नहीं रहे ‘अटल’ जी, चला गया राजनीति का अजातशत्रु

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atalbiharivajpayee

आज जब राजनीति जहां नफ़रत की ज़मीन बन चुकी हैं, एक ऐसी ज़मीन जहां सिवाय नफरत के किसी और चीज़ की खेती नहीं की जा सकती. ऐसे वक्त में राजनीति के अजातशत्रु कहे जाने वाले अटल जी आज अनंत की यात्रा कर रहे हैं. एक ऐसी यात्रा जहां से कोई वापस लौट कर नहीं आता. राजनीति का एक चमकता सितारा आज दूर गगन में कहीं सिताराबन जाएगा जो अपनी चमक से भारतीय राजनीति को चमकाता रहेगा. भारतरत्न से सम्मानित पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को सिर्फ भारतीय जनता पार्टी ने ही नहीं बल्कि सहयोगी एवं विपक्षी पार्टियों, दक्षिणपंथियों, वामपंथियों, दक्षिण भारतीयों, पूर्वोत्तर के लोगों, जम्मू-कश्मीर और छोटे-बड़े सभी राज्यों के दलों ने भी अपना नेता स्वीकार कर लिया था. और उनके साथ बिना शर्त कदम से कदम मिलाने के लिए तैयार रहते थे.

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आज की राजनीति में ऐसा नेता मिलना मुश्किल है, जिनके सभी से मित्रवत संबंध हों, चाहे दक्षिण भारत हो, पूर्वोत्तर हो, कश्मीर हो, वामपंथी हों, कांग्रेसी हों, उनके वक्त में सबकी बातों को सुना जाता था. उनके होने पर सबको यह आश्वासन था कि अटल जी हमारी बात सुनेंगे उन्हें समझेंगे.यही वजह है कि एम्स में भाजपा के बड़े नेता से पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी उनके हाल पूछने पहुंचे.

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आज की राजनीति में इतना कड़वापन और टकराव आ गया है जिसमें वाजपेयी एक विरले स्टेट्समैन की तरह नजर आते हैं. पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर में हुआ था. किसी का विश्वास जीतना आसान नहीं है लेकिन अगर किसी पर अटल जी का विश्वास एक बार जम गया तो जम गया. राज करने वाले क्षेत्र में अटल नीति से चलने वाले वाजपेयी आज राजनीति को अनाथ कर हमेशा हमेशा के लिए सबको छोड़ कर चले गए.

अटल जी की इस कविता को आत्मसार करना ही नेताओं द्वारा उन्हें दी गयी असली श्रंद्धांजलि होगी –

बाधाएँ आती हैं आएँ
घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,
निज हाथों में हँसते-हँसते,
आग लगाकर जलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,
अगर असंख्यक बलिदानों में,
उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में,
उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

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