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मध्यप्रदेश में ‘गौ मंत्रालय’ की मांग और जमीनी चुन‍ौतियां ! अजय बोकिल की कलम से….

Posted on: 21 Jun 2018 10:09 by krishnpal rathore
मध्यप्रदेश में ‘गौ मंत्रालय’ की मांग और जमीनी चुन‍ौतियां ! अजय बोकिल की कलम से….

परलोक मैनेज करने में जुटे आध्यात्मिक बाबाअों को मंत्री दर्जा इत्यादि देने से उनकी लौकिक आंकाक्षाएं भी किस तेजी से जोर मारने लगती हैं, इसका ताजा उदाहरण मध्यप्रदेश में मंत्री दर्जा पाए बाबाअोंकी मांगें हैं। राज्य गौ सेवा संवर्द्धन आयोग के अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री दर्जा प्राप्त महामंडलेश्वर ‍अखिलेश्वरांनद गिरी ने मुख्यंमंत्री शिवराजसिंह चौहान से राज्य में अलग से ‘गाय मंत्रालय’ गठित करने की मांग कर डाली है। उनका दावा है कि स्वतंत्र मंत्रालय बनने से गायों की देखभाल बेहतर ढंग से हो सकेगी। उधर एक राज्यमंत्री दर्जा प्राप्त और ‘हठयोगी’ कम्प्यूटर बाबा ने तो अपने और अपने एक दोस्त बाबा के लिए विधानसभा चुनाव टिकट मांग लिया है। इस पर राज्य में कांग्रेस नेता और विधायक जीतू पटवारी ने तंज किया कि क्या शिवराज सरकार प्रदेश में बाबाअों के लिए भी आरक्षण लागू करने का विचार कर रही है? प्रदेश की भाजपा सरकार बाबाअों और कथित संतों के लिए आरक्षण लागू भले न करे, लेकिन ऐसे बाबाअो के लिए सरकारी आस्था पहले ही आरक्षित हो चुकी है, इसमें दो राय नहीं। कई बार यह भ्रम भी होने लगता है कि कहीं सरकार बाबाअों के भरोसे ही तो नहीं चल रही। भाजपा राममंदिर आंदोलन के बाद से ही तमाम बाबा, साधु संत और आध्यात्मिक बाबाअों को अघोषित रूप से अपना राजनीतिक ब्रांड एम्बेसेडर मान कर चलती आई है। इससे बाबा भी इसलिए खुश रहते हैं, क्योंकि पहले उनकी सल्तनत चंद भक्तों के आर्थिक दोहन पर ही टिकी रहती थी, लेकिन अब सरकार का साया साथ हो जाने से मामला बिल्कुल अलग और सरकारी रसूख वाला हो गया है। नौकरशाही में भी यह संदेश चला गया है कि बाबा होना हर एंगल से फायदेमंद है। उन्हें नाराज करना ऐसे में बाबा अपने मंत्री दर्जे की ठसक जताते हुए नई-नई मांगें रख रहे हैं। उल्लेखनीय है कि शिवराज सरकार ने दो माह पहले ही पांच बाबाअोंको कै‍िबनेट और राज्य मंत्री का दर्जा दिया था। इसके पीछे इन ‘संतों’ का राजनीतिक रसूख बढ़ाना और चुनाव में उसका उपयोग करना ही मुख्य उददेश्य रहा है। मध्यप्रदेश में चुनाव अभी छह माह दूर हैं।

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बाबा अखिलेश्वरानंद गिरी की गो भक्ति और गायों के प्रति आस्था भाव दुनिया को पता है। गायों को लेकर वे कई ‘मौलिक’ किस्म के बयान दे चुके हैं। मसलन पिछले साल उन्होने कहा था कि दुनिया में तीसरा विश्वयुद्ध गायों को लेकर ही होगा। अभी तक तो यही माना जा रहा था कि यदि तीसरा विश्वयुद्ध हुआ तो वह पानी को लेकर ही होगा। हां, इसको लेकर एक खूंखार टीवी‍ डिबेट हो सकती है कि तीसरा विश्व युद्ध पानी को लेकर होगा या गायों को लेकर होगा? क्योंकि गायें पानी के बगैर‍ जिंदा नहीं रह सकती। लेकिन पानी बगैर गायों के भी रह सकता है। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि किस को लेकर‍ विश्वयुद्ध कराने में अपना ज्यादा फायदा है ? वैसे बाबा अखिलेश्वरानंद जी का दावा है कि अलग से मंत्रालय बनने के बाद गौसेवा और संरक्षण बेहतर ढंग हो सकेगा। बगैर अलग मंत्रालय के अभी भी मध्यप्रदेश में 545 गौशालाएं चल ही रहीं है। इनमें से 56 में शोध कार्य आदि भी हो रहा है। गायों की ‍चिंता करने वालों में मध्यप्रदेश यूं भी अग्रणी है। यहां दो साल से गायों और अन्य मवेशियों को ‘आधार’ जैसा यूआईडी कार्ड देने का काम चल रहा है। पशुधन मंत्री अंतरसिंह आर्य ने पिछले दिनों बताया था कि करीब ढाई लाख गायों को यूआईडी कार्ड दिए जा चुके हैं। प्रदेश में लगभग 54 लाख गाएं हैं। गायों को दिए जा रहे ये कार्ड भी दरअसल गायों की जन्मकुंडली ही है। इसमें चिप लगी रहती है, जिसमें गायों के बर्थ डे की तारीख, नस्ल, दूध देने की क्षमता, स्वास्थ्य आदि की जानकारी होती है। अखिलेश्वरानंद जी का यह भी कहना है कि पशु संवर्द्धन के लिए मप्र सरकार को केन्द्र सरकार से 15 हजार करोड़ मिले हैं। लेकिन इसमें से गायों पर कुछ खर्च नहीं हुआ। यानी गायें अभी भी ‘गऊ’ ही बनी हुई हैं। जाहिर है कि गायो के लिए अलग से मंत्रालय बना तो मंत्री बाबा ही बनेंगे। इसके पहले गायों के ‘राजनीतिक अच्छे दिन’ तब आए थे, जब कांग्रेस पार्टी ने इसे अपना चुनाव चिन्ह बनाया था। जाहिर है कि गायो के लिए अलग से मंत्रालय बना तो मंत्री बाबा ही बनेंगे।

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उधर राज्यमंत्री दर्जा प्राप्त कम्प्यूटर बाबा ने लगे हाथ बीजेपी से महाकोशल की मंडला सीट से विधानसभा चुनाव के लिए टिकट मांग लिया है। 54 वर्षीय इस बाबा को कम्प्यूटर बाबा इसलिए कहा जाता है, क्योंकि वे हमेशा अपने साथ लैपटाॅप रखते हैं। उनका दिमाग भी कम्प्यूटर की तरह तेज बताया जाता है। बाबा की ख्याति कुंभ मेले में हेलीकाप्टर से पहुंचकर पवित्र स्नान करने के लिए भी है। वोतो पिछले लोकसभा चुनाव में ही टिकट के आकांक्षी थे, लेकिन बीजेपी उन्हें ज्यादा तवज्जो नहीं दी थी। कहा तो यह भी जाता है कि उन्हें राज्य मंत्री का दर्जा मिला ही इसलिए कि वे राज्य सरकार के खिलाफ नर्मदा घोटाला रथ यात्रा शुरू करने वाले थे।

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यहां मुददा यह है कि अलग से गौ मंत्रालय बनाने से होगा क्या? हालांकि राज्य सरकार ने बाबा की मांग पर कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई है। इसके पीछे वजह यह हो सकती है कि ‘आनंद मंत्रालय’ बनाने के बाद सरकार नहीं समझती कि अब और किसी नए मं‍त्रालय की गरज है। यह बात गायों को भी समझ आ जानी चाहिए। हालांकि खुद गायों को पता नहीं है कि अलग मंत्रालय बनने से उनकी स्थिति कैसे सुधरेगी ? क्या गायों पर अलग से बजट होगा? अभी गायों पर कितना खर्च हो रहा है? चिंता की बात यह है कि गायों के प्रति तमाम सहानुभूति और धार्मिक श्रद्धा के बाद भी गायों की भूख प्यास और बीमारी से मौत की खबरें आती रहती हैं। क्या अलग से बना मंत्रालय इन्हें रोक पाएगा ? और फिर आज गायों को लेकर मंत्रालय की मांग उठी है। कल को भैंस, कुत्ते, बकरे आदि को लेकर भी यही मांग उठ सकती है। फिर क्या होगा? गायों के प्रति सरकार की निष्ठा पर सवाल न भी करें तो यह मांग मानना उसके लिए इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि गायों की वजह से तो वोट मिल सकते हैं, लेकिन गाएं खुद वोट नहीं करतीं।

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