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क्या टिकटार्थी का आपराधिक रिकाॅर्ड जानना जरूरी नहीं ? अजय बोकिल की टिप्पणी

Posted on: 31 Aug 2018 21:44 by krishnpal rathore
क्या टिकटार्थी का आपराधिक रिकाॅर्ड जानना जरूरी नहीं ? अजय बोकिल की टिप्पणी

चुनावी स्वच्छता से जुड़े एक गंभीर मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला अभी सुरक्षित रखा है, लेकिन जो मुददा उठा है, उस पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी ‍काबिले गौर है। चूंकि यह जन प्रतिनिधियों के खिलाफ जाती है, शायद इसलिए इसे मीडिया में अपेक्षित कवरेज नहीं मिला। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि देश के मतदाताओं को अपने उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि जानने का अधिकार है। कोर्ट के मुताबिक चुनाव आयोग से राजनीतिक दलों को निर्देश देकर यह सुनिश्चित करने के लिए कहा जा सकता है कि आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे लोग उनके चुनाव चिन्हों पर चुनाव नहीं लड़ें। उल्लेखनीय है कि देश की सबसे बड़ी अदालत इन दिनों इसी मुददे पर सुनवाई कर रही है कि किसी जनप्रतिनिधि को आपराधिक मामले में आरोप तय होने के चरण में ही अयोग्य ठहराया जा सकता है या नहीं? अभी तक माना जाता है कि जब तक दोष सिद्धा न हो जाए, तब तक सम्बन्धित व्यक्ति को अपराधी न माना जाए। अर्थात अपराध के मामले में नैतिकता एक गौण मुद्दा है।

अमूमन चुनाव आते ही ज्यादातर राजनीतिक पार्टियां ऐसे उम्मीदवारों को तवज्जो देती हैं, जो बाहुबली और धनबली हों। इसके लिए उनके आपराधिक रिकाॅर्ड को अनदेखा किया जाता है। उल्टे कई बार यही आपरािधक रिकाॅर्ड टिकटार्थी के लिए ‘प्लस प्वाइंट’ बन जाता है। जबकि अदालत चाहती है कि चुनाव टिकट पाने से पहले ही मतदाता को यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि जिस व्यक्ति को टिकट दिया जा रहा है, उसका चरित्र क्या है, उसका आप राधिक रिकाॅर्ड क्या है? उसकी कायदे- कानून और सामाजिक मर्यादाअों में कितनी निष्ठा है। अचरज की बात है कि कोर्ट की इस ‘मंशा’ को भारत सरकार के एटाॅर्नी जनरल के.के. वेणु गोपाल ने हास्यास्पद बताते हुए प्रतिप्रश्न किया कि क्या अदालत ऐसा कर सकती है? वेणु गोपाल की टिप्पणी कोर्ट के उस ‘सुझाव’ पर थी, जिसमें कहा गया था कि

आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे लोग चुनाव लड़ने के लिए तो स्वतंत्र होंगे लेकिन वे पार्टी चुनाव चिन्ह पर ऐसा नहीं कर सकते। वेणु गोपाल ने भारत सरकार की अोर से अदालत में कहा कि राजनीतिक व्यवस्था को स्वच्छ करने की शीर्ष अदालत की मंशा सराहनीय है, लेकिन न्यायपालिका विधायिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं कर सकती है। इसका चुनावों में उम्मीदवारों की सहभागिता के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इस पर संविधान पीठ ने कहा कि उसकी मंशा विधायिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करने की नहीं है, लेकिन मतदाताओं को प्रत्याशी की पृष्ठभूमि के बारे में जानने का पूरा अधिकार है।

इसके पहले शीर्ष अदालत ने राजनीति के अपराधीकरण को ‘सड़न’ बताया और कहा कि वह निर्वाचन आयोग को यह निर्देश देने पर विचार कर सकता है कि राजनीतिक दल अपने सदस्यों के खिलाफ आपराधिक मामलों को सार्वजनिक करें ताकि मतदाताओं को पता लग सके कि ऐसे दलों में कितने ‘कथित रूप से दागी’ शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट में इस गंभीर मामले की सुनवाई एक एनजीअो पब्लिक इंटरेस्ट फाउण्डेशन व अन्य कई व्यक्तियों द्वारा दायर याचिकाओं पर हुई है। याचिका में कहा गया है कि ऐसे जनप्रतिनिधियों को चुनावी राजनीति में शामिल होने के अयोग्य घोषित किया जाए, जिनके खिलाफ आपराधिक मामलों में आरोप तय हो चुके हैं।

पूरा मामला इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि हमारे लोकतंत्र के परिपक्व होने के साथ-साथ उसमें अपराधी तत्वों की घुसपैठ भी बढ़ती जा रही है। स्वयं संसद भी इससे अछूती नहीं है। एसोसिएशन फाॅर डेमोक्रेटिक रिफाॅर्म ( एडीआर) की रिपोर्ट के मुताबिक इसी 16 लोकसभा में राजद के 4 और शिवसेना के 18 में से 15 का आपराधिक रिकाॅर्ड है। भाजपा के नए सांसदों में से एक तिहाई के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। क्रिमिनल रिकाॅर्ड वाले सर्वाधिक सांसद यूपी, बिहार और महाराष्ट्र से आते हैं। जबकि महिला अत्याचारों के सर्वाधिक मामले भी भाजपा सांसदों के खिलाफ दर्ज किए गए हैं। विडंबना है कि यह जानकारी होते हुए भी सम्बन्धित पार्टियों ने उन्हें टिकट दिए और मतदाताअोंने उन्हें जिताया भी। इसका सीधा अर्थ यही है कि मतदाताअो को पहले से यह ठीक से मालूम नहीं था ‍कि उनके चुनाव प्रत्याशी की आपराधिक पृष्ठभूमि क्या है?

अगर मालूम भी था तो वोटर पर उसे जिताने का कोई न कोई दबाव रहा होगा। कोर्ट का यह मानना है कि अगर मतदाता सम्बन्धित प्रत्याशी के चारि‍त्रिक अतीत और वर्तमान को लेकर जागरूक हों जाएं तो ऐसे तत्वों को चुनाव टिकट न देने का दबाव राजनीतिक पार्टियों पर बनाया जा सकता है। हैरानी की बात यह है कि केन्द्र सरकार ने कोर्ट में ऐसे तत्वों के पक्ष में यह तर्क दिया कि न्यायालय व्यक्ति के मत देने के अधिकार पर शर्त नहीं लगा सकती है। इसमें चुनाव लड़ने का अधिकार भी शामिल है। यह तर्क कानून के हिसाब से भले ठीक हो, नैतिकता की दृष्टि से सही नहीं लगता। कोर्ट की यह मंशा बिल्कुल सही है कि मतदाताअो को अपने प्रत्याशियों के क्रिमिनल रिकाॅर्ड की पूरी जानकारी होनी चाहिए। क्योंकि संसद में ऐसे ही लोग चुनकर जाएं जो प्रतिष्ठित, निष्कलंक और ईमानदार हों। संसद में ऐसे जनप्रतिनिधि निर्वाचित हों, जिनसे चारित्रिक श्रेष्ठता अपेक्षित है न ‍िक येन-केन प्रकारेण चुनाव जीतकर किसी भी पार्टी का संख्या बल बढ़ाने के।

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से भी पूछा ‍कि क्या कोई ऐसा मैकेनिज्म बनाया जा सकता है, जिससे अपराधी तत्वों को पार्टी टिकट पर चुनाव लड़ने से रोका जा सके। दरसअल अदालत की मंशा राजनीतिक दलों की उस जोड़-तोड़ पर प्रहार है, जो चुनाव जीतने के लिए ऐसे लोगों को टिकट देने में कोई गुरेज नहीं करते, जो बाहुबल के दम पर ही सीट निकालने में भरोसा करते हैं। लेकिन जो स्वयं कानून की निगाह में अपराधी हों, उनसे लोकतंत्र की रक्षा की उम्मीद बेमानी है। अदालत इस मामले में क्या फैसला देती है, यह देखने की बात है, लेकिन विडंबना यह है कि केन्द्र सरकार जिस परोक्ष रूप से अपराधी तत्वों के चुनाव लड़ने का बचाव कर रही है, उससे समझा जा सकता है कि आगामी चुनावों में आपराधिक तत्वों की भूमिका कितनी अहम होगी। ऐसे कई संसद में पहुंचेंगे और देश को ईमानदारी और नैतिकता का पाठ पढ़ाएंगे।

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