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जिंदगी से हारों को मौत भी मुक्त नहीं करती

Posted on: 14 Jun 2018 10:33 by krishnpal rathore
जिंदगी से हारों को मौत भी मुक्त नहीं करती

मौत अधिकतर कहानियों का उपसंहार लिखती है। याद है ना बचपन की वह कहानी। एक था राजा, एक थी रानी, दोनों मर गए खतम कहानी। इसके उलट कुछ कहानियां ऐसी होती हैं, जो मौत से शुरू होती हैं। इधर, सांसें टूटती हैं और उधर सैलाब सा उमड़ पड़ता है। मानो कहीं कुछ कैद था और अचानक से आजाद हो गया है। जिस्म की पोटली में बंधे सारे किस्से रूह के साथ आजाद हो चौराहों पर आ जाते हैं। जिंदगी हारकर भी देह के दंड से मुक्त हो जाएं यह जरूरी नहीं।नहीं पता कि यमराज ने नचिकेता को मृत्यु के बाद के जीवन के बारे में क्या बताया होगा। नचिकेता वह ज्ञान अपने साथ ही ले गए या किसी और तक पहुंचाया, इस बारे में भी कहीं कोई ठोस जानकारी नहीं मिलती। क्या सच में मृत्यु के कुछ दिन बाद तक आत्मा वहीं रहती है या गीता के अनुसार वह वस्त्र की तरह फौरन दूसरी देह ग्रहण कर लेती है। एक पर्दा गिरता है, एक नाटक खत्म होता है और दूसरा प्रहसन शुरू हो जाता है। क्या अंत सच में इतना सहज और स्वाभाविक होता है। पुनर्जन्म की तमाम थ्योरी और प्रारब्ध के असर क्या और कैसे होते हैं, अंदाजा लगाना सच में बेहद मुश्किल है।

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और फिर जब मृत्यु का वरण आप खुद करें तब तो कहानी और पेचीदा हो जाती है। नियती मेरे ही हाथों मेरी मृत्यु लिखकर क्या साबित करना चाहती होगी। भीष्म पितामह को इच्छामृत्यु का वरदान मिला था। आत्महत्या इच्छामृत्यु तो नहीं हो सकती। नियती उन परिस्थितियों का निर्माण करके ही मृत्यु को किसी के गले का हार क्यों बनाना चाहेगी। सच तो यह है कि हम जब तक जीते हैं, मुक्ति के स्वप्न को आंखों में जिंदा रखकर जीते हैं। मन में कहीं गहराई तक यह बात बैठी रहती है कि एक दिन ऐसा आएगा, जब यह सब खत्म हो जाएगा। सारे संघर्ष अनंत में विलीन हो जाएंगे। सारी दैहिक और मानसिक तकलीफों से मुक्ति मिल जाएगी, सिर्फ शांति ही शांति होगी।यह विचार ही हमारे भीतर रात-दिन उम्मीदों का शहद टपकाता है। आंखों में सपने गूंथता है, कानों में दूर कहीं घुंघरू बजाता है। जिंदगी को कितनी ही मिरीचिका समझें वह हमें सांसों के पीछे लगाए रहता है और जब यह उम्मीद टूट जाती है, कोई नाव लंगर से छूट जाती है। इतना घना कोहरा घेर लेता है कि कहीं कोई रोशनी दिखाई नहीं देती। सांसें ही बोझ बन जाती है, एक-एक धडक़न भारी पडऩे लगती है। उसका स्पंदन दिमाग की नसों को चीरने पर आतुर हो उठता है। तब क्या उस क्षण में ही आत्महत्या का खयाल पुष्ट होता होगा।

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लेकिन वह मुक्त कहां होने देता है। और घसीटकर चौराहे पर ले आता है, उन तमाम किस्सों को, जिनसे वह बचना, भागना चाहता था। चिपट जाते हैं इस बुरी तरह से कि कितना भी झटकों दूर नहीं हो पाते। आप समझते हैं वह मरकर मुक्त हो गया। अगर यही आजादी है तो फिर कैद किस चिडिय़ा का नाम है। जिंदा रहते हुए एक के बाद दूसरे किसों से आप नई सूरतें गढ़ते जाते हैं। सीढिय़ां और रास्ते बदलकर नई मंजिल रचते जाते हैं। देह का पर्दा गिराकर तो उन्हीं में लोटपोट होकर रह जाने के अलावा क्या बच जाता है क्योंकि किस्सों को कभी मौत नहीं आती। किरदार भले मर जाते हैं, दफन हो जाते हैं, लेकिन कहानियां हवाओं में तैरती रहती हैं। वे हरदम किरदारों को कठघरे में खड़ा करती रहती है। मरकर तो आप अपने हक में गवाही देने के लायक भी नहीं रहते। हालांकि कह सकते हैं कि जब देह ही नहीं रही तो उससे जुड़ी जवाबदेहियों का रोना क्यों, जिसने जो किया वह उसका अच्छा-बुरा भुगतेगा। जवाबदेह चला गया, जवाबदेहियां रह गईं, वे कोई नया ठौर ढूंढ लेंगी। पानी की एक धार गुजर जाने से कोई नदी हमेशा के लिए सूख नहीं जाती।

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लेकिन फिर लगता है कि क्या यही एक खयाल उस क्षण में प्रवेश से पहले लौटा नहीं सकता, अंधेरे में डूबते कदमों को। देहांतरण प्रस्थापित तो कर देगा, लेकिन मुक्त नहीं कर पाएगा। न खुद को न अपने आसपास के उन तमाम लोगों को। किसी की खुदकुशी उससे कहीं ज्यादा अपनों पर बोझ होती है। वे जीवनभर इस तनाव को जीते हैं कि उनकी मुट्ठी से रेत की तरह कोई अपना फिसल गया और वे कुछ नहीं कर पाए। मृत्यु उन्हें मुक्त करती है, जो जिंदगी को जीत लेते हैं, जिंदगी से हारे लोगों को वह सदा के लिए जकड़ कर बैठ जाती है। वे वही ठहर कर ठिठक कर रह जाते हैं। हमेशा बने रहते हैं, उन्हीं सवालों में, किस्सों और कहानियों में।

#अमितमंडलोई 

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