कर दूं क्या यह खिड़की बंद…खोलने के लिए फिर से दरवाजा | can i do this window closed, Open the door to open again

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होने पर जरा-सी भी आहट दरवाजे पर
खोलकर खिड़की देखता हूँ बाहर …

एक बदहवास-सी भैंस
कभी चढ़ती है बबूल पर
उतरकर फिर
कभी दौड़ती है सड़क पर
खाने के लिए गूलर .

विसंगत है यह कितना ….
न तो चढ़ सकती है वह बबूल पर
और न ही है वहाँ कोई गूलर का फल ?

फिर भी है यह कि
वह ….
और बाद में साथ उसके
दौड़ी चली जा रही हैं अनेक
ढूँढकर लाने और खाने के लिए गूलर .

कुछ और भी
हो गए हैं सम्मिलित
उनके हमसफर
साथ उनके…..

होता है मोह
जो था कभी पास अपने
..उसे फिर से पा लेने का
और वह भी
जो नहीं है पास …
उसे एक बार पा लेने का .

संभ्रम में
याचित-अयाचित के छूट जाने के
बदहवास-सी
सदा कीचड़ में बैठ
कीचड़ में सनी रहनेवाली भैंसें
उछाल रहीं हैं एक-दूसरे पर कीचड़ ..

और
देख रहा हूँ मैं मौन बेबस-सा

जब कि है मेरे हाथ में डंडा
इन्हें हकालकर वापस कीचड़ में भेजने के लिए .

तो
क्या अब मैं
बंद कर इस खिड़की को
खोल दूं अपना दरवाजा फिर से
बाहर जाकर इन्हें
सही जगह पहुँचाने के लिए …..?

शायद नहीं,
अभी सही वक्त नहीं आया है,

पहले इन्हें
बबूल के पेड़ पर
लगा तो लेने दो
गूलर के फल ,
फिर देखते हैं, क्या होता है ?

डर भी है मुझे
मैं ऐसा सोचता रहूँ
और
ये सब मिलकर
गूलर का झाँसा देकर
कुछ और ही न खा जाएँ … ?

हो सकता है क्या ऐसा भी ?
—————————————
–डॉ. सुरेन्द्र यादव , इंदौर , मध्यप्रदेश, भारत

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