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देश तो जानता था सरकार को 36 महीने बाद समझ आई ! कीर्ति राणा की कलम से….

Posted on: 20 Jun 2018 10:42 by krishnpal rathore
देश तो जानता था सरकार को 36 महीने बाद समझ आई ! कीर्ति राणा की कलम से….

नाम मात्र की सीटों के आधार पर अपने दल की सरकार गिनाने वाले मोटा भाई के लिए #जम्मूकश्मीर की सरकार हाथ से जाना झटका नहीं है। क्योंकि राजनीति के धुरंधरों की चमड़ी इतनी मोटी हो जाती है कि उन्हें बेशर्मी के पौधे में भी सकारात्मकता दिखती है कि कम से कम इस पौधे से कुछ छांव तो मिलेगी। जम्मू-कश्मीर में #मेहबूबा की सरकार बचाने के लिए समर्थन ना देकर कांग्रेस ने वैसी ही समझदारी की है जैसी उतावली #भाजपा ने #राममाधव के नेतृत्व में अपना झंडा गाड़ने में दिखाई थी।पहले दिन से सब जानते थे राजनीति के इस लव जेहाद को ज़बरन मज़बूत दिखाने की कोशिश की जा रही है।इन तीन सालों में भाजपा की गठबंधन में वैसी ही हालत रही जैसी #महाराष्ट्र में #शिवसेना की, #फड़नवीस ने शिवसेना के दबाव को नियंत्रण में ही रखा दूसरी तरफ़ महबूबा ने अपने हर फ़ैसले में यह साबित किया कि उसे भाजपा की परवाह नहीं है, #लोकलाज की मारी भाजपा गला फाड़ के अपना वह पारंपरिक जयघोष भी इन वर्षों में नहीं कर पाई जहाँ हुए बलिदान मुखर्जी वह कश्मीर हमारा है। यह ठीक है कि जम्मू के साथ वाला कश्मीर हमारा ही है लेकिन इन मजबूर गठबंधन के सालों में भाजपा के #गृहमंत्री से लेकर #रक्षामंत्री तक दहाड़ने वाला मुखौटा भी नहीं लगा पाए।इस मामले में अपने #पीएमजी की व्यक्तिगत नीति ज़्यादा ठीक लगी कि विश्वमंच पर बोलने के अधिकार वो किसी को देते नहीं और #पत्थरबाज़ों के सामने घिघियाने के लिए गृहमंत्री को आगे कर देते हैं। सरदार पटेल में प्रधानमंत्री के सारे गुण देखने वाले सत्ता सुख के 48 महीनों के बाद भी देश के गृहमंत्री सरदार पटेल जैसे तेवर ना दिखा पाएँ तो इस असफलता के लिए #कांग्रेस को दोषी ठहराना चाहिए।राम माधव को अब जाकर समझ आया कि महबूबा के नेतृत्व वाली सरकार #कश्मीरघाटी में हालात संभालने में विफल रही है। इसलिए मजबूरन समर्थन वापस लेना पड़ रहा है। राममाधव अब महबूबा पर कितने भी इल्जाम लगाए लेकिन भाजपा ने अपनी राजनीतिक साख बचाने के लिए ही कश्मीर में गठबंधन तोड़ा है।भाजपा के लिए इमेज परिणाम

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#राष्ट्रपति भवन से लेकर #पीएमजी तक गोल टोपी, इफ़्तार पार्टी से बचने लगे, #शिवराज टोपी का विकल्प साफे को मान लें ये पहल हिंदू हितों की फ़ौज का दिल जीतने के लिए बहुत अच्छी है।भक्तमंडली तो पूछेगी नहीं लेकिन देश का अवाम पीएमजी और मोटाभाई से यह तो पूछेगा ही मेहबूबा की चौखट पर क्यों नाक रगड़ते रहे।इन तीन सालों में जो जवान #शहीद हुए उन परिवारों को जवाब माँगने का हक़ नहीं है क्या? #मेजरगोगोई ने जो कर दिखाया वैसा साहस सरकार क्यों नहीं दिखा पाई? जो हमारी सेना को हर रोज़, कदम कदम पर अपमानित करें वो आप की नज़र में नादान बच्चे हो गए, #देशद्रोह के प्रकरण वापस लेने में भी हिचक नहीं, फिर अपने समाज के हक़ के लिये लड़ने वाले #हार्दिकपटेल कैसे देशद्रोही मान लिए गए, दिल्ली के हक़ों के लिए लड़ रहे #केजरीवाल क्यों आँखों में खटक रहे हैं। समर्थन वापसी जैसा कदम उठाने के अवसर तो पहले भी ख़ूब आए थे, #ईद का इंतज़ार क्या इसलिए ही किया गया कि विश्वमंच पर मुस्लिम देश मोदी की उदारता की सराहना करें। जम्मू कश्मीर में सख़्ती दिखाने के लिए आज से केंद्र सरकार आजाद हो गई है, #ऑपरेशनऑलआउट ऐसा चलेगा कि तीन साल में शहीद हुए जवानों के पराक्रम की याद भी ना आए लेकिन उन शहीदों के परिवारों को सरकार की लाचारी से मिले ज़ख़्म भर पाएँगे ? सरकार में रहने की मजबूरी ने इतना #पौरुषहीन बना दिया कि देश के बहुसंख्यकों के साथ ही राष्ट्रभक्त मुस्लिमों की भावना भी समझ न सके। या गठबंधन सरकार को अब तक इसलिए खींचा जाता रहा कि चुनावी साल के महीनों की दूरी कम होती जाए। ऑपरेशन ऑलआउट केंद्र की ऐसी तमाम कमज़ोरियों के लिए ढाल साबित होगा, इससे भी कुछ बड़ा सोचने की नौबत आई तो 2019 में और ताक़त से वापसी के लिए #पाकिस्तान को एक झटका भी दिया जा सकता है।

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महाराष्ट्र में शिवसेना की वैसी ही दुर्गति हाल के वर्षों में हुई है जैसी कश्मीर में भाजपा की। केंद्र सरकार में भागीदार और सारे सुख भोगती रही शिवसेना को अब महाराष्ट्र के हितों की वैसी ही चिंता हो रही है जैसी चंद्रबाबू नायडू और बिहार में विशेष पैकेज के मुद्दे पर नीतीश को हो रही है।#एनडीए में जिहाद के नारे सुनाई नहीं देते यदि चुनाव में अधिक वक्त होता। भानुमति के इस कुनबे में बिखराव का इंतज़ार कांग्रेस भी कर रही है लेकिन उसे यह ज़िद्द छोड़ देना चाहिए कि प्रधानमंत्री बनने की क़ाबिलियत उसके पास ही है, मज़बूत विकल्प तब ही संभव है जब उजाड़ महल की चौखट से कांग्रेस बाहर निकले। उसे अब इसलिए भी नहीं डरना चाहिए कि मोटाभाई कह चुके हैं कांग्रेस मुक्त भारत की बात तो हमने कभी कही ही नहीं। मप्र से लेकर दिल्ली तक बेहतर विकल्प की छटपटाहट तेज तो हो रही है लेकिन दशावतार जैसे मोदी के समक्ष कोई विराट व्यक्तित्व नहीं है।

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