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पप्पू तो थे, लेकिन मुकाबले के लिए कोई लालू न मिला | Discussion of Madhepura seat in Bihar

Posted on: 08 May 2019 16:14 by Surbhi Bhawsar
पप्पू तो थे, लेकिन मुकाबले के लिए कोई लालू न मिला | Discussion of Madhepura seat in Bihar

बिहार की मधेपुरा सीट का चर्चा में रहना मुनासिब ही है। कभी समाजवादियों के सबसे बड़े नेता होने का दम भरकर इस सीट से राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसाद यादव और जनता दल युनाइटेड के प्रमुख शरद यादव के बीच मुकाबला हुआ और लोकसभा मे पहुंचे लालू यादव। शरद यादव को मुंह की खानी पड़ी। यह मुकाबला हुआ था 2004 में। इसके बाद लालू यादव ने मैदान छोड़ा तो 2009 में यहां की सांसदी नसीब हुई शरद यादव को। अगले चुनाव में यह खुशी फिर से छीन गई।

2014 में उन्हें अपनी ही जन अधिकार पार्टी (लोकतांत्रिक) के बैनर तले उतरे बाहुबली सांसद की छवि वाले राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने परास्त कर दिया। इसी चुनाव में उनकी पत्नी रंजीत रंजन कांग्रेस के टिकट पर सांसद बनीं। पप्पू का चुनाव चिह्न भी उनके व्यक्तित्व के अनुरूप ही था, हॉकी की स्टिक और बॉल। मधेपुरा से दो चुनावी हार के बाद भी शरद यादव ने यहां से लड़ने की हिम्मत नहीं हारी। तीसरी बार भी पर्चा भर ही दिया।

आखिर बिहार की राजनीति में नीतिश कुमार को नीचा दिखाना भी तो जरूररी है। जहां तक पप्पू यादव की बात है वे राजनीतिक तौर पर अपराजेय जैसे योद्धा है। पार्टियां बदली, लोकसभा क्षेत्र बदले और वे लोकसभा में पहुंचते रहे। पप्पू यादव ने 1990 में विधानसभा सीट जीतकर राजनीति के मैदान में कदम रखा था। इसके बाद 1991, 1996, 1999 और 2004 में वे कभी राष्ट्रीय जनता दल तो कभी समाजवादी पार्टी, कभी निर्दलीय तो कभी लोकतांत्रिक जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ते-जीतते रहे। उसके बाद तो उन्होंने अपनी पार्टी जन अधिकार पार्टी (लोकतांत्रिक) का गठन कर लिया और खुद उसके राष्ट्रीय संरक्षक बन बैठे।

इस बार भी वे जब पर्चा दाखिल करने गए तो मांं का आशीर्वाद लिया औऱ पत्नी ने उतारी आरती। उनका आत्मविश्वास बता रहा था कि कोई चमत्कार ही उन्हें चुनाव में हरा पाएगा। यहां उनका मुकाबला जनता दल युनाइटेड के दिनेशचंद्र यादव औऱ कभी इसी दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे शरद यादव के साथ है। शरद यादव इस बार लालूजी की लालटेन लेकर चुनाव मैदान में उतरे हैं, क्योंकि उनके दल पर अब नीतिश कुमार का अधिकार है। जहां तक पप्पू यादव का सवाल है उनकी जितनी बदनामी आपराधिक मामलों के लिए है, उतनी ही नेकनामी बतौर जननेता भी है। उन्होंने कोसी क्षेत्र के कई जिलों में अपना प्रभाव क्षेत्र कायम कर लिया है। इसके चलते ही वे बार-बार चुनाव भी जीतते हैं और मधेपुरा ही नहीं पूर्णिया, सहरसा, सुपौल और कटिहार जिलों में कई राजनीतिक दिग्गजों के लिए चुनौती भी बने हुए हैं।

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