़ रहे हैं। वहीं विभिन्न मुकदमों से घिरे पी. चिदंबरम के बेटे कार्ति बीता चुनाव हारने के बाद दोबारा अपने पिता की सीट शिवगंगै से मैदान में है। दिवंगत एम करुणानिधि की बेटी कनीमोली भी पहली पबार लोकसभा में जाने की तैयारी में है। सितारे तो और भी बहुत सारे हैं, लेकिन फैसला जनता ही करेगी।

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