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डॉ. धीरेंद्र जैन का कहना है- बच्चों का इलाज भगवान की सेवा है

Posted on: 12 May 2018 12:38 by Praveen Rathore
डॉ. धीरेंद्र जैन का कहना है- बच्चों का इलाज भगवान की सेवा है

इंदौर। चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ. धीरेंद्र जैन का कहना है कि डॉक्टर का प्रोफेशन चुनौती पूर्ण तो है, लेकिन समाज सेवा के लिए यह अच्छा माध्यम भी है। मरीज जब अच्छे होकर घर जाते हैं, तो खुशी होती है। आपको बता दें कि डॉ. जैन पश्चिम क्षेत्र में दशकों से बच्चों का इलाज कर रहे हैं। वे डालफिन हॉस्पिटल के डायरेक्टर है एवं महेश नगर में ईजी केयर हॉस्पिटल का संचालन भी कर रहे हैं। वे कई सामाजिक संस्थाओं से भी जुड़े हैं। घमासान डॉटकॉम ने उनसे चर्चा की, प्रस्तुत है मुख्य अंश…dheerendra 2

सवाल : आपके करियर की शुरुआत कब और कहां से हुई?
जवाब : 1981 से मैं डॉक्टर के प्रोफेशन में हूं। देवी अहिल्या स्कूल, वैष्णव ट्रस्ट के सभी स्कूल और सेठिया अस्पताल में साल में दो बार नि:शुल्क कैम्प करता हूं। क्लाथ मार्केट में हॉस्पिटल में 1985 से अब तक निशुल्क सेवाएं दे रहा हूं। 11 साल पहले 8 डॉक्टरों ने मिलकर डालफिन हॉस्पिटल शुरू किया, उसमें आज भी प्रतिदिन एक घंटे का समय देता हूं। पिछले तीस साल से मैं पश्चिम क्षेत्र में काम कर रहा हूं। इस क्षेत्र में बच्चों का कोई बड़ा अस्पताल नहीं था, इसलिए आठ साल पहले महेश नगर में ईजी केयर हॉस्पिटल की स्थापना की।dheeren 1

सवाल : ऐसे कोई गंभीर केस जो आपको याद है?
जवाब : लोग डॉक्टर को ईश्वर का दूत मानते है। फिर भी कई बार नेगेटिव रिजल्ट मिलने से परेशानी हो जाती है। हमारी पूरी कोशिश होती है कि मरीज को सफलतापूर्वक इलाज करें। चार साल पहले द्वारकापुरी के रहने वाले पेरेंट्स के बच्चे 540 ग्राम और एक किलो सौ ग्राम वजन के बच्चे जन्मे थे, स्थिति काफी नाजुक थी। बच्चों के परिजन ज्यादा पैसा खर्च भी नहीं कर सकते थे, हमने उनका इलाज किया। डेढ़ महीने तक बच्चे नर्सरी में रहे। आज वे चार साल के हो गए हैं और दोनों ही स्वस्थ हैं। हमें खुशी मिलती है जब गंभीर केस में सफलता मिलती है। पश्चिम एरिया के गरीब बच्चों के माता-पिता जब बच्चों को लेकर मिलने आते हैं, तो खुशी होती है।

सवाल : डॉक्टर्स के साथ हमेशा चुनौती बनी रहती है, कैसे इन परिस्थितियों से निपटते हैं?

जवाब : हम माता-पिता को पूरी तरह बीमारी के बारे में जानकारी देते हैं, कितना खर्च आएगा, उसको लेकर भी बताते हैं, कई केस ऐसे आते हैं, जिसमें माता-पिता ज्यादा पैसा खर्च नहीं कर पाते हैं, ऐसे में कभी-कभी नकारात्मक परिणाम भी मिलते हैं, फिर भी हम उपलब्ध संसाधनों से इलाज करते हैं, विषम परिस्थितियों में रैफर करते हैं। हमारी कोशिश होती है कि किसी का कोई नुकसान न हो। मरीज के परिजन को बीमारी और परिणाम के बारे में जानकारी दे देते हैं, ऐसे में कोई अप्रिय स्थिति नहीं बनती है। इसलिए पारदर्शिता रखना बहुत ही जरूरी है।

सवाल : शहर में कुपोषण के कितने केस आ रहे हैं?
जवाब : कुपषोण के मामले पिछले बीस साल की तुलना में कम आ रहे हैं, लेकिन फिर भी जो केस सामने आ रहे हैं, उनमें बच्चों के पिज्जा-बर्गर खाने के कारण नुकसान हो रहा है। बच्चों के स्वास्थ्य पर इसका प्रतिकूल असर पड़ रहा है। फ्रूटस् की मात्रा ज्यादा दें, बच्चों को प्रॉपर न्यूट्रिशंस दें, इसका पेरेंटस् को विशेष ध्यान देना चाहिए।

सवाल : शहर के और किन-किन संगठनों से जुड़े हैं?
जवाब : दिगंबर जैन समाज, क्लाथ मार्केट और सराफा ट्रस्ट से जुड़ा हूं। ब्राह्मण समाज और स्कूलों में कई कैम्प लगा चुका हूं। दिगंबर जैन समाज में भी सक्रिय हूं। हाल ही में जैन समाज में हमने सर्वाइकल कैंसर का टीकाकरण शिविर लगाया और लोगों को जागरूक किया।

सवाल : आपने डॉक्टर का प्रोफेशन कैसे चुना ?
जवाब : मैं जब 8वीं क्लास में था, तब सोचा था कि इंजीनियर बनूंगा, लेकिन 6 माह के बाद ही मैंने डॉक्टर बनने का विचार आया और मैंने बॉयोलॉजी की। तब ही मैंने सोच लिया था कि मैं बच्चों का डॉक्टर बनूंगा। होलकर कॉलेज से पढ़ाई पूरी की और फिर पीएमटी की परीक्षा दी। मेरी मानना है कि समाजसेवा के लिए डॉक्टर का प्रोफेशन बहुत ही बेहतर है।

सवाल : नई पीढ़ी को क्या संदेश देना चाहेंगे।
जवाब : यंगस्टर आज डॉक्टर बनना पसंद नहीं करते हैं, साथ ही एक यह धारणा है कि डॉक्टरी की पढ़ाई आगे चलकर बहुत महंगी हो गई, लेकिन मेरा कहना है कि नई पीढ़ी को डॉक्टर बनना चाहिए। ये प्रोफेशन सेवा का एक अच्छा माध्यम है।

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