धनतेरस तब और अब ! नीरज राठौर की कलम से

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धनतेरस मूलतः कार्तिक कृष्णपक्ष की त्रयोदशी या तेरस का वह दिन था जब समुद्र मंथन के दौरान देवों और असुरों ने समुद्र पार के किसी देश में अमृत घट के साथ आयुर्वेद के जन्मदाता धन्वंतरि की खोज की थी। वे बाद में देवताओं के चिकित्सक बने और उन्हें भगवान विष्णु का अवतार तक कहा गया। हजारों वर्षों से उनके प्रकट होने वाले इस दिन को धन्वंतरि त्रयोदशी, धन्वन्तरि जयंती या धनतेरस के रूप में श्रद्धापूर्वक मनाया जाता रहा।

धनतेरस का वर्तमान स्वरुप बाजार और उपभोक्तावाद की देन है जब हमारी बेशर्म धनलिप्सा ने एक महान चिकित्सक को भी धन का देवता बनाकर रख दिया। हमें यह बाजार ने बताया कि धनतेरस के दिन सोने-चांदी में निवेश करने, विलासिता के महंगे सामान या छोटी-बड़ी गाड़ियां घर लाने या सट्टा-जुआ खेलने से आपका धन तेरह गुना बढ़ जा सकता है। इस दिन ज्वेलर्स की दुकानों, वाहन एजेंसियों, इलेक्ट्रॉनिक्स के शोरूम में जमा भीड़ देख कर अपने पूर्वजों की दूरदर्शिता को प्रणाम करने को जी चाहता है जिन्होंने संपत्ति की देवी लक्ष्मी के वाहन के रूप में उल्लू की कल्पना की थी।

विवाद सिर्फ इस बात का हो सकता है कि उल्लु हो जाने के बाद लक्ष्मी आती है या लक्ष्मी के आ जाने के बाद लोग उल्लू बनते हैं। आज की रात धन में बढ़ोतरी का विश्वास लिए कुछ लोग जुए के अड्डों पर पहुंचकर बड़ी-बड़ी रकम दाव पर लगा देते है। यह जानते हुए भी कि जुए के ठिकानों से जो भी लौटता है, कुछ गवांकर ही लौटता है। कुछ तांत्रिक बाबाओं से प्रभावित एक वर्ग का यह भी मानना है कि धनतेरस की रात उल्लुओं की बलि देने से उनकी संपति में बेतहाशा वृद्धि हो सकती है।

आज बड़े शहरों में तमाम प्रतिबंधों के बावजूद बलि के लिए एक-एक उल्लू हज़ारों रुपयों में बिक रहे हैं। अपने वैभव के प्रदर्शन, विलासिता की चीज़ों तथा जुए-सट्टा में पैसे लुटाने और निर्दोष पक्षियों की बेरहम हत्या के बजाय धनतेरस के दिन अपने टोले-मुहल्ले, गांव-शहर अथवा अनाथालय के ज़रूरतमंद बच्चों में थोड़े लड्डू, कुछ फुलझड़ियां, चंद नए-पुराने कपडे और बस एक ज़रा सी मुस्कान बांट कर देखिए ! यक़ीनन आपकी ख़ुशी तेरह नहीं, सीधे छब्बीस गुना बढ़ जाएगी !

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