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यहां श्राप देना सिखाया जाता है | ‘Curse’ taught here…

Posted on: 21 Apr 2019 12:35 by Pawan Yadav
यहां श्राप देना सिखाया जाता है | ‘Curse’ taught here…

वरिष्ठ पत्रकार अमित मंडलोई

सोचता हूं कि यदि श्राप में इतनी ताकत है तो क्यों न उसके लिए एक ट्रेनिंग सेंटर ही खोल दूं। लोग आएं और श्राप देना सीखें। जिससे भी परेशानी हो, उसे श्राप दें और एक-डेढ़ महीने तक इंतजार करें। जितना प्रभावी श्राप होगा, उतने ही अधिक असर की संभावना रहेगी। यानी कोर्स कई लेवल में चलाए जा सकते हैं। नर्सरी, केजी-1, केजी-2 से लेकर ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन, पीएचडी तक के कोर्सेस हो सकते हैं। जिसकी डिग्री जितनी बड़ी, अध्ययन जितना गहरा, श्राप उतना ही तीव्र और आक्रामक।

हो सकता है इतनी पढ़ाई के बाद आपको पुराने साधुओं की तरह हाथ में कमंडल या वाटर बॉटल भी न रखना पड़े। सुविधा के लिए डिग्री के हिसाब से लोगों के हाथ में कुछ उपकरण भी दिए जा सकते हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि लोग देखकर ही समझ जाएंगे कि सामने वाले ने श्राप की कौन सी डिग्री ले रखी है। जैसे वाटर बॉटल टाइप हुआ तो नर्सरी लेवल का, यानी श्राप दे भी देगा तो बहुत ज्यादा डरने की जरूरत नहीं है। क्योंकि असर होने में दो-तीन जन्म भी लग सकते हैं।

त्रिशुल टाइप कुछ पेन कैप हुई यानी ग्रेजुएट, थोड़ा संभल कर रहने की जरूरत है। साल-छह महीने में श्राप का असर हो सकता है। पढ़ाई-लिखाई, शादी-ब्याह, नौकरी-धंधे से जुड़े श्राप दे दे तो मुसीबत हो जाएगी। सालभर में ही पढ़ाई का सत्यानाश, शादी टूटना, दुकान के सीलिंग में चले जाने का खतरा हो सकता है। इसलिए जरूरी है कि ऐसे लोगों से दो-चार फीट की दूरी ही बनाकर रखी जाए। किसी जेब में अगर ऐसे दो-तीन पेन हो तो फिर ये दूरी 8-10 फीट से लेकर कई किमी की भी हो सकती है।

यानी जितना हो सके, ऐसे लोगों से दूर ही रहें। ये श्राप देने में पीएचडी उपाधी धारक हैं। इधर, श्राप दिया और उधर असर हो जाएगा। तुरंत फिसलकर गिरने, पैर टूटने, पेपर बिगडऩे, लडक़ी का चाटा पडऩे से लेकर चुनाव हारने तक की नौबत आ सकती है। ऐसे लेागों के घर के बाहर भी कुछ निशान बनाया जा सकता है। ताकि सब लोग इनसे बचकर रहें। जाने-अनजाने इनसे किसी तरह की बेअदबी न हो। इन्हें नाराज न किया जाए। इनके घर 24 घंटे, बिजली पानी का इंतजाम हो, इनके बच्चों को टीचर घर आकर पढ़ाएं, डॉक्टर घर पर ही इलाज करें और बिना काम किए सरकार इन्हें तनख्वाह, भत्ते, पेंशन सब पहुंचाए।

ये तो हुई इनकी काबिलियत की बात, अब सोचिए कि अगर ये ट्रेनिंग सेंटर सफल और कारगर हो गया तो दुनिया कैसे बदल जाएगी। सबसे पहले तो खाकी वर्दी वालों की शामत आएगी। हमें इनकी जरूरत ही नहीं पड़ेगी। लोग अपने स्तर पर ही सारे मामले निपटा लेंगे। कुछ भी गड़बड़ हुई तो श्राप दिया और हिसाब पूरा। और जब थाने की ही जरूरत नहीं होगी तो कोर्ट-कचहरी का क्या काम। उन पर भी ताले पडऩा स्वाभाविक ही है। अखबारों में अपराध जगत की खबरों के बजाय श्राप के किस्से आने लगेंगे। आज फलां महिला ने अपनी पड़ोसन को श्राप दिया, वह डेढ़ घंटे तक छत पर उलटी टंगी रही। उसका पति बाथरूम में फिसल गया, बच्चा टेस्ट में सबसे लास्ट आया।

लड़कियों के लिए यह सबसे बड़ा हथियार बन सकता है। कोई उनसे छेड़छाड़ तो दूर आसपास फटकने की हिम्मत भी नहीं कर पाएगा। जैसे ही कोई घूरने की चेष्ठा करे तो उसकी आंखों में मिर्च पड़ सकती है, उसका मुंडन हो सकता है और गले में कुत्ते का पट्टा डल सकता है। मुंह काला होकर उसकी बाइक की जगह गधा भी आ सकता है। तब हमें सेना और इतने असले की भी जरूरत नहीं होगी। सरहद पर लोगों को खड़ाकर दुश्मन देश को श्राप दिला देंगे। महीने-डेढ़ महीने में हमारे बच्चे वहां क्रिकेट खेलने जाने लगेंगे।

बस एक बात का ध्यान रखना पड़ेगा कि इस टेक्निक का कॉपी राइट हमारे ही पास होना चाहिए। कोई और इसे चुरा न लें, वरना तोप-तमंचों की जगह श्राप युद्ध होने लगेंगे। इधर हमने श्राप दिया, उधर उसने, जिसके श्राप में जितनी ताकत होगी वह असर करेगा, दूसरा कट जाएगा। यानी लोग सारे काम छोडक़र श्राप की ताकत बढ़ाने में लग जाएंगे। अभी मिले-लिखे टाइप के विज्ञापन देने वाले फिर इसके लिए भी सलाह-मशवरा देने लगेंगे।

स्पष्ट हो ही गया होगा कि यह क्षेत्र कितनी संभावनाओं से भरा हुआ है। तो देर किस बात की है, लिमिटेड सीट है, जल्द बुक करा लीजिए। लांचिंग डिस्काउंट भी मिल सकता है। पूछने की जरूरत नहीं है कि इस यूनिवर्सिटी का कुलपति से लेकर मास्टर ट्रेनर तक कौन होगा।

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